एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा का मामला इन दिनों काफी चर्चा में है. NCLT ने पहले करीब 22,006 करोड़ रुपये के पर्सनल इंसॉल्वेंसी केस में सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी थी. हालांकि, 1 सितंबर को पांच सदस्यीय बेंच ने पुराने ऑर्डर पर रोक लगा दी. इस मामले में बारबार NCLT यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल का नाम सामने आया है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर NCLT काम कैसे करता है? क्या NCLT किसी व्यक्ति या कंपनी का लोन माफ कर देता है? कौन तय करता है कि कर्ज देने वाले को कितना पैसा वापस मिलेगा और अगर कोई कंपनी कर्ज नहीं चुका पाती तो उसके साथ आगे क्या होता है?

NCLT खुद किसी का लोन माफ नहीं करता. यह एक क्वासीज्यूडिशियल यानी अर्धन्यायिक संस्था है, जो कंपनियों से जुड़े विवादों और आईबीसी के तहत कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी मामलों में कानूनी फैसले और मंजूरी देता है. आईबीसी के तहत कर्ज देने वाले और कंपनी के बीच होने वाली रिजॉल्यूशन प्रोसेस में कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स यानी सीओसी की भूमिका बेहद अहम होती है, जबकि NCLT इस प्रोसेस की कानूनी निगरानी करता है. मार्च 2026 तक आईबीसी के तहत 8,987 सीआईआरपी केस दाखिल हुए. इनमें 1,419 कॉरपोरेट डेटर्स को अप्रूव्ड रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए सुलझाया गया. इन रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए कर्ज देने वालों ने करीब 4.32 लाख करोड़ रुपये हासिल किए. इसके अलावा कई मामले समझौते, अपील, रिव्यू और सेक्शन 12ए के तहत वापस लेने जैसे रास्तों से भी बंद हुए. हालांकि, यहां एक बात समझना होगा की सुभाष चंद्रा का मामला पर्सलन इंसॉल्वेंसी से जुड़ा हुआ है जबकि ये केस सीआईआरपी के तहत आए हैं.

कैसे काम करता है NCLT ?

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी NCLT की स्थापना 1 जून 2016 को कंपनीज एक्ट, 2013 की धारा 408 के तहत हुई थी. इसका मकसद कंपनियों से जुड़े मामलों के लिए एक स्पेशल फोरम बनाना था, जहां कंपनी लॉ और इंसॉल्वेंसी से जुड़े मामलों का निपटारा हो सके. इसी बीच सरकार ने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी, 2016 लागू किया और NCLT को कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी मामलों में एडज्यूडिकेटिंग अथॉरिटी यानी फैसला देने वाली संस्था बनाया गया. NCLT के फैसले के खिलाफ एनसीएलएटी में अपील की जा सकती है और कुछ मामलों में आगे सुप्रीम कोर्ट का रास्ता भी खुलता है. NCLT का काम सिर्फ दिवालिया कंपनियों तक सीमित नहीं है. यह कंपनियों के रिस्ट्रक्चरिंग, मर्जर, समझौते, कंपनी बंद करने और इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन जैसे मामलों की भी सुनवाई करता है.

ये है पूरी प्रक्रिया

NCLT के जरिए किसी कंपनी के डिफॉल्ट से लेकर रिजॉल्यूशन या लिक्विडेशन तक की पूरी प्रोसेस को ऐसे समझ सकते हैं. सबसे जरूरी बात यह है कि NCLT खुद कंपनी चलाकर कर्ज नहीं वसूलता. IBC में कंपनी के कर्ज का समाधान एक तय प्रोसेस से होता है, जिसमें इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल, सीओसी और NCLT की अलगअलग भूमिका होती है.

1. डिफॉल्ट से शुरू होता है प्रोसेस

जब कोई कंपनी अपना कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट करती है यानी कर्ज नहीं चुका पाती है तो इसके बाद फाइनेंशियल क्रेडिटर, जैसे बैंक या वित्तीय संस्था, या ऑपरेशनल क्रेडिटर जैसे सप्लायर, IBC के तहत इंसॉल्वेंसी प्रोसेस शुरू कराने के लिए NCLT का रुख कर सकते हैं. कुछ परिस्थितियों में कंपनी खुद भी अपने खिलाफ सीआईआरपी शुरू करने के लिए आवेदन कर सकती है. यहीं से NCLT की भूमिका शुरू होती है. NCLT यह देखता है कि वास्तव में डिफॉल्ट हुआ है या नहीं और आवेदन कानून की शर्तों को पूरा करता है या नहीं.

