पेट्रोल-डीजल पर जल्द आने वाली है बुरी खबर, लगेगा बडे वाला झटका!

भारत के लिए तेल का आयात महंगा होता जा रहा है. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) की डेटा में इसका खुलासा हुआ है. इसके मुताबिक, अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत का कच्चा तेल आयात बिल 48% बढ़कर 74.8 अरब डॉलर हो गया. ऐसा नहीं है कि मात्रा में कोई बढ़ोतरी की गई है, बल्कि कीमतें वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में आई तेजी के चलते बढ़ी है.

भारत को इस साल अप्रैल से अगस्त के बीच कच्चे तेल के आयात के लिए 74.8 अरब डॉलर चुकाने पड़े, जो पिछले साल की समान अवधि के 50.4 अरब डॉलर से 48-50% ज्यादा है. आज 21 सितंबर की दोपहर को ब्रेंट क्रूड लगभग 102 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था, जो पिछली क्लोजिंग से 2% कम है. हालांकि, इस गिरावट के बावजूद पश्चिमी एशिया में बिगड़ते हालातों के चलते 18 दिन से ज्यादा हो गए हैं कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है.

भारत ने कितना तेल मंगाया?
इस साल अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत ने 100.7 मिलियन टन तेल का आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 101.1 मिलियन टन था. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में आयात बिल 18% बढ़कर 11.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि वॉल्यूम 3% घटकर 19 मिलियन टन रह गई. क्रिसिल इंटेलिजेंस ने इस वित्त वर्ष के लिए ब्रेंट क्रूड के अपने अनुमान को बढ़ाकर 88-93 डॉलर कर दिया है. इन्वेंट्री में कमी और पश्चिम एशिया में लगातार तनाव के कारण इसमें साल-दर-साल 25-32% की बढ़ोतरी का अनुमान है.

क्रिसिल इंटेलिजेंस का कहना है कि ऊर्जाकी बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ा देती हैं. जब बाजार में मांग मजबूत होती है, तो कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत या इनपुट कॉस्ट का बोझ आसानी से ग्राहकों पर डाल देती हैं, जिससे उत्पाद महंगे हो जाते हैं. अगस्त के महीने में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित मुद्रास्फीति का 9.9% तक पहुंच जाना इसी ट्रेंड को साबित करता है.

भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव
अमेरिका-ईरान में जंग और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन पर बहुत गहरा असर पड़ा है. इससे कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं. इस बीच, रुसी तेल के आयात पर भी अमेरिका ने सख्ती दिखाई है, जिससे रुस से डिस्काउंट पर मिलने वाले कच्चे तेल की मात्रा में भी कमी आई है. ऐसे में भारत को मजबूरन महंगे सप्लायर्स का रुख करना पड़ रहा है.

जाहिर सी बात है कि आयात महंगा होगा, तो भारत का व्यापार घाटा और करेंट अकाउंट डेफिसिट भी बढ़ेगा. चूंकि आयात का भुगतान डॉलर में किया जाता है इसलिए अगर पहले के मुकाबले अब डॉलर ज्यादा खर्च होंगे, तो भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ेगा और वह डॉलर के मुकाबले कमजोर होता जाएगा.

भले ही अभी घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर हैं, लेकिन अगर लंबे समय तक कच्चा तेल 100 अरब या उससे ऊंचे स्तर पर बरकरार रहा, तो लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग का कॉस्ट बढ़ेगा, जिससे रिटेल स्तर पर महंगाई बढ़ने की पूरी संभावना बनी रहेगी.