मुगलों के इतिहास में यह दिलचस्प विरोधाभास है कि बादशाह की ताकत घटती चली गई. दिल्ली तक में वह सुरक्षित नहीं रह गया था. लेकिन उसकी कानूनी हैसियत और प्रतिष्ठा बरकार रही. उसके पास सेना नहीं थी, फिर भी उसकी सनद की कीमत थी. मुल्क के कई हिस्सों में उभर चुकी ताकतें खुद को आजाद घोषित कर शासन कर रहीं थीं. लेकिन उनके सामने वैधता की समस्या थी. यह वैधता मुगल बादशाह के नाम से जारी फरमान, सनद, उपाधि या मनसब के जरिए हासिल होती थी.

इसीलिए दरबार कमजोर होने के बाद भी वैधता बांटने वाली संस्था बना रहा. यहां तक कि उसे पराजित करने के बाद भी अंग्रेज उसके दरबार में इसके लिए दस्तक देते रहे. यह सिलसिला आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफ़र के वक्त तक चला. पढ़िए इनसे जुड़े दिलचस्प किस्से.
नादिरशाहअब्दाली के हमलों ने किया खोखला
1707 में औरंगज़ेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ. अपने करीब पचास साल के लंबे शासन के दौरान औरंगज़ेब लगातार युद्धों में उलझा रहा. साम्राज्य को इन युद्धों में जीत की कीमत बेहिसाब खर्च के तौर पर ही नहीं चुकानी पड़ी बल्कि अशांतिअराजकता ने मुल्क का उत्पादन, खेती और व्यापार सब चौपट कर दिया. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। औरंगज़ेब की मौत के बाद शुरू उत्तराधिकार के संघर्ष और दरबारी षड्यंत्रों के बीच जिन हाथों में सत्ता पहुंची वे इतने काबिल नहीं थे, जो साम्राज्य को एकजुट रख सकें.
इस सबके बीच इलाकाई ताकतों के उभार, मराठों के विस्तार, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के हमलोंलूट ने दिल्ली के तख्त को खोखला कर दिया और ऐसा भी वक्त आया जब हुकूमत लालकिले तक सिमट गई.
नादिर शाह. फोटो: फोटो: Pictures from History/Universal Images Group Images
ताकत खोने के बाद भी कानूनी हैसियत मजबूत
अकबर के बाद मुगल वंश के सबसे शक्तिशाली समझे जाने वाले बादशाह औरंगज़ेब की मौत के 22 साल बाद 1739 में नादिरशाह के दिल्ली पर तूफानी हमले ने मुगल साम्राज्य की कमजोरी पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दी. इसके बाद तो हालत यह हो गई कि दिल्ली का बादशाह कई बार अपनी राजधानी में भी सुरक्षित नहीं था. लेकिन यहां इतिहास का एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है.
मुगल बादशाह फौजी ताकत खो चुका था. तमाम ताकतें सिर उठा अलग इलाकों में शासन कर रहीं थीं. किसी को बादशाह की परवाह नहीं थी लेकिन बादशाह की कानूनी हैसियत बरकरार थी. उसकी सनद की अभी भी कीमत थी और उसे हराने वाले भी इसकी चाहत के लिए मजबूर थे. अठारहवीं सदी के आखिरी दौर तक मराठे, अवध का नवाब, हैदराबाद का निज़ाम और बंगाल, मैसूर, रोहिल्ले सहित कई इलाकाई ताकतें अपने इलाकों में शासन कर रहे थे. दिल्ली के मुगल सिंहासन से उनका वास्ता नहीं था. व्यवहारिक तौर वे आजाद थे. लेकिन राज करने की वैधता उन्हें हासिल नहीं थी.
मुगल बादशाह औरंगजेब.
