अगर आपको इनकम टैक्स विभाग से रीअसेसमेंट नोटिस मिला है, तो सबसे पहले यही लगता है कि टैक्स की मांग गलत है और उसे साबित करना होगा. लेकिन कई बार मामला सिर्फ टैक्स का नहीं होता, बल्कि यह भी अहम होता है कि क्या विभाग ने नोटिस जारी करते समय कानून में तय प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया है या नहीं.

हाल ही में इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल , पुणे बेंच ने एक अहम फैसला दिया है, जिससे ऐसे टैक्सपेयर्स को बड़ी राहत मिल सकती है जिन्हें रीअसेसमेंट नोटिस मिला है. ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर इनकम टैक्स विभाग ने तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, तो पूरा रीअसेसमेंट ही रद्द किया जा सकता है.

क्या था मामला?

यह मामला संज्योत जय शेठ बनाम इनकम टैक्स ऑफिसर का है. 2 जुलाई 2026 को आए इस फैसले में ITAT ने पाया कि विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 148A और 148 के तहत रीअसेसमेंट शुरू करते समय कई गंभीर प्रक्रियागत गलतियां कीं.

टैक्स विभाग ने पहले नोटिस में आरोप लगाया कि टैक्सपेयर्स ने एक प्रॉपर्टी बेचकर आय छिपाई है. लेकिन बाद में जो अंतिम आदेश जारी किया गया, उसमें आरोप पूरी तरह बदल गया. अब विभाग ने कहा कि कम कीमत पर प्रॉपर्टी खरीदने के कारण लगभग 3.45 करोड़ रुपये की आय छिपाई गई है.

ITAT ने क्यों रद्द किया नोटिस?

ट्रिब्यूनल ने कहा कि नोटिस और अंतिम आदेश में लगाए गए आरोप एकदूसरे से पूरी तरह अलग थे. टैक्सपेयर्स को जिस आरोप का जवाब देने का मौका दिया गया, अंतिम कार्रवाई उससे अलग आधार पर की गई. यह कानून के खिलाफ है.

ITAT ने साफ कहा कि अगर जांच अधिकारी किसी नए या अलग मुद्दे पर कार्रवाई करना चाहता है, तो उसे पहले धारा 148A के तहत नया नोटिस जारी करना होगा और टैक्सपेयर्स को जवाब देने का पूरा मौका देना होगा.

समय सीमा का भी नहीं हुआ पालन

ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि विभाग ने नोटिस तय समय सीमा के बाद जारी किया. सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले के मुताबिक विभाग को निर्धारित समय के भीतर अगली कार्रवाई करनी थी, लेकिन नोटिस देरी से जारी किया गया. इसलिए यह भी कानून के मुताबिक वैध नहीं माना गया.

टैक्सपेयर्स के क्या हैं अधिकार?

चार्टर्ड अकाउंटेंट डॉ. सुरेश सुराना के अनुसार, रीअसेसमेंट शुरू करने से पहले विभाग के पास यह साबित करने वाली ठोस जानकारी होनी चाहिए कि किसी आय का सही आकलन नहीं हुआ है.

इसके बाद विभाग को:

  • धारा 148A के तहत कारण बताते हुए नोटिस भेजना होगा.
  • टैक्सपेयर्स को जवाब देने का पूरा मौका देना होगा.
  • जवाब पर विचार करने के बाद ही धारा 148A के तहत आदेश जारी करना होगा.
  • अंतिम आदेश उसी आधार पर होना चाहिए, जिसका जिक्र पहले नोटिस में किया गया था.
  • अगर विभाग बाद में नया आरोप जोड़ता है, तो उसे नया नोटिस जारी करना जरूरी होगा.

कब देना होगा नया नोटिस?

अगर जांच अधिकारी प्रॉपर्टी, लेनदेन, रकम, आय के स्रोत या टैक्स जोड़ने के आधार में बड़ा बदलाव करता है, तो उसे नया 148A नोटिस जारी करना होगा. सिर्फ छोटीमोटी तकनीकी गलती या स्पष्टीकरण के लिए नया नोटिस जरूरी नहीं होता.

नोटिस मिलने पर क्या करें?

अगर आपको रीअसेसमेंट नोटिस मिलता है, तो उसे नजरअंदाज बिल्कुल न करें. अगर नोटिस में गलत जानकारी, गलत प्रॉपर्टी, गलत रकम या किसी और व्यक्ति का लेनदेन दिखाया गया है, तो तय समय के भीतर विस्तार से जवाब दें.

अपने जवाब के साथ सेल डीड, बैंक स्टेटमेंट, प्रॉपर्टी के दस्तावेज, ITR और अन्य जरूरी रिकॉर्ड भी जमा करें. साथ ही विभाग से उस जानकारी की कॉपी भी मांगें, जिसके आधार पर नोटिस जारी किया गया है.

आम टैक्सपेयर्स के लिए क्या सबक?

यह फैसला बताता है कि इनकम टैक्स विभाग किसी एक आरोप के आधार पर नोटिस भेजकर बाद में किसी दूसरे आधार पर रीअसेसमेंट नहीं कर सकता. अगर विभाग ने कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया है या समय सीमा का उल्लंघन किया है, तो टैक्सपेयर्स के पास उस नोटिस को कानूनी तौर पर चुनौती देने का अधिकार है. इसलिए कोई भी टैक्स नोटिस मिलने पर समय रहते जवाब देना और जरूरत पड़ने पर टैक्स विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहद जरूरी है.