यूएसएस अब्राहम लिंकन पोत इन दिनों चर्चा में है. असल में इसे पहले मध्यपूर्व में तैनात किया गया था और अब इसे वापस बुला लिया गया है. पहले तैनाती और फिर अचानक वापसी ने वैश्विक सुरक्षा रणनीति को लेकर नई चर्चाएं छेड़ दी हैं. आइए,इसी बहाने समझते हैं कि अमेरिका के पास अब्राहम लिंकन जैसे कितने सुपर करियर मौजूद हैं? ये किनकिन राष्ट्रपतियों के नाम पर हैं? वापसी से किस तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं?

अमेरिकी नौसेना की शक्ति का मुख्य आधार उसके विशालकाय एयरक्राफ्ट कैरियर यानी विमानवाहक पोत हैं. दुनिया के किसी भी कोने में शक्ति प्रदर्शन करना हो या युद्ध के हालात में तुरंत कार्रवाई करनी हो, ये तैरते हुए शहर हमेशा आगे रहते हैं. अमेरिकी नौसेना में अपने शीर्ष युद्धपोतों का नाम देश के पूर्व राष्ट्रपतियों के नाम पर रखने की एक बहुत लंबी और ऐतिहासिक परंपरा रही है. आज अमेरिकी नौसेना के पास सक्रिय सेवा में 11 न्यूक्लियर पावर्ड सुपर कैरियर हैं, जिनमें से अधिकतर के नाम अमेरिकी राष्ट्रपतियों के सम्मान में रखे गए हैं.

अमेरिकी बेड़े में राष्ट्रपतियों के नाम पर कितने सुपर कैरियर?

वर्तमान में अमेरिकी नौसेना के पास 11 सक्रिय न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर हैं. इनमें से आठ वर्तमान कैरियर सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपतियों के नाम पर सेवा दे रहे हैं. डिकमीशन हो चुके या निर्माणाधीन जहाजों को मिलाकर देखें, तो राष्ट्रपतियों के नाम वाले प्रमुख वाहक निम्नवत हैं.

  • USS ड्वाइट डी. आइजनहावर : यह द्वितीय विश्व युद्ध के नायक और अमेरिका के 34वें राष्ट्रपति के नाम पर है. यह वर्तमान में नौसेना का दूसरा सबसे पुराना सक्रिय कैरियर है.
  • USS थियोडोर रूजवेल्ट : अमेरिका के 26वें राष्ट्रपति के नाम पर इस पोत का नाम रखा गया है, जिन्हें आधुनिक अमेरिकी नौसेना का जनक भी माना जाता है.

    USS अब्राहम लिंकन. फोटो: Getty Images

  • USS अब्राहम लिंकन : यह गृहयुद्ध के समय देश को एकजुट रखने वाले अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति के नाम पर समर्पित है.
  • USS जॉर्ज वॉशिंगटन : अमेरिका के पहले राष्ट्रपति और राष्ट्रपिता के नाम पर बना यह पोत प्रशांत महासागर क्षेत्र में तैनात रहता है.

    USS जॉर्ज वॉशिंगटन.

  • USS जॉन सी. स्टेनिस : यह राष्ट्रपति नहीं बल्कि सीनेटर के नाम पर है, लेकिन यह निमित्ज़ श्रेणी का ही एक अहम पोत है.
  • USS हैरी एस. ट्रूमैन : 33वें राष्ट्रपति के नाम पर बना यह युद्धपोत भूमध्य सागर और मध्य पूर्व के अभियानों में काफी सक्रिय रहा है.
  • USS रोनाल्ड रीगन : शीत युद्ध के दौर के 40वें राष्ट्रपति के नाम पर समर्पित यह पोत लंबे समय तक जापान में फॉरवर्डडिप्लॉयड रहा.

    USS रोनाल्ड रीगन. फोटो: Wikipedia

  • USS जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश : यह निमित्ज़ क्लास का अंतिम पोत है, जिसका नाम पूर्व राष्ट्रपति और नौसैनिक पायलट जॉर्ज बुश सीनियर के नाम पर है.
  • USS गेराल्ड आर. फोर्ड : यह अमेरिका की नई पीढ़ी की फोर्डक्लास का पहला पोत है, जिसका नाम 38वें राष्ट्रपति के नाम पर रखा गया है.

    USS गेराल्ड आर. फोर्ड. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। फोटो: US Navy

  • USS जॉन एफ. कैनेडी : फोर्डक्लास का यह दूसरा पोत बनकर तैयार हो रहा है और यह अमेरिका के 35वें राष्ट्रपति के नाम पर है.
  • भविष्य के जहाजों में यूएसएस एंटरप्राइज और अफ्रीकीअमेरिकी नाविक डोरिस मिलर के नाम पर यूएसएस डोरिस मिलर शामिल हैं.

राष्ट्रपतियों के नाम पर क्यों रखे गए कैरियर्स के नाम?

