भारत में कोई भी त्योहार या जश्न हो, आसमान में रंगबिरंगी आतिशबाजी के बिना अधूरा सा लगता है. ये जो पटाखे हमारे चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, उनका 90 फीसदी हिस्सा तमिलनाडु के एक छोटे से शहर शिवकाशी में बनता है. साठ के दशक में अपनी औद्योगिक तरक्की के कारण देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से ‘कुट्टी जापान’ का खिताब पाने वाला यह शहर अब एक नई उड़ान भरने को तैयार है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व में राज्य सरकार शिवकाशी को पटाखों का ग्लोबल हब बनाना चाहती है, ताकि दुनिया के बाजार पर राज करने वाले चीन को सीधी टक्कर दी जा सके.

6000 करोड़ का कारोबार, फिर भी चीन से पीछे क्यों?
शिवकाशी में 1,200 से अधिक पटाखा फैक्टरियां हैं और इस उद्योग का अनुमानित आकार करीब 6,000 करोड़ रुपये है. इसके बावजूद, वैश्विक बाजार के 90 प्रतिशत हिस्से पर चीन का कब्जा है. चीन का केवल एक शहर लिउयांग दुनिया भर में 70 प्रतिशत पटाखे निर्यात करता है. एक समय था जब भारत से भी भारी मात्रा में पटाखे विदेशों में जाते थे, लेकिन पिछले दो दशकों में इसमें भारी गिरावट आई है. तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पी. गणेशन बताते हैं कि अब ग्लोबल शिपिंग नेटवर्क पर चीनी निर्यातकों का दबदबा है. भारतीय निर्माताओं को विदेशों में माल भेजने के लिए शिपिंग कंटेनर और कार्गो स्पेस मिलना मुश्किल हो गया है. इसके अलावा, पटाखा उद्योग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ‘रेड कैटेगरी’ में रखा गया है, जिससे निर्माताओं को कई तरह की प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है.
सुप्रीम कोर्ट की पाबंदियों से कारोबार पर असर
शिवकाशी के लिए चीन की दीवार फांदना इतना आसान नहीं है. निर्यात बढ़ाने से पहले इस उद्योग को कई नियामक और कानूनी चुनौतियों से पार पाना होगा. सबसे बड़ी समस्या सुप्रीम कोर्ट द्वारा बेरियम नाइट्रेट के इस्तेमाल पर लगाई गई अंतरिम रोक है. प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया गया था. बेरियम नाइट्रेट एक अहम रसायन है, जिसका इस्तेमाल 60 प्रतिशत पटाखों को बनाने में होता था. इसके साथ ही, लड़ी वाले पटाखों पर भी प्रतिबंध है, जिनकी कुल उत्पादन में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी थी. इसका सीधा मतलब है कि उद्योग का 80 प्रतिशत पोर्टफोलियो सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है. ठंडे देशों में निर्यात होने वाले पटाखों के लिए जरूरी ‘पोटेशियम परक्लोरेट’ का परमिट भी केवल कुछ ही बड़ी इकाइयों को मिलता है.
जान हथेली पर रखकर काम करते हैं मजदूर
ग्लोबल हब बनने के इस सपने के पीछे एक कड़वी और दर्दनाक सच्चाई भी छिपी है. शिवकाशी और आसपास के इलाकों में तीन लाख लोग सीधे तौर पर और पांच लाख लोग अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं, जिनमें 55 प्रतिशत महिलाएं हैं. विरुधुनगर जिले के इस इलाके में खेती बहुत मुश्किल है, इसलिए गरीब परिवारों के पास रोजीरोटी के लिए बारूद के बीच काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. मानवाधिकार कार्यकर्ता ए. विजयकुमार के मुताबिक, पिछले एक दशक में यहां हादसों में 644 से अधिक मजदूरों की जान जा चुकी है. इसी साल 19 अप्रैल को कट्टानारपट्टी में हुए धमाके में 25 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी. कई अवैध फैक्टरियों में डॉक्टरों या एंबुलेंस की बुनियादी सुविधा तक नहीं होती और हादसों के बाद पीड़ितों के परिवारों को महज एक लाख रुपये का मुआवजा देकर उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है.
सुरक्षा, सम्मान के साथ दुनिया फतह
इन तमाम चुनौतियों के बीच, तमिलनाडु की उद्योग मंत्री और शिवकाशी की विधायक एस. कीर्तना ने एक नए विजन का खाका पेश किया है. सरकार का लक्ष्य केवल निर्यात के आंकड़े बढ़ाना नहीं है, बल्कि इस पूरे सेक्टर को सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है. उनका स्पष्ट मानना है कि अगर इस उद्योग की तरक्की का फायदा सबसे निचले पायदान पर काम करने वाली महिलाओं को नहीं मिलता, तो वह तरक्की बेमानी है. सरकार इस सेक्टर को असंगठित से संगठित स्वरूप में लाने और इनोवेशन व रिसर्च पर भारी निवेश करने की योजना बना रही है. अगर राज्य सरकार अपने इन वादों को हकीकत में बदल पाती है, तो यकीनन शिवकाशी की रोशनी दुनिया भर में भारत का नाम रोशन करेगी.