2. NCLT तय करता है केस लेना है या नहीं

NCLT आवेदन, डिफॉल्ट और जरूरी दस्तावेजों की जांच करता है. आवेदन स्वीकार होने के बाद कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस यानी सीआईआरपी शुरू हो जाता है. कानून में आवेदन पर 14 दिन के भीतर फैसला करने का प्रावधान है. अगर इस समय में फैसला नहीं होता तो देरी की वजह रिकॉर्ड करनी होती है.

3. कंपनी पर मोरेटोरियम लग जाता है

सीआईआरपी शुरू होते ही कंपनी पर मोरेटोरियम लागू हो जाता है. आसान भाषा में इसे कंपनी के लिए एक तरह का ‘पॉज पीरियड’ समझ सकते हैं. इस दौरान कंपनी के खिलाफ कई तरह की रिकवरी कार्रवाई और उसकी संपत्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक रहती है. इसका मकसद यह है कि अलगअलग कर्ज देने वाले कंपनी की संपत्ति अपनेअपने तरीके से हासिल करने की कोशिश न करें और कंपनी को एक व्यवस्थित रिजॉल्यूशन प्रोसेस के तहत बचाने का मौका मिले.

4. आईआरपी कंपनी की कमान संभालता है

सीआईआरपी शुरू होने के बाद इंटरिम रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल यानी आईआरपी की नियुक्ति होती है. इसके बाद कंपनी के प्रमोटर और पुराने मैनेजमेंट की भूमिका सीमित हो जाती है. आईआरपी कंपनी के कामकाज, संपत्तियों और वित्तीय स्थिति की जानकारी जुटाता है और इंसॉल्वेंसी प्रोसेस को आगे बढ़ाता है. इस दौरान कोशिश होती है कि कंपनी की संपत्ति और कारोबार की वैल्यू बनी रहे.

5. सभी कर्ज देने वालों के दावे लिए जाते हैं

आईआरपी कंपनी के सभी कर्ज देने वालों से उनके बकाये के क्लेम यानी दावे मंगाता है. उदाहरण के लिए किसी कंपनी पर बैंक का 500 करोड़, सप्लायर का 50 करोड़ और दूसरे कर्ज देने वालों का 100 करोड़ रुपये बकाया है तो इन दावों को इकट्ठा करके उनकी जांच की जाती है. इसके बाद पात्र फाइनेंशियल क्रेडिटर्स की कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स यानी सीओसी बनाई जाती है.

6. सीओसी तय करती है कंपनी का भविष्य

यह इंसॉल्वेंसी प्रोसेस का सबसे अहम हिस्सा है. सीओसी में मुख्य रूप से फाइनेंशियल क्रेडिटर्स होते हैं. कंपनी के भविष्य से जुड़े कई बड़े कमर्शियल फैसले यही कमेटी लेती है. रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल संभावित खरीदारों, निवेशकों या दूसरी योग्य कंपनियों से रिजॉल्यूशन प्लान मंगाता है. इन प्लान में बताया जाता है कि कंपनी को कैसे बचाया जाएगा, कर्ज देने वालों को कितना पैसा मिलेगा और कंपनी का कारोबार आगे कैसे चलेगा. यानी यहां यह तय करने की कोशिश होती है कि कंपनी को बंद करने के बजाय किसी नए मालिक या निवेशक के जरिए बचाया जा सकता है या नहीं.

7. कंपनी खरीदने की बोली लगती है

अब संभावित बिडर्स अपनीअपनी योजनाएं पेश करते हैं. मान लीजिए किसी कंपनी पर कुल 1,000 करोड़ रुपये का कर्ज है. कोई बिडर 300 करोड़ रुपये का प्रस्ताव देता है, जबकि दूसरा 400 करोड़ रुपये देने को तैयार है. सीओसी इन प्रस्तावों को सिर्फ रकम के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे रिजॉल्यूशन प्लान के आधार पर देखती है. इसमें यह भी देखा जाता है कि कंपनी का कारोबार कैसे चलेगा और कर्ज देने वालों को कितना फायदा मिलेगा. यही वजह है कि किसी इंसॉल्वेंसी केस में कंपनी के कुल बकाये और कर्ज देने वालों को मिलने वाली रकम में बड़ा अंतर हो सकता है. इसे सीधे तौर पर ‘लोन माफ’ कहना सही नहीं है. असल में यह इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन के तहत कर्ज के सेटलमेंट या रिस्ट्रक्चरिंग का नतीजा होता है.

