हम रोज सुबह उठकर जिस टूथपेस्ट का इस्तेमाल करते हैं, नहाने के लिए जो साबुन लगाते हैं या चाय के साथ जो बिस्कुट खाते हैं, उन्हें बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में इन दिनों भारी हलचल है. शेयर बाजार भले ही अपनी चाल चल रहा हो, लेकिन विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इन रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियों, जिन्हें हम FMCG सेक्टर कहते हैं, उनसे एक तरह से किनारा कर लिया है. यह कोई एकदो दिन की बात नहीं है, बल्कि पिछले 12 महीनों से विदेशी निवेशक लगातार इन कंपनियों के शेयर बेच रहे हैं. निवेशक अब यह सोचकर परेशान हैं कि क्या इन दिग्गज कंपनियों का सुनहरा दौर सच में खत्म हो गया है या फिर यह गिरावट सस्ते में शेयर खरीदने का एक मौका है.

अगर हम पूरे बाजार की बात करें तो सितंबर 2024 में जब बाजार ने अपना पिछला शिखर छुआ था, तब से विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने कुल 57 अरब डॉलर बाजार से निकाले हैं. इसमें से करीब 27 अरब डॉलर तो केवल इसी साल 2026 में निकाले गए हैं. हालांकि, मार्च से जून तक की भारी बिकवाली के बाद जुलाई 2026 में विदेशी निवेशकों ने बाजार में कुल 2.5 अरब डॉलर का निवेश किया, जो पिछले 13 महीनों में उनका सबसे बड़ा निवेश था. लेकिन हैरानी की बात यह है कि बाजार में इस वापसी के बावजूद FMCG सेक्टर के लिए उनकी बेरुखी कम नहीं हुई.

बड़े शेयरों का गिरता ग्राफ

एनएसडीएल के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल हर महीने FMCG सेक्टर से विदेशी पैसा बाहर गया है. केवल जुलाई महीने में ही 1,103 करोड़ रुपये की निकासी हुई है. अगर पूरे साल 2026 की बात करें तो अब तक इस सेक्टर से 28,276 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं. पिछले 12 महीनों का कुल हिसाब देखें तो विदेशी निवेशकों ने एफएमसीजी शेयरों से 5.25 अरब डॉलर की भारी भरकम रकम निकाल ली है. इसका असर कंपनियों के शेयरों की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है.

पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो हिंदुस्तान यूनिलीवर के शेयर 18 फीसदी गिर चुके हैं. सिगरेट और बिस्कुट बनाने वाली कंपनी आईटीसी के शेयरों में 34 फीसदी की भारी गिरावट आई है, जबकि डाबर के शेयर 20 फीसदी तक टूट चुके हैं. इसी साल में टाटा कंज्यूमर के शेयर भी 9 फीसदी नीचे आ गए हैं. हालांकि, इस भारी बिकवाली के बीच नेस्ले इंडिया और ब्रिटानिया जैसी कंपनियां अपवाद रही हैं. नेस्ले के शेयरों में पिछले एक साल में 35 फीसदी का उछाल आया है, और ब्रिटानिया ने भी 4 फीसदी की मामूली बढ़त हासिल की है.

विदेशी निवेशकों के दूर जाने की असली वजह

आखिर इतना सुरक्षित माने जाने वाले इस सेक्टर से निवेशक क्यों भाग रहे हैं? अबाकस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के हेड ऑफ इक्विटीज, अमन चौहान बताते हैं कि एफएमसीजी हमेशा से विदेशी निवेशकों के लिए एक सुरक्षित निवेश वाला क्षेत्र रहा है. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। लेकिन अब इन कंपनियों की ग्रोथ सिंगल डिजिट में सिमट गई है और इनके शेयरों की कीमत बहुत ज्यादा हो गई है. जब भी विकास दर धीमी होती है, तो महंगे शेयरों में गिरावट आना तय होता है. इसके अलावा, कमजोर मानसून ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.

