देशभर में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों और बुनियादी सुविधाओं की बदहाली का मुद्दा इन दिनों राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में है. कई राज्यों में बच्चों यानी जेन अल्फा की तरफ से इसको लेकर विरोध प्रदर्शन भी देखा गया है. इसके अलावा स्कूलों को दिखाते हुए कई वीडियो हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं.इन्हीं सबके बीच राजस्थान सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर्स को सही करने के लिए बड़ा ऐलान किया है.

राजस्थान सरकार ने 12,500 करोड़ रुपये खर्च करने का रोडमैप पेश किया. वहीं, उत्तर प्रदेश ने भी 604 करोड़ रुपये की योजना बनाई है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या जेन अल्फा के आंदोलनों के चलते सरकार बैकफुट पर है, जिसके चलते स्कूलों को दो बड़े राज्यों ने स्कूलों पर इतना पैसा खर्च करने का फैसला लिया?
राजस्थान सरकार ने क्या फैसला लिया?
- राजस्थान सरकार ने स्कूल भवनों, अतिरिक्त कक्षों, मरम्मत और बुनियादी सुविधाओं के सुधार का ऐलान किया.
- इसके लिए 12,500 करोड़ रुपये का रोडमैप बनाया गया है. यह फैसला तब आया है,
- यह फैसला तब आया राज्य के सरकारी स्कूलों की बदहाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे.
- राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 611 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन नहीं है.
- जिन 64 हजार से अधिक स्कूलों के पास भवन हैं,उनमें भी हजारों स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है.
यूपी में क्या फैसला?
- यूपी में भी 3,126 स्कूलों के पुनर्निर्माण और कायाकल्प के लिए 604 करोड़ रुपये की योजना बनाई गई है.
- इसके जरिए जर्जर भवनों की जगह नई इमारतें बनाई जाएंगी.
- मरम्मत के लिए 302 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी की जा चुकी है.
- सरकारें अब स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं.
जेन अल्फा का दौर सरकारों के लिए अलग क्यों है?
जेन अल्फा यानी मोटे तौर पर 2010 के बाद जन्मी पीढ़ी. इनका बचपन इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बीत रहा है. इसके चलते स्कूल में टूटा पंखा, जर्जर छत, गंदा शौचालय या बिना भवन चल रहा स्कूल अब केवल स्थानीय समस्या नहीं रह जाता. दरअसल,एक तस्वीर या एक छोटी क्लिप सोशल मीडिया पर बड़ी बहस में बदल सकती है.
राजस्थान में पिछले दिनों स्कूलों की खराब स्थिति को लेकर हुए निरीक्षणों और वायरल . यूपी के भी देवरिया में एक एक्टिविस्ट पर स्कूल के बदहाली का वीडियो दिखाने पर एफआईआर दर्ज दर्ज होने के बाद काफी हायतौबा मचा. ऐसे में कहा जा सकता है कि हाल की घटनाओं के चलते दोनों राज्यों को ऐसा फैसला लेना पड़ रहा है.
दिल्ली में भी इमारतों की सुरक्षा पर बड़ा फैसला
यह ट्रेंड सिर्फ राजस्थान और यूपी तक सीमित नहीं है. दिल्ली सरकार ने संरचनात्मक और इंफ्रास्ट्रक्चर ऑडिट के बाद 34 सरकारी स्कूलों की इमारतों को ध्वस्त करने के लिए चिन्हित किया है. कई इमारतों को लेकर अंतिम आकलन चल रहा है कि उन्हें पूरी तरह गिराया जाए, मरम्मत की जाए या फिर नए सिरे से विकसित किया जाए. इसके साथ ही नई सरकारी स्कूल इमारतों के निर्माण की योजना पर भी काम चल रहा है.
तो क्या सरकारें सचमुच बैकफुट पर हैं?
सरकार बैकफुट पर होने को ज्यादा जवाबदेही के तौर पर देखा जा सकता है. सोशल मीडिया ने सरकारों के सामने एक नई स्थिति पैदा की है. पहले किसी गांव के स्कूल की खराब तस्वीर स्थानीय स्तर पर ही रह जाती थी. अब वही तस्वीर कुछ घंटों में पूरे देश में बहस का मुद्दा बन सकती है. ऐसे में इस तरह के मामले में सरकारों को कार्रवाई करनी पड़ रही है.
जेन अल्फा अभी वोटर नहीं हैं, तो फिर सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती कैसे?
जेन अल्फा खुद अभी बड़े पैमाने पर मतदाता नहीं है, लेकिन यह पीढ़ी सरकारों की भविष्य की राजनीतिक चुनौती है. इसके स्कूलों की तस्वीरें उनके मातापिता देखते हैं, शिक्षक देखते हैं. इसकी सोशल मीडिया पर जिस तरह से चर्चा हो रही हैं. सरकारें यह समझ रही हैं कि आज का जर्जर स्कूल केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में शासन की छवि से जुड़ा मुद्दा बन सकता है. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। चुनावों में उनके लिए दिक्कतें ला सकती हैं. हार के तौर पर खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.
जेनअल्फा और जेन जी ने कैसे बताया कि अब स्कूलों की हालत फाइलों में नहीं छिपी रहेगी?
राजस्थान, यूपी और दिल्ली के हालिया फैसले एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं. अब सरकारी स्कूलों की हालत फाइलों में छिपी रहने वाली समस्या नहीं रही. स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में हर जर्जर स्कूल सरकार की सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल बनते जा रहा है. यह कहा जा सकता है, जेन जी और जेन अल्फा, सोशल मीडिया के सहारे सरकारों को बैकफुट पर लाते हुए स्कूलों की व्यवस्था को दुरस्त करने के लिए सफल तरीके से दबाव बना लिया है.



