श्रावण मास भगवान शिव को अति प्रिय है। इस दौरान पड़ने वाला हर सोमवार का अपना एक खास महत्व है। सावन के महीने में साधक भगवान भोलेनाथ की भक्ति में डूब जाते हैं, सच्चे मन से व्रत रखते है और पूजा अर्चना करते हैं। कई भक्तजन सावन के महीने से 16 सोमवार व्रत की शुरुआत करते हैं। वैसे हर महीने की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है, जो कि यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रदोष काल के शिवपूजन के लिए श्रेष्ठ समय माना गया है।
हालांकि, कई बार पंचांग में ऐसा दुलर्भ संयोग बन ही जाता है जब सावन का सोमवार और प्रदोष व्रत दोनों एक ही दिन पड़ जाए। ऐसे में साधक भी दुविधा में चले जाते हैं कि पूजा कैसे करे? क्योंकि दोनों व्रतों की अपनी अलग मुख्यता है और भगवान का अभिषेक किस समय करना सही होता है, आइए आपको बताते हैं।
धार्मिक शास्त्र क्या कहते हैं?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब सावन सोमवार और प्रदोष व्रत की तिथि एक साथ पड़ जाए,तो भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा का महासंयोग मानना चाहिए। इस दिन की गई श्रद्धापूर्ण पूजा से जीवन में सुखशांति आती है। इसलिए आपको दोनों व्रत अलगअलग रखने की कोई जरुरत नहीं है। आप एक ही दिन में दोनों व्रत के नियमों का पालन कर सकते हैं।
जाने सही पूजाविधि
इस खास संयोग के दौरान आप सुबह और शाम को पूजा कर सकती हैं
सुबह की पूजा
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। भगवान शिव का स्मरण करते हुए दोनों व्रत का एक साथ संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें। ‘ॐ नमः शिवाय’का जप करते हुए बेलपत्र अर्पित करें और सोमवार व्रत की कथा जरुर पढ़ें।
शाम की पूजा
वैसे प्रदोष व्रत की असली महत्व संध्या काल यानी ‘प्रदोष काल’ में होती है। यह समय सूर्यास्त से लेकर करीब 2 घंटे बाद तक रहता है। शाम के समय एक बार फिर स्नान करने करें या हाथमुंह धोकर स्वच्छ हो जाएं। इसके बाद शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद प्रदोष व्रत की कथा सुनें, दीपदान करें और आखिर में भगवान शिव की आरती करें। वहीं व्रत का पारण आप अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार शाम की पूजा या फिर अगले दिन सुबह कर सकते हैं। ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है।