ट्रिब्यूनल ने कहा- करीब 2 करोड़ निवेशकों से जुटाई गई रकम प्राइवेट प्लेसमेंट नहीं, पब्लिक ऑफर थी

सहारा समूह को एक बार फिर बड़ा कानूनी झटका लगा है। सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने सहारा इंडिया कमर्शियल कॉरपोरेशन लिमिटेड (SICCL) और उसके निदेशकों की अपील खारिज कर दी है। इसके साथ ही सेबी की कार्रवाई को सही ठहराते हुए ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया कि कंपनी द्वारा जुटाया गया पैसा नियमों के दायरे में आता है।
यह पूरा मामला ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल डिबेंचर यानी OFCD के जरिए जुटाई गई भारी रकम से जुड़ा है। अक्टूबर 2018 में सेबी ने आदेश दिया था कि कंपनी इन डिबेंचर के जरिए जुटाई गई रकम निवेशकों को वापस करे, अपनी संपत्तियों का पूरा ब्योरा दे और कुछ अधिकारियों को शेयर बाजार से दूर रखा जाए।
अब 9 मार्च के आदेश में सैट की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि 1998 से 2008 के बीच सहारा की इस कंपनी ने जो OFCD जारी किए, वे असल में पब्लिक ऑफर थे। यानी यह मामला पूरी तरह से सेबी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
ट्रिब्यूनल ने यह भी बताया कि इस दौरान कंपनी ने करीब 14,106 करोड़ रुपये जुटाए थे और यह पैसा लगभग 1.98 करोड़ निवेशकों से लिया गया था। इतने बड़े पैमाने पर करोड़ों लोगों से पैसा जुटाना किसी भी तरह से प्राइवेट प्लेसमेंट नहीं माना जा सकता, जैसा कि सहारा दावा कर रही थी।
पीठ ने यह भी याद दिलाया कि कंपनियों से जुड़े कानून में 2000 में हुए बदलाव के बाद अगर किसी निवेश योजना को 50 या उससे ज्यादा लोगों को पेश किया जाता है, तो उसे पब्लिक इश्यू माना जाता है और उस पर सेबी के नियम लागू होते हैं।
सहारा ने यह दलील भी दी कि ज्यादातर पैसा निवेशकों को वापस कर दिया गया है। लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि कंपनी इसके पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सकी। सिर्फ चार्टर्ड अकाउंटेंट का सर्टिफिकेट यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि करीब दो करोड़ निवेशकों को पैसा लौटा दिया गया।
सैट ने यह भी साफ किया कि मामले की जांच शुरू करने में सेबी की तरफ से कोई देरी नहीं हुई। नियामक ने सहारा समूह से जुड़े दूसरे मामलों और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय से मिली जानकारी के आधार पर जांच शुरू की थी।
हालांकि इस फैसले में एक राहत भी मिली। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। ट्रिब्यूनल ने कंपनी के कुछ मैनेजरों और कंपनी सेक्रेटरी की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि वे सिर्फ कर्मचारी थे, इसलिए कंपनी के फैसलों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कुल मिलाकर इस फैसले ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि करोड़ों निवेशकों से पैसा जुटाने वाले मामलों में नियमों से बचना आसान नहीं है।