नाम भर की बादशाहत
मुगल बादशाह के नाम से जारी फरमान, सनद, उपाधि या मनसब किसी शासक के अधिकार को उस व्यापक राजनीतिक परंपरा से जोड़ देते थे, जिसकी जड़ें अकबर और उसके उत्तराधिकारियों के साम्राज्य में थीं. इसीलिए मुगल दरबार कमजोर होने के बाद भी वैधता बांटने वाली संस्था बना रहा. कभी मुगल साम्राज्य का हिस्सा रहे राज्यों के नए शासकों ने लंबे समय तक मुगल बादशाह को प्रतीकात्मक तौर पर स्वीकार करना जारी रखा और सिक्कों पर बादशाह का नाम और शुक्रवार की नमाज़ के खुतबे में उसके उल्लेख की परम्पराएं जारी रहीं. बेशक दिल्ली की ताकत घटती चली गई लेकिन मुगल बादशाह की औपचारिक हैसियत तुरंत खत्म नहीं हुई.
तलवार की जीत बाद भी मुहर जरूरी
1764 के बक्सर का युद्ध में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के शुजाउद्दौला और मीर कासिम की संयुक्त सेनाएं ईस्ट इंडिया कंपनी से पराजित हो गईं. जाहिर तौर पर इस हार के बाद अंग्रेजों के सामने शाह आलम द्वितीय की कोई हैसियत नहीं रह गई थी. लेकिन मुग़ल बादशाह की मुहर की इसके बाद भी अहमियत थी. इस मुकाम पर इतिहास में एक अनूठा अध्याय जुड़ा.
कंपनी ने बादशाह को हराया भी और लिखापढ़ी में उसकी सनद भी हासिल की.1765 में इलाहाबाद की संधि हुई. बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी, अर्थात राजस्व वसूली का अधिकार प्रदान किया. एवज में कंपनी ने बादशाह को सालाना 26 लाख रुपये देने पर सहमति व्यक्त की. तलवार की लड़ाई में जीत दर्ज करने वाले को भी वैधता के लिए बादशाह की मुहर जरूरी थी. विजेता कंपनी के पास सेना थी. राजस्व वसूलने की क्षमता थी.व्यापारिक शक्ति और लगातार बढ़ता राजनीतिक प्रभुत्व भी था. लेकिन बादशाह का फरमान विधिवत नियुक्त दीवान के रूप में अपने को प्रस्तुत करने के लिए जरूरी था.
अंग्रेजों के सामने शाह आलम द्वितीय की कोई हैसियत नहीं रह गई थी.
इतिहासकार डॉक्टर काली किंकर दत्ता ने 1765 के इस प्रसंग को मुगल सत्ता की लाचारी और कंपनी की वास्तविक सत्ता के बीच के संक्रमण के रूप में देखा है. उनके अनुसार फरमान की भाषा पारंपरिक थी, लेकिन उसके पीछे वास्तविक परिस्थिति शाह आलम की बढ़ती लाचारी थी.
राज दूसरे का, सिक्के पर मुगल बादशाह
शासनसत्ता सिमट जाने के बाद भी ऐसे राज्य और इलाके जिनके वास्तविक शासक कोई अन्य थे, में प्रचलित सिक्कों पर मुगल बादशाह की तस्वीर या नामोल्लेख होना अपने में रोचक था. मध्यकालीन इस्लामी राजनीतिक परंपरा में शासक के नाम का सिक्के पर अंकित होना संप्रभुता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता था. मुगल शक्ति घटने के बावजूद अनेक स्थानों पर मुगल बादशाह के नाम के सिक्के जारी होते रहे.
यहां तक कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी बंगाल में शाह आलम द्वितीय के नाम वाले सिक्के जारी किए.1765 के बाद बंगाल की टकसालों पर कंपनी का नियंत्रण हो गया, लेकिन सिक्के पर शाह आलम का नाम बना रहा. ऐसे सिक्कों पर शाह आलम की बादशाही का उल्लेख मिलता है, जबकि वास्तविक नियंत्रण कंपनी के हाथ में था. रोचक है कि सिक्के पर जिस बादशाह की तस्वीर थी, दिल्ली की गद्दी पर काबिज रहते हुए भी उसका इनके ढालने से वितरण तक कोई दख़ल नहीं था.
