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समस्तीपुर के एक 25 साल पुराने हत्या मामले में पटना हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने हत्या के आरोपी रंजीत कुमार झा को बरी कर दिया है. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी में इतने विरोधाभास और कमियां हैं कि उसके आधार पर हत्या की सजा को कायम रखना सुरक्षित नहीं है. कोर्ट के मुताबिक, आखिरकार यह मामला आरोपी के खिलाफ “कोई सबूत नहीं” होने की स्थिति में पहुंच गया.

रंजीत कुमार झा को 2009 में हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया था. हाई कोर्ट में अपील पर फैसला आने से पहले वह करीब 16 साल जेल में रह चुके थे.

क्या हुआ था 5 अक्टूबर 2000 की रात?

घटना 5 अक्टूबर 2000 की रात करीब 9 बजे की बताई गई है. समस्तीपुर के बोरितार पुल के पास दो गोलियां चलने की आवाज सुनाई दी थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार, गोली की आवाज सुनकर चंद्र कुमार झा टॉर्च लेकर मौके पर पहुंचे. उनका दावा था कि उन्होंने रंजीत कुमार झा को अपने भाई पवन कुमार झा पर गोली चलाते देखा. इसके बाद रंजीत कथित तौर पर दो अन्य लोगों के साथ वहां से भाग गया. पवन कुमार झा खून से लथपथ हालत में थे. उनके पास एक पिस्तौल भी पड़ी होने की बात कही गई थी.

क्या था विवाद?

अभियोजन की कहानी में हत्या की वजह 3,300 रुपये का विवाद बताया गया था. आरोप था कि रंजीत कुमार झा ने पवन कुमार झा के सोते समय उनके पैसे ले लिए थे. इसके बाद कथित तौर पर पंचायत बुलाई गई और रंजीत को पैसे वापस करने के लिए कहा गया. हालांकि, हाई कोर्ट ने इस कथित पंचायत को लेकर पेश किए गए सबूतों को भरोसेमंद नहीं माना.

क्या गवाहों के बयान में अंतर?

अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी के बयान और अभियोजन पक्ष के एक गवाह की बातों में अंतर था. सवाल यह था कि क्या उस गवाह ने पुलिस जांच के दौरान कथित पंचायत का जिक्र किया भी था या नहीं. इसके अलावा, पंचायत में मौजूद बताए गए कई लोगों को पुलिस ने गवाह के तौर पर पेश नहीं किया. इससे अभियोजन की कहानी पर और सवाल खड़े हुए.

टॉर्च वाली गवाही कैसे संदेह के घेरे में?

मामले की कथित चश्मदीद गवाही भी हाई कोर्ट के सामने टिक नहीं सकी. गवाही देने वाले ने अदालत में कहा था कि उसने टॉर्च की रोशनी में रंजीत कुमार झा को गोली चलाते देखा था. लेकिन जांच अधिकारी ने बताया कि पुलिस को दिए गए शुरुआती बयान में गवाह ने ऐसा दावा नहीं किया था.

सबसे अहम बात यह रही कि जिस टॉर्च की रोशनी में आरोपी को पहचानने का दावा किया गया था, पुलिस ने उस टॉर्च को बरामद नहीं किया. उसे अदालत में भी पेश नहीं किया गया.

गवाहों के बयान एक दूसरे से कैसे अलग?

अदालत ने पाया कि घटना के बाद मौके पर पहुंचने को लेकर भी गवाहों के बयान एक जैसे नहीं थे. एक गवाह ने कहा कि वह करीब दो मिनट में घटनास्थल पर पहुंच गया था, जबकि दूसरे ने बताया कि उसे वहां पहुंचने में करीब 10 मिनट लगे. वहीं, अभियोजन पक्ष के गवाह चंद्रशेखर झा ने कहा कि उसने न तो गोली चलाने वाले व्यक्ति को देखा और न ही किसी को घटनास्थल से भागते हुए देखा था.

