आजकल कारें भी स्मार्टफोन की तरह लगातार अपडेट हो रही हैं. पहले किसी नए फीचर या सॉफ्टवेयर की समस्या को ठीक कराने के लिए कार को सर्विस सेंटर ले जाना पड़ता था, लेकिन अब कई कंपनियां ओवरदएयर तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं. इसकी मदद से कार का सॉफ्टवेयर इंटरनेट के जरिए घर बैठे ही अपडेट किया जा सकता है.

Google, Apple और Samsung जैसी कंपनियां कई सालों से अपने स्मार्टफोन में OTA अपडेट देती आ रही हैं. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। अब यही तकनीक तेजी से ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी लोकप्रिय हो रही है. Tesla ने साल 2012 में सबसे पहले अपनी Model S कारों में OTA अपडेट देना शुरू किया था. इसके बाद कई बड़ी कार कंपनियों ने भी इस तकनीक को अपनाया है.
ये सुविधा देता है OTA अपडेट
OTA अपडेट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कार मालिक को छोटीमोटी सॉफ्टवेयर दिक्कतें ठीक कराने या नए फीचर्स पाने के लिए बारबार सर्विस सेंटर नहीं जाना पड़ता. इंटरनेट के जरिए कंपनी सीधे कार में नया सॉफ्टवेयर भेज देती है. इससे समय और खर्च दोनों की बचत होती है. हालांकि, इस तकनीक ने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक के कई फायदे हैं, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर खतरे भी जुड़े हुए हैं.
साइबर अपराधियों से खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किसी कार का सॉफ्टवेयर इंटरनेट से जुड़ा है, तो वह हैकर्स और साइबर अपराधियों के निशाने पर भी आ सकता है. ऐसे में वाहन का डेटा चोरी होने, सिस्टम हैक होने या कार के कुछ डिजिटल सिस्टम से छेड़छाड़ करने का खतरा बढ़ सकता है. CNBC की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सिर्फ डेटा सुरक्षा का मामला नहीं है. अगर कोई विदेशी हैकर किसी चलती हुई गाड़ी के कंट्रोल सिस्टम तक पहुंच जाए, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है. इसी वजह से कई देश इस तकनीक को लेकर सतर्क हैं.
इन देशों में कराई गई जांच
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल नॉर्वे में हुई एक जांच में पता चला कि बस के बैटरी और पावर सिस्टम तक मोबाइल नेटवर्क के जरिए पहुंच संभव थी. रिपोर्ट में कहा गया कि सैद्धांतिक रूप से निर्माता कंपनी चाहे तो दूर से बस को रोक सकती है या उसे बंद कर सकती है. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद ब्रिटेन और डेनमार्क जैसे देशों ने भी अपने यहां OTA तकनीक की सुरक्षा की जांच शुरू की थी. विशेषज्ञों मानना है कि भविष्य की कनेक्टेड और सॉफ्टवेयर वाली कारों में OTA अपडेट बेहद जरूरी तकनीक होगी. लेकिन इसके साथ मजबूत साइबर सुरक्षा, सुरक्षित सॉफ्टवेयर और नियमित निगरानी भी उतनी ही जरूरी होगी.



