संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे कर रहा है. इस मौके पर ट्रम्प प्रशासन ने पूरे देश में ढेरों आयोजन तय किये हैं. वाशिंगटन डीसी और फिलाडेल्फिया में मुख्य आयोजन हो रहा है. 4 जुलाई 1776 को फिलाडेल्फिया में ही अमेरिका की आजादी की घोषणा पर हस्ताक्षर किये गए थे. वाशिंगटन डीसी के नेशनल माल में 16 दिवसीय रंगारंग आयोजन किया जाना तय है तो देश भर के 50 राज्यों में भी आजादी का जश्न बड़े पैमाने पर मनाए जाने की तैयारी है. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि अमेरिका जब आजाद हुआ तब भारत की क्या स्थिति थी? किसका राज था? कैसी थी देश की आर्थिक स्थिति?

जब साल 1776 में अमेरिका आजाद तब भारत में अलग ही तस्वीर थी. कहने को मुगल शासन देश में चल रहा था. शाह आलम द्वितीय गद्दी पर थे. उनका राज 1759 से 1806 तक चला लेकिन तब तक यूरोपियन साम्राज्य धीरेधीरे अपनी पकड़ बना रहे थे. अलगअलग हिस्सों में उन्होंने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं. उस दौर में भारत का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य जटिल और पारस्परिक प्रभावों से भरा हुआ था.
अनेक राज्यों का संगम था भारत
उस समय भारत का भारत आज की तरह एक सूत्र में नहीं था. एकजुट रियासत नहीं थी. कई छोटे और बड़े राज्य थे. मुगल साम्राज्य, मराठों का संघ, निज़ामएहैदराबाद, सुखोबंदी राजवाड़े, बंगालओड़िसा में कई प्रमुख शक्तियां थीं. हर क्षेत्र में स्थानीय राजा, नवाब और ठेकेदारों का शासन चलता था और आम जनता गरीबी, भुखमरी और कर के दबाव में जीवन जी रही थी.
औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया था.
मुगल शासन कमजोर हो चला था
मुगल साम्राज्य पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रहा. साल 1707 में औरंगजेब के निधन के बाद सत्ता को लेकर उसके पुत्रों में ही रार छिड़ी हुई थी. इसलिए धीरेधीरे केन्द्रीय सत्ता कमजोर पड़ती गई. देखते ही देखते बादशाहों की सारी शक्ति प्रांतीय अमीरों और सैन्य सरदारों के हाथों चली गई थी.
मुगल कमजोर हो रहे थे तब मराठा शक्ति पश्चिम और मध्य भारत में असर रखने लगी थी. बंगाल, अवध और बैंगलोर जैसे प्रदेशों में अपनीअपनी शासन व्यवस्थाएं थीं. उस जमाने में कई हिस्सों में स्थानीय राजनैतिक झड़पें आम थीं.
अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ने लगा था.
बढ़ता जा रहा था यूरोपीय व्यापारियों का प्रभाव
पोर्तुगीज़, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेजी व्यापारिक कंपनियां यहां हाथपांव पसार रही थीं. खासकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी व्यापारिक और सैन्य नीतियों से धीरेधीरे राजनीतिक प्रभुत्व बनाते हुए आगे बढ़ रही थी.
भारत की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी. जो थी भी वह बिखरी हुई. कहीं कोई सिरा मिलने को तैयार नहीं था. इतिहास के पन्ने पलटने पर जो सूरत बनती है, वह कुछ निम्नवत थी.
- कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था: अधिकतर आबादी खेती पर निर्भर थी. छोटे किसानों, ज़मींदारों और जमींदारी व्यवस्थाओं का बोलबाला था. फसलें स्थानीय उपयोग और बाजारों के लिए उगाई जाती थीं.
- कुटीर और हस्तशिल्प उद्योग: भारत उस समय कुटीर उद्योगों का केंद्र था. बुनाई, काष्ठ, धातु और हाथ से बने सामानों की बड़ी मांग थी. बनारसी सिल्क, मुगल कला और बंगाल के वस्त्र ख्यात थे. दुनिया भर में भारतीय कच्चा माल और हस्तनिर्मित वस्तुएं लोकप्रिय थीं.
- कर और जमींदारी व्यवस्था: कर का बोझ अक्सर किसानों पर पड़ता था. ज़मींदारी और पट्टेदारी की विविध व्यवस्थाएँ थीं. कुछ जगह बड़े जमींदार किसानों से उच्च कर वसूलते और खेती के तरीकों पर प्रभुत्व रखते थे.
- व्यापार और शहरों का विकास: समुद्री और आन्तरिक व्यापार से कुछ शहर फलफूल रहे थे. बंगाल और गुजरात के बंदरगाहों से विदेशी व्यापार सक्रिय था. चीन, अफ्रीका और यूरोप के साथ वस्तुओं का आदानप्रदान होता था.