स्वतंत्र गवाह नहीं होने पर भी उठे सवाल

हाई कोर्ट ने गवाहों की निष्पक्षता पर भी गौर किया. अदालत के मुताबिक, कई गवाहों की आरोपी रंजीत कुमार झा से दुश्मनी थी. कुछ लोग ऐसे थे जिन पर रंजीत के दादा की हत्या के मामले में आरोपी होने की बात सामने आई थी. वहीं, कुछ गवाह ऐसे आरोपियों के करीबी रिश्तेदार थे. अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि घटना के समय मौके पर 10 से 20 लोग मौजूद थे. इसके बावजूद किसी स्वतंत्र गवाह को अदालत में पेश नहीं किया गया.

FIR में चार दिन की देरी ने बढ़ाया संदेह

मामले में FIR की प्रक्रिया भी अभियोजन के लिए परेशानी का कारण बनी. रिकॉर्ड के मुताबिक FIR 5 अक्टूबर को दर्ज की गई थी, लेकिन इसकी कॉपी संबंधित मजिस्ट्रेट तक 9 अक्टूबर को पहुंची. यानी FIR की कॉपी पहुंचने में चार दिन की देरी हुई. इस देरी का कोई स्पष्ट कारण अदालत के सामने नहीं रखा गया.

इनक्वेस्ट रिपोर्ट में क्या थी कमी?

अदालत ने इनक्वेस्ट रिपोर्ट को लेकर भी सवाल उठाए. रिपोर्ट में केस नंबर और उसे तैयार करने का समय दर्ज नहीं था. पवन कुमार झा के शव को अगले दिन सुबह पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया था. सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला देते हुए, जिनमें FIR को जल्द मजिस्ट्रेट तक भेजने को महत्वपूर्ण माना गया है, हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले की परिस्थितियां FIR के बाद में तैयार किए जाने की ओर इशारा करती हैं. इससे अभियोजन की कहानी पर “बहुत बड़ा संदेह” पैदा हुआ.

पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर क्या उठे सवाल?

आरोपी को बरी करने के साथ हाई कोर्ट ने तत्कालीन थाना प्रभारी और जांच अधिकारी की भूमिका पर भी सवाल उठाए. अदालत ने बिहार के DGP को दोनों अधिकारियों के कामकाज की जांच करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने उनके आचरण में “गंभीर लापरवाही” की बात कही और दो महीने के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट देने को कहा.

आरोपी से जुड़े अहम पहलू भी नहीं पूछे गए

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया में भी कमी बताई. अदालत के अनुसार, आरोपी का बयान दर्ज करते समय उसके सामने सभी महत्वपूर्ण परिस्थितियां नहीं रखी गईं. इनमें कथित तौर पर घटनास्थल से उसका भागना और मृतक के परिवार के साथ पुरानी दुश्मनी जैसे पहलू शामिल थे. ये परिस्थितियां CrPC की धारा 313 के तहत आरोपी के सामने रखी जानी चाहिए थीं.

16 साल जेल के बाद मिली कानूनी मदद

कोर्ट ने रंजीत कुमार झा की आर्थिक स्थिति का भी उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि वह गरीब व्यक्ति था और करीब 16 साल छह महीने तक अपनी सजा के खिलाफ अपील नहीं कर सका. हाई कोर्ट ने इस स्थिति के लिए जेल प्रशासन और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका पर भी ध्यान दिलाया. अदालत के मुताबिक, आरोपी को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना इन संस्थाओं की जिम्मेदारी थी.बाद में पटना हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी की मदद से उनकी अपील दाखिल की गई.

जेल में मानसिक बीमारी और डिप्रेशन का भी सामना किया

अदालत ने यह भी बताया कि जेल में रहने के दौरान रंजीत कुमार झा को मानसिक बीमारी और डिप्रेशन की समस्या का पता चला था. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। जेल प्रशासन की ओर से उन्हें कुछ दवाएं भी दी जा रही थीं. इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने का निर्देश दिया. जरूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा आजीविका शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता देने को भी कहा गया.