Lucknow News: उत्तर प्रदेश में गंभीर बीमारी का इलाज कराने के लिए मरीज बड़े प्राइवेट अस्पतालों का रुख तो कर रहे हैं, लेकिन यहां इलाज का खर्च आम परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. मरीजों के अनुभव के मुताबिक, सामान्य वार्ड में भर्ती होने के बावजूद दवा, जांच, डॉक्टर की फीस, डाइट और दूसरे जरूरी सामान को जोड़ने के बाद रोजाना का खर्च 55 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक पहुंच रहा है. ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस वाले मरीजों को कुछ राहत मिलती है, लेकिन जिनके पास बीमा नहीं है, उनके लिए इलाज का खर्च जुटाना मुश्किल हो जाता है.

कैंसर के इलाज में एक हफ्ते का बिल करीब 6 लाख
प्रयागराज निवासी संगम साइमन रेक्टम कैंसर से पीड़ित हैं. उनका पिछले करीब छह महीने से लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज चल रहा है. सर्जरी के दौरान उन्हें करीब एक सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा. संगम के मुताबिक, सामान्य वार्ड में भर्ती रहने के बावजूद सात दिन का बिल करीब छह लाख रुपए आया. यानी औसतन एक दिन का खर्च करीब एक लाख रुपए रहा.
संगम के पास हेल्थ इंश्योरेंस होने की वजह से इलाज के दौरान उन्हें पैसों की तत्काल परेशानी नहीं हुई. हालांकि, अस्पताल के बिल के अलावा भी कई खर्चे हुए. प्रयागराज से लखनऊ आनेजाने, परिवार के लिए लखनऊ में कमरा किराए पर लेने और इंश्योरेंस में शामिल नहीं होने वाले कंज्यूमेबल्स पर भी पैसा खर्च हुआ.
सरकारी अस्पताल में समय और भीड़ से परेशान हुए
संगम साइमन बताते हैं कि शुरुआत में उन्होंने सरकारी अस्पताल में इलाज कराने की कोशिश की थी. उनका कहना है कि वहां बायोप्सी जैसे जरूरी टेस्ट की रिपोर्ट को लेकर परेशानी हुई और कई बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़े. भीड़ और लंबी प्रक्रिया के कारण इलाज में समय लग रहा था.
इसके बाद उन्होंने बड़े प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने का फैसला किया. उनका कहना है कि यहां इलाज महंगा जरूर है, लेकिन वह उपचार से संतुष्ट हैं. उनके मुताबिक, अस्पताल में कंज्यूमेबल्स को बाहर से खरीदकर लाने का विकल्प भी दिया गया, जिससे उन्हें कुछ राहत मिली.
स्पाइन के इलाज में 3 दिन में 1.60 लाख खर्च
दूसरी केस स्टडी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने वाले विश्वेत कुमार की है. वह सामान्य परिवार से आते हैं और अपनी नौकरी से परिवार का खर्च चलाते हैं. स्पाइन की समस्या के इलाज के लिए उन्हें लखनऊ के प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. विश्वेत तीन दिन अस्पताल में भर्ती रहे और डिस्चार्ज के समय उनका कुल बिल करीब 1.60 लाख रुपए आया.
उनके लिए यह रकम काफी बड़ी है, लेकिन उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में होने वाली भीड़ और परेशानी को देखते हुए उन्होंने प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराना बेहतर समझा. विश्वेत का कहना है कि इलाज बहुत महंगा है और सरकार को इस दिशा में कुछ कदम उठाने चाहिए, ताकि सामान्य परिवारों को गंभीर बीमारी के इलाज के लिए आर्थिक परेशानी न उठानी पड़े.
किडनी के मरीज के इलाज में 8 लाख खर्च
मऊ जिले के रहने वाले राम समुझ यादव किसान हैं. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। उनके समधी किडनी की समस्या के चलते लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हैं. इससे पहले उनका इलाज स्थानीय स्तर पर चल रहा था, लेकिन परेशानी बढ़ने के बाद परिवार को बड़े अस्पताल का रुख करना पड़ा. राम समुझ बताते हैं कि अब तक करीब आठ लाख रुपए खर्च हो चुके हैं.
परिवार और रिश्तेदारों ने मिलकर इलाज के लिए पैसे जुटाए हैं. उन्हें चिंता है कि आगे इलाज में कितना खर्च होगा. उनका कहना है कि आम लोगों को यह आसानी से समझ नहीं आता कि अस्पताल के बिल में किस चीज का कितना खर्च जुड़ रहा है. परिवार से बारबार पैसे जमा कराने के लिए कहा जाता है, जबकि रोजाना करीब एक लाख रुपए तक खर्च हो रहा है.
ICU में रोजाना 80 हजार से एक लाख तक खर्च
अन्य मरीजों से मिली जानकारी के मुताबिक, ICU में भर्ती किडनी फेलियर और डेंगू के मरीजों का रोजाना खर्च करीब 80 हजार से एक लाख रुपए तक बताया गया. वहीं, सामान्य वार्ड में बेड का चार्ज करीब 3,600 रुपए प्रतिदिन है, लेकिन मरीज का कुल खर्च केवल बेड तक सीमित नहीं रहता. डॉक्टर की विजिट, दवाइयां, अलगअलग जांच, डाइट और अन्य जरूरी सामान जुड़ने के बाद बिल तेजी से बढ़ जाता है. यही वजह है कि सामान्य वार्ड में भर्ती मरीज का भी एक दिन का कुल खर्च 50 से 70 हजार रुपए तक पहुंच सकता है.
बेड सस्ता, लेकिन बाकी खर्च बढ़ा देता है बिल
अगर केवल बेड के किराए की तुलना की जाए तो यह किसी अच्छे होटल के कमरे से बहुत ज्यादा नहीं लगता, लेकिन अस्पताल में मरीज को बेड के अलावा लगातार दवाइयां, टेस्ट, डॉक्टर की निगरानी और कई तरह के कंज्यूमेबल्स की जरूरत होती है. इन्हीं खर्चों को जोड़ने पर अस्पताल का कुल बिल काफी बढ़ जाता है.
मरीजों का कहना है कि गंभीर बीमारियों के इलाज में हेल्थ इंश्योरेंस काफी मददगार साबित हो रहा है. वहीं, जिन परिवारों के पास बीमा नहीं है, उन्हें रिश्तेदारों से उधार लेने या अपनी जमा पूंजी खर्च करने तक की नौबत आ जाती है. इन मरीजों के अनुभवों से एक तरफ सरकारी अस्पतालों में बेहतर व्यवस्था और सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत सामने आती है, वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की बढ़ती लागत को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं.



