
70 साल की उम्र में ज्यादातर लोग चाहते हैं कि अब जिंदगी थोड़ी आराम से गुजरे. सुबह जल्दी उठकर काम पर जाने की मजबूरी न हो और परिवार के साथ सुकून के कुछ पल मिलें. लेकिन कोलकाता की करुणा घोष की जिंदगी में शायद आराम का यह दौर अभी आया ही नहीं है.
उम्र के इस पड़ाव पर भी करुणा रोज अपने काम पर निकलती हैं. वह घरों में मेड का काम करती हैं और इसी कमाई से अपने परिवार का खर्च चलाती हैं. उनकी कहानी हाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आई, जिसके बाद बड़ी संख्या में लोग उनके संघर्ष और हिम्मत को सलाम कर रहे हैं.
40 साल से घरों में कर रहीं काम
करुणा करीब चार दशक से घरेलू कामगार के तौर पर काम कर रही हैं. आज भी वह तीन अलग-अलग घरों में बर्तन धोने का काम करती हैं. इतनी लंबी उम्र तक लगातार काम करने के बावजूद उनके सामने रिटायरमेंट का ऑप्शन नहीं है. इसकी वजह उनकी अपनी जरूरत से ज्यादा परिवार की जिम्मेदारी है. उनके दो बच्चे हैं और दोनों जन्म से ही नेत्रहीन हैं. बेटी की उम्र करीब 50 साल है, जबकि बेटा 40 साल का है. करुणा के लिए बच्चों की जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं हुई. यही वजह है कि उम्र बढ़ने के बाद भी उन्हें काम करते रहना पड़ रहा है.
पति की मौत के बाद अकेली संभाली जिम्मेदारी
करुणा के पति की करीब 19 साल पहले कैंसर से मौत हो गई थी. पति के जाने के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई. उस समय उनके सामने एक तरफ दो ऐसे बच्चों की जिम्मेदारी थी, जिन्हें जन्म से दिखाई नहीं देता था, वहीं दूसरी तरफ घर चलाने के लिए कमाई का कोई दूसरा सहारा नहीं था. उन्होंने हालात के सामने हार मानने के बजाय काम करना जारी रखा. साल बीतते गए, बच्चे बड़े होते गए और करुणा की उम्र भी बढ़ती गई. लेकिन परिवार को संभालने की उनकी जिम्मेदारी कम नहीं हुई.
बच्चों को नहीं मिल पाई जरूरी ट्रेनिंग
करुणा की कहानी का एक और पहलू बेहद अहम है. उनके बच्चों को ऐसी खास ट्रेनिंग और मौके नहीं मिल सके, जिनकी मदद से वे ज्यादा आत्मनिर्भर जिंदगी जी सकते. कंटेंट क्रिएटर अराधना चटर्जी ने करुणा की कहानी शेयर करते हुए बताया कि उनके बच्चों को जरूरी एक्सपोजर और स्पेशल ट्रेनिंग नहीं मिल पाई. इसका असर यह हुआ कि बच्चे बड़े होने के बाद भी अपनी मां पर काफी हद तक निर्भर रहे. ऐसे में करुणा के लिए नौकरी छोड़ना आसान नहीं था.
मां की उम्र बढ़ती गई, जिम्मेदारी वहीं रही
करुणा ने अपनी जिंदगी के करीब 40 साल दूसरों के घरों में काम करते हुए गुजार दिए. इस दौरान उन्होंने अपनी जरूरतों से पहले बच्चों को रखा. लेकिन अब उम्र का असर साफ दिखाई देता है. 70 साल की उम्र में भी उन्हें रोज काम करना पड़ता है, क्योंकि उनके परिवार के पास कमाई का कोई दूसरा मजबूत जरिया नहीं है. करुणा की स्थिति यह सवाल भी खड़ा करती है कि उन बुजुर्ग माता-पिता का क्या होता है, जिन्होंने पूरी जिंदगी अपने दिव्यांग बच्चों की देखभाल में लगा दी और बुढ़ापे में भी उनके लिए काम करना नहीं छोड़ पाए.
सोशल मीडिया पर लोगों ने किया सलाम
करुणा घोष की कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनकी हिम्मत और मेहनत की जमकर तारीफ की. कई यूजर्स ने कहा कि इतनी उम्र में भी अपने परिवार के लिए काम करने वाली इस मां की कहानी समाज के सामने आनी चाहिए. लोगों ने यह भी कहा कि ऐसे परिवारों को सिर्फ सहानुभूति नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक मदद की जरूरत है. खासकर उन बुजुर्ग लोगों के लिए सपोर्ट सिस्टम होना चाहिए, जो उम्र के आखिरी पड़ाव में भी अपने दिव्यांग बच्चों की जिम्मेदारी उठा रहे हैं.
‘उन्हें अब सहारे की जरूरत है’
करुणा की कहानी शेयर करने वाली अराधना चटर्जी ने कहा कि करीब चार दशक तक घरेलू काम करने के बाद अब करुणा खुद सुरक्षा और सहारे की हकदार हैं. उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस उम्र में उन्हें आराम मिलना चाहिए, उसी उम्र में वह आज भी काम कर रही हैं. वजह सिर्फ इतनी है कि घर में दो बच्चे अब भी उनकी कमाई पर निर्भर हैं.
मां के लिए उम्र सिर्फ एक नंबर रह गई
करुणा घोष की कहानी किसी फिल्मी कहानी जैसी नहीं है. इसमें कोई बड़ा चमत्कार नहीं, कोई अचानक बदलती किस्मत नहीं. यह एक ऐसी मां की रोजमर्रा की जिंदगी है, जो सालों से जिम्मेदारियों का बोझ उठाकर आगे बढ़ रही है. 70 साल की उम्र में भी उनका काम पर जाना बताता है कि कई मांओं के लिए उम्र सिर्फ एक नंबर होती है. जब घर में कोई उनकी तरफ उम्मीद से देख रहा हो, तो थकान, उम्र और आराम सब पीछे छूट जाते हैं. करुणा ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा अपने बच्चों के लिए लगा दिया. अब उनकी कहानी सिर्फ उनकी मजबूरी की कहानी नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाली कहानी भी है कि ऐसे बुजुर्ग देखभाल करने वालों को भी समाज और सिस्टम के सहारे की उतनी ही जरूरत है, जितनी उनके परिवार को.
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