250 साल पहले अधिकतर आबादी खेती पर निर्भर थी. फोटो: Pexels
कैसा था सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य?
- विविध समाज और धर्म: भारत में अनेक धर्म, भाषा और जातियां सहअस्तित्व में थीं. हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदाय हर क्षेत्र में मौजूद थे. सामाजिक रीतिरिवाज स्थानीय तौर पर भिन्न होते थे.
- शिक्षा और कला: शैक्षिक संस्थाएं स्थानीय और धार्मिक आधार पर संचालित थीं. कुछ शहरों में परंपरागत कला, संगीत और साहित्य समृद्ध थे. दरबारों में शायरियाँ, चित्रकला और स्थापत्य कला को प्रोत्साहन मिलता था.
- दैनिक जीवन: गांवों में जीवन सरल था. पारिवारिक और समुदायिक ढाँचे मजबूत थे. व्यापारिक शहरों में जीवन थोड़ा अधिक गतिशील और बहुरंगी था.
सैन्य और तकनीकी हालात
सेना और सैन्य शक्ति: सैन्य ताकतें अक्सर मिलीजुली और क्षेत्रीय थीं. घुड़सवार सेना, तलवारबाज़ और तोपखाने का प्रयोग होता था. लेकिन यूरोपीय सैनिक तकनीक और अनुशासन धीरेधीरे प्रभावी सिद्ध हो रहा था.
- यूरोपीय सैन्य तकनीक का प्रभाव: अंग्रेज़ और फ्रांसीसी कंपनियों ने आधुनिक ठोस तोपखाने और संगठित सैनिक संरचना लानी शुरू कर दी थी. इससे स्थानीय रियासतों पर असर पड़ा और युद्ध की रणनीतियां बदलने लगीं.
- तकनीकी प्रगति सीमित: औद्योगिक क्रांति के शुरुआती प्रभाव यूरोप में अधिक स्पष्ट थे. भारत में बड़े पैमाने पर मशीनरी और औद्योगिक परिवर्तन अभी नहीं आए थे. पर कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प में पारंपरिक कौशल उच्च था.
आर्थिकराजनीतिक परिवर्तन का आरंभ
- कंपनी की बढ़ती निरंकुशता: अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार से शासन की ओर कदम बढ़ाया. समय के साथ कंपनी ने कूटनीति, युद्ध और संधियों से क्षेत्रों में राजनीतिक नियंत्रण स्थापित किया.
- बंगाल में बदलाव के संकेत: 1757 में पानीपत के बाद नहीं, पर 1757 के प्लासी युद्ध और तत्पश्चात् घटनाओं ने बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी की ताकत बढ़ाई. राजस्व और प्रशासनिक नियंत्रण का नया स्वरूप उभरने लगा.
- साम्राज्य से औपनिवेशिक शासन की ओर कदम: धीरेधीरे कंपनी ने स्थानीय शासकों के साथ समझौते कर सत्ता का विस्तार किया. यह परिवर्तन आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक और राजनीतिक दिशा बदलने वाला था.
कैसा था आम लोगों का जीवन?
- जीवनयापन और गरीबी: कई लोगों के लिए जीवन संघर्षपूर्ण था. बाढ़, अकाल और युद्ध के कारण आम जनता प्रभावित होती थी. पर समाज की सहनशीलता और स्थानीय समन्वय कठिनाइयों का सामना करने में मदद करते थे.
- सामाजिक असमानताएं: जाति, वर्ग और संपत्ति के आधार पर असमानताएँ स्पष्ट थीं. भूमि के मालिक, व्यापारी और कारीगर के बीच आर्थिक भेद साफ दिखते थे.
- प्रवास और रोजगार: कुछ लोगों को व्यापारिक केंद्रों या समुद्र तटीय शहरों में रोजगार मिलता था. सैनिक नियुक्तियाँ भी आजीविका का स्रोत बनती थीं.
अमेरिका के आज़ाद होने के समय भारत एक बहुआयामी, जटिल और परिवर्तनशील भूमि थी. राजनीतिक कमजोरियों, क्षेत्रीय शक्तियों और बढ़ते यूरोपीय प्रभाव ने मिलकर उस दौर की तस्वीर बनाई. आर्थिक रूप से भारत कृषि और कुटीर उद्योगों पर निर्भर था, जबकि सामाजिक रूप से विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि स्पष्ट थी. आने वाले वर्षों में ये परिस्थितियां और बदलेंगी, पर 250 साल पहले की यह अवस्था भारत के इतिहास का एक निर्णायक और महत्वपूर्ण अध्याय थी.