शाह आलम द्वितीय.
खुतबे में पढ़ा जाता रहा नाम
शुक्रवार की सामूहिक नमाज़ के दौरान पढ़े जाने वाले खुतबे में शासक के नाम का उल्लेख उसकी संप्रभुता और रुतबे का सबूत होता था. इसलिए जब कोई शक्तिशाली प्रांतीय शासक अपने नाम का खुतबा पढ़वाता था, तो वह केवल धार्मिक घोषणा नहीं होती थी बल्कि उसमें राजनीतिक स्वतंत्रता का संदेश भी छिपा होता था. ऐसे राज्य जिन पर मुगल बादशाह का नियंत्रण खत्म हो चुका था, उसके बाद भी जुमा की नमाज में मुगल बादशाह के नाम का खुतबा लंबे समय तक पढ़ा जाता रहा.
प्रतीकात्मक तौर पर ही सही लेकिन खुतबे ने मुगल बादशाहों के बेहद कमजोर होने के बाद भी, यादों में उनकी सर्वोच्चता बनाए रखी. यह विचित्र स्थिति थी कि मुगल राज के पराभव के दौर असली सत्ता अलगअलग हाथों में थी, लेकिन वैधता की कमान अब भी बादशाह के हाथों में थी. किसी शासक को उससे सनद, किसी को मनसब,किसी को फरमान,किसी को सिक्के पर बादशाह का नाम तो किसी को खुतबे में अपना नाम चाहिए था. फौजी और राजनीतिक हैसियत में सिफ़र हो चुके बादशाह के पास ‘वैधता के स्रोत’ का खजाना 1857 तक कायम रहा.
वो लाचार बादशाह जिसके नाम पर देश हुआ एकजुट
देश में ईस्ट इंडिया कंपनी का वर्चस्व पूरी तौर पर स्थापित होने के बाद भी लोगों के दिलदिमाग में मुगल बादशाह की हैसियत कायम रही. यहां तक कि कंपनी भी तमाम मसलों में बादशाह को नजरअंदाज नहीं कर पाई. दिखावे के लिए ही सही, उसके रेजिडेंट दरबार में कॉर्निश बजाते रहे और तोपों की सलामी भी जारी रही.
बहादुर शाह जफर. फोटो: Getty Images
1857 में बूढ़े बहादुर शाह जफ़र के पास न सेहत थी और न ही फौज और खजाना. फिर भी मेरठ से अंग्रेजों से लड़ने निकले बागी सिपाही सबसे पहले लाल किले पहुंचे. फिर मुल्क के अलगअलग इलाकों से आजादी के लिए निकले लोगों की एक ही मंजिल थीलाल किला. सबकी जिद बादशाह की सरपरस्ती की थी. जफ़र के तमाम इनकार के बाद भी लोग अड़े रहे और फिर उसे अगुवाई कुबूल करनी पड़ी. एक ऐसा बूढ़ा जिसके पास बादशाह के ख़िताब के अलावा कुछ नहीं बचा था, से लोग क्यों उम्मीद लगाए हुए थे?
1857 ने साबित किया कि मुगल साम्राज्य भले ही समाप्त हो चुका था, लेकिन देश की स्मृति में ‘मुगल बादशाह’ की अवधारणा सजीव थी और उसके नाम पर पूरा देश एकजुट हो गया. इसीलिए अंग्रेजों ने विद्रोह को कुचलने के बाद ज़फ़र को देश से बहुत दूर करना जरूरी समझा. यह भी ख्याल रखा कि रंगून में कैद काट रहे जफ़र की कोई ख़बर भारत पहुंच चिंगारी न भड़काए. जिंदा रहने तक ही नहीं, मरने के बाद उसकी कब्र तक पक्की नहीं होने दी.



