यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट और चार्ज को लेकर संसद में संशोधन विधेयक पेश किए जाने के बाद से देश भर में एक व्यापक बहस छिड़ गई है। इस बीच सरकार ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करते हुए यह आधिकारिक घोषणा की है कि आम उपयोगकर्ताओं के लिए यूपीआई लेनदेन पूरी तरह से निशुल्क बना रहेगा और उपभोक्ताओं से किसी भी प्रकार का ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा। वित्त मंत्रालय की ओर से जारी किए गए बयान में यह साफ किया गया है कि रोजमर्रा के वित्तीय लेनदेन और सभी पर्सनटूपर्सन यानी व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई ट्रांसफर पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। हालांकि, कुछ विशिष्ट मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पर भविष्य में एमडीआर लग सकता है, लेकिन यह भी डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड पर लगने वाले शुल्कों की तुलना में काफी कम होगा।

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते लोकसभा में टैक्सेशन एंड अदर लॉज अमेंडमेंट बिल 2026 पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा पास भी कर दिया गया है। इस नए संशोधन विधेयक ने सरकार को यूपीआई और रूपे कार्ड से होने वाले लेनदेन पर शून्य एमडीआर की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने के लिए आवश्यक कानूनी आधार प्रदान कर दिया है। वर्तमान नियमों के तहत बैंक और विभिन्न पेमेंट सर्विस देने वाली कंपनियां यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड के माध्यम से भुगतान करने पर उपयोगकर्ताओं से कोई शुल्क नहीं वसूल सकती हैं। वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस विधेयक के संसद से पूरी तरह पास होने के बाद नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई की अध्यक्षता वाली एक विशेष कमेटी यह तय करेगी कि भविष्य में कोई एमडीआर लगाया जाना है या नहीं।

मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर भविष्य में मर्चेंट्स यानी कारोबारियों के लिए एमडीआर चार्जेज लागू भी किए जाते हैं, तो वे केवल एक तय सीमा से ऊपर के कुछ चुनिंदा मर्चेंट लेनदेन पर ही लगेंगे, जबकि अधिकांश छोटे और सामान्य मर्चेंट ट्रांजैक्शंस पूरी तरह से चार्जमुक्त रहेंगे। इस पूरे विधायी कदम को लेकर राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कांग्रेस पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने हाल ही में यह गंभीर आरोप लगाया था कि यह संशोधन विधेयक किसी बाहरी या अमेरिकी दबाव के कारण लाया गया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा था कि यह कदम अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की एक रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें यूपीआई और रूपे के शुल्कमुक्त होने की आलोचना की गई थी और यह आरोप लगाया गया था कि इन्होंने वीजा और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्म्स को बाजार से बाहर कर दिया है। ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। जयराम रमेश ने सरकार से यह सवाल किया था कि क्या सरकार विदेशी दबाव के तहत डिजिटल भुगतान के क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलना चाहती है।

विपक्ष के इन तमाम तीखे और राजनीतिक रूप से संवेदनशील आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए वित्त मंत्रालय ने इन सभी दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। मंत्रालय ने अपने आधिकारिक जवाब में यह दो टूक कहा कि इस प्रकार के आरोप पूरी तरह से आधारहीन, झूठ और जनता को गुमराह करने वाले हैं। सरकार का पक्ष रखते हुए यह बताया गया है कि इस संशोधन को लाने का वास्तविक और मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यूपीआई प्रणाली लंबे समय तक सुचारू रूप से चलती रहे, देश की डिजिटल पेमेंट टेक्नोलॉजी में लगातार सुधार हो सके और भविष्य में उभरने वाले किसी भी प्रकार के साइबर सुरक्षा जोखिमों का मजबूती के साथ सामना किया जा सके।

मंत्रालय के अनुसार, देश में यूपीआई के माध्यम से होने वाले लेनदेन में बेतहाशा और निरंतर वृद्धि हो रही है, जिसे देखते हुए साइबर सुरक्षा और तकनीकी बुनियादी ढांचे को और अधिक मजबूत करने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। इसके साथ ही, इस क्षेत्र में अधिक कंपनियों को अपना कामकाज बढ़ाने और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए एक आत्मनिर्भर और स्थिर रेवेन्यू मॉडल का होना भी अनिवार्य है। सरकार के इन स्पष्टीकरणों से यह बात साफ हो जाती है कि आम नागरिकों और सामान्य उपभोक्ताओं की जेब पर यूपीआई भुगतान को लेकर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं डाला जाएगा, और डिजिटल भुगतान की यह लोकलुभावन व्यवस्था पूरी सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ आगे भी सुचारू रूप से जारी रहेगी।