देश के सरकारी बैंकों का करीब 2.85 लाख करोड़ रुपये खतरे में है. यह कोई छोटीमोटी रकम नहीं है, बल्कि आम जनता की गाढ़ी कमाई का वो पैसा है जिसे लोगों ने कर्ज के रूप में लिया और अब जानबूझकर लौटा नहीं रहे हैं. संसद में हाल ही में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने इस भारीभरकम बकाये को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की है. उनके मुताबिक, 30 जून 2026 तक ऐसे बकायेदारों की संख्या लगभग 16 हजार तक पहुंच चुकी है, जिन्होंने 25 लाख रुपये या उससे अधिक का लोन लिया था.

जानबूझकर कर्ज डकारने वालों की पूरी कुंडली
संसद भवन में दिए गए लिखित जवाब में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी को भी फिक्र में डाल सकते हैं. सरकार ने साफ किया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कुल 15,930 ऐसे खाते हैं, जिन्हें ‘विलफुल डिफॉल्टर’ यानी जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाला घोषित किया जा चुका है. इन सभी पर कम से कम 25 लाख रुपये या इससे ज्यादा का बकाया है. जब इन सभी डिफाल्टरों की रकम को जोड़ा गया, तो कुल आंकड़ा 2,85,015 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया. यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब कर्जदार के पास पैसा चुकाने की क्षमता होती है, लेकिन वह बैंक का पैसा वापस करने की नीयत ही नहीं रखता.
7 हजार से ज्यादा बकायेदारों पर क्रिमिनल केस
इस भारी नुकसान को देखते हुए सरकार ने अब सख्ती बरतनी शुरू कर दी है. बकायेदारों पर शिकंजा कसने की पूरी तैयारी हो चुकी है. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। वित्त राज्य मंत्री की रिपोर्ट के मुताबिक, इन 15,930 मामलों में से 7,190 केस ऐसे हैं जहां सीधे तौर पर आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है. यानी, अब कर्ज लेकर भागने या उसे जानबूझकर न चुकाने वालों को सीधे कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ेगा. बैंकों ने अपने बकाये की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रियाओं की रफ्तार तेज कर दी है. इसके तहत अदालतों में रिकवरी सूट दायर किए जा रहे हैं ताकि पैसे की जल्द से जल्द वापसी हो सके.
संपत्ति जब्त करने का कड़ा कानून
कानूनी मुकदमों के साथसाथ कर्ज वसूली के लिए बैंक सरफेसी अधिनियम जैसे सख्त कानूनों का भी भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं. इस कानून के तहत बैंकों को यह अधिकार मिलता है कि वे कोर्ट के लंबे चक्कर काटे बिना ही डिफॉल्टर की गिरवी रखी गई संपत्ति को जब्त करके अपना पैसा वसूल सकें. इसके अलावा, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों का भी कड़ाई से पालन किया जा रहा है. आरबीआई की गाइडलाइन के तहत 25 लाख या उससे ज्यादा के हर डिफाल्टर का पूरा ब्यौरा क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनियों के सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर डाल दिया गया है.