8. फिर NCLT की मंजूरी जरूरी

सीओसी किसी रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी देती है तो वह NCLT के पास जाता है. NCLT यह देखता है कि रिजॉल्यूशन प्लान आईबीसी और दूसरे लागू कानूनों की शर्तों के मुताबिक है या नहीं. कानून के मुताबिक होने पर NCLT इसे मंजूरी दे सकता है. मंजूरी मिलने के बाद रिजॉल्यूशन प्लान लागू होता है और उसके मुताबिक कंपनी के मालिकाना हक, मैनेजमेंट और कर्ज चुकाने की व्यवस्था में बदलाव हो सकता है. यहां यह समझना जरूरी है कि NCLT का काम सीओसी की कमर्शियल चॉइस की जगह खुद कीमत तय करना नहीं है. उसकी भूमिका यह देखना है कि मंजूर किया गया प्लान कानून के मुताबिक है या नहीं.

9. कंपनी नहीं बची तो लिक्विडेशन

अगर तय प्रोसेस के दौरान कंपनी के लिए कोई वायबल यानी चलने लायक रिजॉल्यूशन प्लान नहीं मिलता या रिजॉल्यूशन संभव नहीं होता, तो कंपनी लिक्विडेशन की तरफ जा सकती है. लिक्विडेशन का मतलब आसान भाषा में कंपनी की संपत्तियों को बेचकर उससे मिले पैसे से कर्ज देने वालों का भुगतान करना है. इस रकम को आईबीसी के वॉटरफॉल सिस्टम के तहत तय प्राथमिकता के अनुसार बांटा जाता है. यानी हर कर्ज देने वाले को मनमाने तरीके से पैसा नहीं मिलता, बल्कि कानून में भुगतान की एक तय प्राथमिकता होती है.

10. पूरी प्रक्रिया के लिए टाइम लिमिट

आईबीसी की बड़ी खासियतों में से एक इसकी टाइमबाउंड रिजॉल्यूशन प्रोसेस है. सीआईआरपी को सामान्य तौर पर 180 दिन के भीतर पूरा करने का प्रावधान है. कुछ परिस्थितियों में इसे बढ़ाया जा सकता है और कुल समयसीमा सामान्य तौर पर 330 दिन तक जा सकती है. हालांकि व्यवहार में कई मामलों में यह समयसीमा पार हो जाती है. इसकी बड़ी वजह NCLT और दूसरी अदालतों में चलने वाली कानूनी कार्रवाई और अलगअलग स्तर पर होने वाली देरी है.

10 साल में 1,419 केस कैसे सुलझे?

मार्च 2026 तक आईबीसी के तहत 8,987 सीआईआरपी केस दाखिल हुए. इनमें 1,419 कॉरपोरेट डेटर्स को अप्रूव्ड रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए सुलझाया गया. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। इन मामलों से कर्ज देने वालों ने करीब 4.32 लाख करोड़ रुपये हासिल किए. पीआईबी के अनुसार यह रिकवरी लिक्विडेशन वैल्यू के करीब 116.85% और फेयर वैल्यू के 94.56% से ज्यादा थी. हालांकि बाकी सभी मामले रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए ही खत्म नहीं हुए. कई केस सेटलमेंट, अपील, रिव्यू और सेक्शन 12ए के तहत विदड्रॉवल जैसे रास्तों से भी बंद हुए. यानी NCLT और आईबीसी का मकसद सिर्फ कंपनी को दिवालिया घोषित करना नहीं है. पहली कोशिश यह होती है कि अगर कारोबार को बचाया जा सकता है तो उसे बचाया जाए, उसकी वैल्यू बनी रहे और कर्ज देने वालों को लिक्विडेशन की तुलना में बेहतर रिकवरी मिल सके.