
Delhi High Court POCSO Act: क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई शादी किसी आरोपी को POCSO एक्ट से बचा सकती है? दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर सख्त फैसला सुनाया है। जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने कहा है कि शादी वैध होने के बावजूद अगर पत्नी नाबालिग है तो शारीरिक संबंध बनाने पर पति पर पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई होगी। यह फैसला इस बहस पर पूर्ण विराम लगाता है कि पर्सनल लॉ विशेष आपराधिक कानूनों से ऊपर नहीं है।
अस्पताल के उस एक फॉर्म से खुला राज
यह पूरा मामला एक 16 साल तीन महीने की लड़की और 28 साल के युवक से जुड़ा है। दोनों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी की और एक साथ रहने लगे। सब कुछ सामान्य चल रहा था। लेकिन मामला तब सामने आया जब नाबालिग लड़की गर्भवती हो गई और रुटीन चेकअप के लिए एक सरकारी अस्पताल पहुंची।
अस्पताल प्रशासन ने जब उम्र का ब्योरा देखा तो यह खुलासा हो गया कि लड़की नाबालिग है। मेडिकल प्रोटोकॉल और कानून के तहत अस्पताल ने तुरंत पुलिस को इसकी जानकारी दे दी। इसके बाद पति के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया गया। बदकिस्मती से इसी साल जून में लड़की ने एक मृत बच्चे को जन्म दिया।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम POCSO:कोर्ट ने क्या कहा?
पति को बचाने के लिए अदालत में एक अहम तर्क दिया गया। यह दलील दी गई कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत, लड़की के यौवनावस्था (प्यूबर्टी) में पहुंचने के बाद शादी वैध मानी जाती है। याचिका में कहा गया कि चूंकि शादी कानूनी रूप से वैध है इसलिए उसके बाद बने शारीरिक संबंधों के लिए आपराधिक जिम्मेदारी नहीं बनती।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 सितंबर के आदेश में इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि इस तर्क को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि अगर कोई वयस्क व्यक्ति 18 साल से कम उम्र की लड़की के मामले में सिर्फ शादी का सर्टिफिकेट दिखाकर बचने लगे तो इससे पॉक्सो कानून का पूरा उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा।
पत्नी ने किया बचाव पर कानून के हाथ क्यों बंधे नहीं?
इस केस में एक बड़ा मोड़ यह भी आया कि खुद नाबालिग पत्नी ने अपने पति का बचाव किया। लड़की ने कोर्ट को बताया कि यह शादी दोनों परिवारों की रजामंदी से हुई थी। उस पर कोई दबाव नहीं डाला गया था और न ही कोई जबरदस्ती की गई। ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। यहां तक कि उसने अपने पति की जमानत याचिका का भी पूरा समर्थन किया था।
लेकिन कानून भावनाओं या नाबालिग की सहमति पर नहीं चलता। अदालत ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की सहमति को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पर्सनल लॉ के तहत हुआ विवाह उसके बाद के यौन संबंधों को अपने आप आपराधिकता के दायरे से बाहर नहीं कर देता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आपराधिक मामले को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।
क्या यह फैसला देश में बाल विवाह और पॉक्सो एक्ट के बीच चल रहे कानूनी टकराव को हमेशा के लिए खत्म कर देगा? जब भी पर्सनल लॉ और देश के क्रिमिनल लॉ आमने-सामने आते हैं तो अदालतें हमेशा उस कानून को तरजीह देती हैं जो कमजोर वर्ग की सुरक्षा करता है।
आखिर कानून क्या कहता है?
POCSO Act: भारत में 18 साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाना एक गंभीर अपराध है चाहे इसमें नाबालिग की सहमति हो या न हो। जब भी किसी धार्मिक पर्सनल लॉ और पॉक्सो के बीच टकराव की स्थिति बनती है अदालतें हमेशा पॉक्सो (विशेष कानून) को प्राथमिकता देती हैं क्योंकि यह बच्चों के संरक्षण के लिए संसद द्वारा बनाया गया विशेष कानून है।
FAQ
Q: क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ में नाबालिग की शादी को मान्यता है?
A: मुस्लिम पर्सनल लॉ में यौवनावस्था की उम्र के बाद शादी को वैध माना गया है, लेकिन पॉक्सो एक्ट 18 वर्ष से कम उम्र में शारीरिक संबंधों को सीधे तौर पर अपराध मानता है।
Q: दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला किस जज ने सुनाया?
A: यह फैसला 23 सितंबर को दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने सुनाया है।
Q: अगर लड़की खुद कह दे कि उसकी मर्जी थी, तो क्या पति बच सकता है?
A: नहीं। कानूनी रूप से 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की सहमति कोई मायने नहीं रखती है। पति पर पॉक्सो एक्ट के तहत ही कार्रवाई होगी।