कोटक सिक्योरिटीज के अमित अग्रवाल के मुताबिक, लगातार बिकवाली के कई कारण हैं. इनमें कच्चे माल का महंगा होना, मुनाफे में कमी, ग्रामीण इलाकों में मांग का सुस्त पड़ना और शहरी ग्राहकों द्वारा सस्ते विकल्पों की तरफ जाना शामिल है. इसके अलावा, क्विक कॉमर्स कंपनियों से मिल रही कड़ी टक्कर भी इन पारंपरिक कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी को कम कर रही है. वेंचुरा के विनीत बोलिंजकर का कहना है कि निवेशक इन कंपनियों के व्यापार की क्वालिटी पर शक नहीं कर रहे हैं, बल्कि सवाल यह है कि जब भविष्य में कमाई की रफ्तार अनिश्चित है, तो वे इन शेयरों के लिए इतनी ऊंची कीमत क्यों चुकाएं.

कमाई का गणित महंगाई का असर

वित्तीय वर्ष 2027 को लेकर भी बाजार के जानकार बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं. हालांकि, पहली तिमाही के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि कंपनियों ने यह मुनाफा अपने पास पहले से मौजूद सस्ते कच्चे माल की वजह से कमाया है. अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो दूसरी तिमाही से कंपनियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स का खर्च बढ़ने से कंपनियों पर दबाव पड़ेगा.

क्रिसिल की एक रिपोर्ट भी यही इशारा करती है कि इस साल संगठित एफएमसीजी कंपनियों की कमाई 810 फीसदी तक बढ़ सकती है, लेकिन सामान की असल बिक्री सिर्फ 23 फीसदी ही बढ़ने की उम्मीद है. इसका सीधा मतलब यह है कि कंपनियां अपना मार्जिन बचाने के लिए उत्पादों की कीमतें बढ़ाएंगी, न कि ज्यादा सामान बेचकर मुनाफा कमाएंगी. हालांकि, महंगाई का सारा बोझ आम जनता पर डालना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि कीमतें एक सीमा से ज्यादा बढ़ने पर खपत पर बुरा असर पड़ता है.

विदेशी निवेशक वापस कब लौटेंगे

आनंद राठी की तनवी कंचन बताती हैं कि यह सिर्फ ऊंचे वैल्यूएशन का मामला नहीं है. अभी कंज्यूमर स्टेपल्स के शेयर अपनी 10 साल की औसत पीई 50.4x के मुकाबले 46.3x पर कारोबार कर रहे हैं, जो ऐतिहासिक औसत से 8% कम है. इसका मतलब है कि विदेशी निवेशक सिर्फ इसलिए नहीं बेच रहे हैं कि शेयर अपने पुराने औसत से महंगे हैं, बल्कि उन्हें भविष्य में कंपनियों की कमाई बढ़ने पर शक है.

विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशक तभी वापस लौटेंगे जब तीन चीजें होंगी. पहला, ग्रामीण और शहरी इलाकों में सामान की बिक्री फिर से रफ्तार पकड़े. दूसरा, कच्चे तेल और कच्चे माल की कीमतें कम हों ताकि कंपनियों का मुनाफा बिना दाम बढ़ाए बढ़ सके. तीसरा, शेयरों की कीमतें आकर्षक स्तर पर आएं और कंपनियों की असल कमाई में सुधार हो. कैपिटलमाइंड के सीईओ दीपक शेनॉय का नजरिया थोड़ा और सख्त है.

उनका कहना है कि 75 गुना पीई मल्टीपल पर शेयर खरीदने पर अच्छा रिटर्न मिलना मुश्किल है, भले ही मैरिको, कोलगेट या नेस्ले जैसी कंपनियों के नतीजे अच्छे क्यों न हों. इसलिए वे फिलहाल इस सेक्टर से पूरी तरह दूर रहने की सलाह देते हैं. जब तक कमोडिटी बाजार में स्थिरता नहीं आती और बिक्री के आंकड़ों में मजबूती नहीं दिखती, तब तक इस सेक्टर में कोई बड़ा बदलाव आना मुश्किल लग रहा है.

Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए. TV9 भारतवर्ष अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है.