अमेरिकी नौसेना में युद्धपोतों के नामकरण के कड़े नियम हैं. पुराने समय में बड़े युद्धपोतों का नाम अमेरिकी राज्यों और प्रमुख लड़ाइयों के नाम पर रखा जाता था. 20वीं सदी के उत्तरार्ध में विशेषकर शीत युद्ध के दौरान, अमेरिकी कांग्रेस और नौसेना सचिव ने यह तय किया कि सबसे शक्तिशाली सुपरकैरियर्स का नाम उन राष्ट्रपतियों के नाम पर होगा जिन्होंने देश की सुरक्षा और नौसैनिक शक्ति के विस्तार में बड़ा योगदान दिया. यह परंपरा उन राष्ट्रपतियों को भी सम्मान देती है जिन्होंने स्वयं सेना या नौसेना में सेवाएं दी थीं.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन.

USS अब्राहम लिंकन की ताकत

USS अब्राहम लिंकन साधारण युद्धपोत नहीं है. यह निमित्ज़क्लास का पांचवां न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर है. इसे 1989 में नौसेना में शामिल किया गया था. दो न्यूक्लियर रिएक्टरों से चलने के कारण यह जहाज बिना दोबारा ईंधन भरे लगातार 20 से 25 साल तक समुद्र में तैर सकता है. इसकी गति 30 नॉट यानी 56 किमी प्रति घंटा से अधिक है. इस जहाज पर लगभग पांच हजार से अधिक नाविक और वायुसैनिक एक साथ रहते हैं. यह अपने साथ 75 से 90 लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर ले जाने में सक्षम है. इस पर एफ35सी लाइटनिंगII जैसे 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट, एफ/ए18 सुपर हॉर्नेट, ई2डी हॉकआई और एमएच60 सीहॉक हेलिकॉप्टर तैनात रहते हैं.

इसकी वापसी से कैसेकैसे सवाल उठ रहे?

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और संघर्ष के बीच अमेरिका ने यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए तैनात किया था. कुछ समय तक इस क्षेत्र में दोदो अमेरिकी कैरियर एक साथ मौजूद थे. जब लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को मध्य पूर्व से वापस अपने होमपोर्ट सैन डिएगो की ओर लौटने का आदेश मिला, तो कई वैश्विक सैन्य विश्लेषकों ने इस पर कुछ ठोस सवाल उठाए हैं.

  • पहला: क्या मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य दबाव कम हो रहा है? लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों के बीच इतने बड़े युद्धपोत की वापसी से क्षेत्र में सुरक्षा का शून्य पैदा होने की आशंका जताई गई.
  • दूसरा: क्या अमेरिकी नौसेना अपने युद्धपोतों पर अत्यधिक बोझ डाल रही है? लंबे समय तक समुद्र में तैनात रहने के कारण जहाजों के रखरखाव और नौसैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.
  • तीसरा: यह इंडोपैसिफिक क्षेत्र को लेकर है. अमेरिका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में चीन और प्रशांत क्षेत्र को सबसे बड़ी चुनौती मानता है. लिंकन की वापसी को इंडोपैसिफिक में शक्ति संतुलन बनाए रखने के प्रयास के रूप में भी देखा गया.

कैरियर डिप्लॉयमेंट की चुनौतियां

सुपर कैरियर्स का संचालन अत्यंत जटिल और खर्चीला होता है. किसी भी एक कैरियर को समुद्र में तैनात रखने के लिए तीन जहाजों के चक्र की आवश्यकता होती है. इनमें से एक जहाज मिशन पर तैनात रहता है, दूसरा मरम्मत और अपग्रेड की प्रक्रिया से गुजरता है, जबकि तीसरा प्रशिक्षण में व्यस्त रहता है.

वर्तमान में अमेरिकी नौसेना के पुराने निमित्ज़क्लास जहाज अपनी 50 साल की सेवा अवधि पूरी कर रहे हैं. इनके स्थान पर आधुनिक फोर्डक्लास जहाजों को लाने का काम धीमा है. यूएसएस अब्राहम लिंकन जैसे जहाजों की तैनाती और वापसी सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिकी शिपयार्ड कितनी तेजी से पुराने जहाजों की मरम्मत कर सकते हैं.

यूएसएस अब्राहम लिंकन और उनके जैसे अन्य सुपरकैरियर केवल लोहे और स्टील के विशाल जहाज नहीं हैं. वे समुद्र में अमेरिकी कूटनीति, प्रतिरोधक क्षमता और सैन्य ताकत के सबसे बड़े प्रतीक हैं. लिंकन की वापसी यह दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति में सैन्य संसाधनों का आवंटन कितना संवेदनशील होता है. जहाजों का नाम भले ही इतिहास के महान नेताओं के नाम पर हो, लेकिन उनकी असली परीक्षा वर्तमान की कठिन समुद्री चुनौतियों और बदलती भूराजनीति में होती है.