पब्लिक प्रोविडेंट फंड को भारत में सबसे सुरक्षित और लोकप्रिय निवेश विकल्पों में गिना जाता है. 15 साल की लॉकइन अवधि पूरी होने के बाद जब PPF अकाउंट मैच्योर होता है, तब निवेशकों के सामने बड़ा सवाल होता है कि जमा राशि निकाल ली जाए, अकाउंट को आगे बढ़ाया जाए या फिर निवेश जारी रखा जाए. वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम का नहीं, बल्कि भविष्य की वित्तीय जरूरतों और निवेश लक्ष्यों का भी होता है.

PPF की सबसे बड़ी खासियत

PPF आज भी उन चुनिंदा निवेश योजनाओं में शामिल है जिन्हें EEE का दर्जा प्राप्त है. इसका मतलब है कि निवेश पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत टैक्स छूट मिलती है, मिलने वाला ब्याज पूरी तरह टैक्सफ्री होता है और मैच्योरिटी पर मिलने वाली राशि पर भी कोई कर नहीं लगता. यही वजह है कि लंबे समय के निवेशकों के बीच इसकी लोकप्रियता बनी हुई है.

मैच्योरिटी के बाद उपलब्ध हैं तीन विकल्प

PPF अकाउंट मैच्योर होने के बाद निवेशक के पास तीन विकल्प होते हैं. पहला, पूरा पैसा निकालकर अकाउंट बंद करना. दूसरा, 55 साल के ब्लॉक में अकाउंट बढ़ाकर नया निवेश जारी रखना. तीसरा, अकाउंट को आगे बढ़ाना लेकिन उसमें नया निवेश न करना.

विशेषज्ञों के अनुसार, जिन लोगों को तत्काल पैसों की जरूरत नहीं है, उनके लिए अकाउंट को आगे बढ़ाना बेहतर विकल्प हो सकता है. इससे जमा राशि पर सरकार द्वारा तय ब्याज मिलता रहता है और टैक्सफ्री कंपाउंडिंग का लाभ भी जारी रहता है.

कब निकालना चाहिए पैसा?

यदि किसी निवेशक को रिटायरमेंट, घर खरीदने, बच्चों की पढ़ाई या किसी अन्य बड़े वित्तीय लक्ष्य के लिए धन की आवश्यकता है, तो मैच्योरिटी पर निकासी करना उचित हो सकता है. हालांकि केवल मैच्योरिटी पूरी होने को पैसा निकालने का कारण नहीं माना जाना चाहिए.

लंबी अवधि में फायदेमंद हो सकता है विस्तार

बाजार में उतारचढ़ाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच PPF जैसी सरकारी गारंटी वाली योजनाएं निवेशकों को स्थिरता प्रदान करती हैं. वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि में सुरक्षित तरीके से संपत्ति बनाना है, उनके लिए PPF अकाउंट को आगे बढ़ाना और कंपाउंडिंग का लाभ जारी रखना एक समझदारी भरा कदम साबित हो सकता है.