उद्योग निकाय एसईए का कहना है कि आयात की ज्यादा मात्रा और रुपये की कीमत घटने की वजह से अक्टूबर में खत्म होने वाले मौजूदा विपणन वर्ष के दौरान भारत का खाद्य तेल आयात का खर्च नौ प्रतिशत बढ़कर 1.75 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है. सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने सदस्यों को लिखे एक पत्र में बढ़ते आयात खर्च पर चिंता जताई और कहा कि तिलहन क्रांति का और इंतजार नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि भारत अपने खाद्य तेल के सफर में एक अहम मोड़ पर खड़ा है, और चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है. देश का खाद्य तेल आयात खर्च, जो पिछले साल 1.61 लाख करोड़ रुपए था, उसके इस साल 1.75 लाख करोड़ रुपए के अभूतपूर्व स्तर को पार करने का अनुमान है.

इंपोर्ट में इजाफा
इस महीने की शुरुआत में एसईए ने बताया था कि नवंबर, 2025जून, 2026 की अवधि के दौरान भारत का खाद्य तेल का आयात सात प्रतिशत बढ़कर 103.88 लाख टन हो गया, जबकि पिछले तेल वर्ष की इसी अवधि में यह 97.29 लाख टन था. खाद्य तेल का विपणन वर्ष नवंबर से अक्टूबर तक चलता है. अस्थाना ने कहा कि मौजूदा तेल वर्ष के पहले आठ महीनों में आयात खर्च 1.19 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 99,000 करोड़ रुपए था. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक और आंकड़ा नहीं है.
यह कीमती विदेशी मुद्रा के बड़े पैमाने पर बाहर जाने को दिखाता है, जिसका इस्तेमाल भारत के कृषि बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में किया जा सकता था. अस्थाना ने बताया कि रुपए की कीमत घटने से आयात महंगा हो गया है. उन्होंने आगे कहा कि साथ ही, मौसम की अनिश्चितताएं, जिनमें सामान्य से कम मानसून का अनुमान और कई तिलहन उगाने वाले इलाकों में बुवाई में देरी शामिल है, घरेलू उत्पादन को लेकर चिंताएं बढ़ा रही हैं.
कम हो रही है सप्लाई
एसईए अध्यक्ष ने कहा कि वैश्विक घटनाक्रम भी और दबाव बढ़ा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया का बढ़ता बायोडीजल कार्यक्रम खाद्य तेल का एक बड़ा हिस्सा फ्यूल की ओर मोड़ रहा है, जिससे ग्लोबल सप्लाई कम हो रही है. साथ ही, भूराजनीतिक अनिश्चितताओं और माल ढुलाई व बीमा की बढ़ती लागत के कारण खाद्य तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें अस्थिर बनी हुई हैं.
इसका नतीजा यह हो सकता है कि भारत को ज्यादा आयात करना पड़े और हर टन के लिए काफी ज्यादा कीमत चुकानी पड़े. अस्थाना ने देश में तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया, जिससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. तिलहन की खरीफ बुवाई के बारे में एसईए ने बताया कि 17 जुलाई तक कुल बुवाई का रकबा काफी कम रहा है. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। अब तक बुवाई का कुल रकबा 147 लाख हेक्टेयर है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 155.7 लाख हेक्टेयर था.
बारिश की संभावना कम
अस्थाना ने कहा कि खास चिंता की बात अगस्तसितंबर के महत्वपूर्ण समय में, जब फूल आते हैं, कम बारिश की संभावना है. इससे तिलहन की पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है और जलाशयों का जलस्तर और कम हो सकता है, जिसका असर आने वाले रबी सत्र पर भी पड़ेगा. हालांकि, उन्होंने कहा कि बुवाई में देरी का मतलब हमेशा कम उत्पादन ही नहीं होता है. अध्यक्ष ने कहा कि इतिहास गवाह है कि बारिश बेहतर होने पर बुवाई का रकबा बढ़ जाता है. इसलिए, आने वाले सप्ताह यह तय करने में अहम होंगे कि खरीफ 2026 की बुवाई में तेजी आती है या भारत को एक और साल आयात पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है.



