देशभर में वर्तमान समय में पेट्रोल में बीस प्रतिशत इथेनॉल मिलाने की नीति यानी ई20 को लेकर एक तीखी और व्यापक बहस छिड़ चुकी है। इस नीति को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव की स्थिति लगातार गहरी होती जा रही है। आम वाहन चालकों और विशेषकर मध्यम वर्ग के सामने यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ईंधन के इस नए विकल्प से उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है या फिर यह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का यह दृढ़ मत है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की तकनीक देश में पूरी तरह से विकसित की जा चुकी है और ब्राजील तथा अमेरिका जैसे बड़े देशों में इसका उपयोग बड़े पैमाने पर लंबे समय से किया जा रहा है। उनका यह तर्क है कि यदि ब्राजील अपनी गाड़ियों को शतप्रतिशत इथेनॉल यानी ई100 पर सफलतापूर्वक चला सकता है, तो भारत क्यों नहीं इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा सकता।

दूसरी ओर, इस नीति के विरोध में राजनीतिक दल और विपक्षी नेता मुखर होकर सामने आ रहे हैं। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने ई20 पेट्रोल को लेकर वाहन चालकों के बीच बढ़ रही नाराजगी और असंतोष को अपना मुख्य राजनीतिक मुद्दा बना लिया है। देश के विभिन्न हिस्सों से वाहन चालकों द्वारा यह गंभीर शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं कि ई20 पेट्रोल के इस्तेमाल से उनकी गाड़ियों के माइलेज में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। चालकों का यह भी कहना है कि इससे गाड़ियों की ओवरऑल परफॉर्मेंस खराब हो रही है और विशेष रूप से पुराने वाहनों के इंजनों को भारी नुकसान पहुंच रहा है। विपक्ष ने जनता की इन तमाम परेशानियों को सीधे तौर पर सरकार की नीतियों के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक अभियान के रूप में तब्दील कर दिया है।
तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं की यदि गहराई से समीक्षा की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि ई20 के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए आधुनिक वाहन इसे सुरक्षित तरीके से जरूर चला सकते हैं। हालांकि, वर्ष 2008 से पहले निर्मित पुराने वाहनों के इंजनों के लिए यह मिश्रण निश्चित रूप से कई प्रकार की तकनीकी दिक्कतें पैदा कर रहा है, हालांकि ऐसे पुराने वाहन धीरेधीरे सड़कों से बाहर हो रहे हैं। मुख्य समस्या यह है कि इथेनॉल में शुद्ध पेट्रोल की तुलना में लगभग दोतिहाई ही ऊर्जा मौजूद होती है, जिसके परिणामस्वरूप गाड़ियों के माइलेज में दो से छह प्रतिशत तक की गिरावट आना स्वाभाविक है। हालांकि सरकार का यह पक्ष रहा है कि इस बात की जानकारी पहले से होती है और ईंधन की कीमत तय करते समय इसे ध्यान में रखा जाता है, फिर भी आम जनता के स्तर पर यह एक बड़ा असंतोष का विषय बना हुआ है।
इथेनॉल के समर्थन में यह प्रमुख दावा किया जाता रहा है कि इसके प्रयोग से देश के तेल आयात के बिल में भारी कमी आएगी और हर साल लगभग छह अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा की बचत होगी। परंतु अर्थशास्त्रियों और जानकारों का एक वर्ग यह सवाल उठाता है कि इस प्रक्रिया में होने वाली वास्तविक शुद्ध बचत कागजी दावों से काफी कम या नगण्य भी हो सकती है। इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से मक्का, गन्ने के शीरे, गन्ने के रस और टूटे हुए चावल जैसी खाद्य फसलों से किया जाता है। इन सभी कृषि उत्पादों के अन्य व्यावसायिक और मानवीय उपयोग भी हैं। उदाहरण के लिए, चीनी का निर्यात किया जा सकता है, मक्के का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में बहुतायत से होता है, और चावल देश की विशाल आबादी के भरणपोषण के काम आता है। इन खाद्य फसलों को ईंधन के रूप में परिवर्तित करने की एक बहुत बड़ी आर्थिक और सामाजिक लागत चुकानी पड़ती है, जिसे अक्सर सरकारी गणनाओं के दौरान पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है।
फसलों की बुआई से लेकर उनके इथेनॉल में बदलने तक की पूरी प्रक्रिया में भारी मात्रा में रासायनिक खाद, डीजल, ट्रैक्टर के इस्तेमाल, कटाई और परिवहन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा, डिस्टिलेशन यानी इथेनॉल को निकालने की जटिल प्रक्रिया में सबसे अधिक मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है। इन तमाम छुपी हुई लागतों और ऊर्जा के व्यय को यदि कुल जोड़ में शामिल कर लिया जाए, तो विदेशी मुद्रा की जो वास्तविक बचत का अनुमान लगाया जाता है, वह बेहद कम नजर आती है। अंतरराष्ट्रीय तेल शोध संस्थान प्लैट्स के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर टैक्स को हटाने के बाद थोक पेट्रोल की कीमत लगभग 700 से 780 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बैठती है, जबकि इथेनॉल की कीमत लगभग 630 से 700 डॉलर प्रति बैरल होती है। चूंकि इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा की मात्रा काफी कम होती है, इसलिए शुद्ध रूप से देखने पर यह सौदा आर्थिक लाभ की जगह कई बार घाटे का सौदा साबित हो सकता है।
भारत और ब्राजील की भूभौगोलिक स्थितियों में भी जमीनआसमान का अंतर है। ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों के पास खेती योग्य भूमि की प्रचुरता है और वे आसानी से अपनी कृषि योग्य भूमि का दायरा बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत, भारत में उपजाऊ भूमि की भारी कमी है और जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है। ऐसी स्थिति में यदि देश की एकएक हेक्टेयर उपजाऊ जमीन का इस्तेमाल केवल ईंधन की फसलें उगाने के लिए किया जाएगा, तो इसका सीधा अर्थ यह होगा कि उतनी ही कम जमीन इंसानों के भोजन, प्राकृतिक जंगलों या आवास निर्माण के लिए उपलब्ध हो पाएगी। यही कारण है कि अब ऊर्जा विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या भारत को अपनी सीमित जमीन का उपयोग खाद्य सुरक्षा के लिए करना चाहिए या ईंधन के उत्पादन के लिए।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखें तो जब वर्ष 197374 के दौरान वैश्विक स्तर पर भयंकर तेल संकट उत्पन्न हुआ था, तब ब्राजील ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए इथेनॉल को एक बड़े विकल्प के रूप में अपनाया था। लेकिन आज की आधुनिक दुनिया की परिस्थितियां उस दौर से पूरी तरह बदल चुकी हैं। आज के समय में ऊर्जा के क्षेत्र में असली मुकाबला केवल पेट्रोल और इथेनॉल के बीच का नहीं रह गया है, बल्कि यह बहस अब इथेनॉल आधारित आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों और आधुनिक इलेक्ट्रिक वाहनों यानी ईवी के बीच की बन चुकी है।
ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ता चार्ल्स वॉरिंघम द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों और गणनाओं के अनुसार, यदि एक हेक्टेयर जमीन पर केवल सोलर पैनल स्थापित कर दिए जाएं और उनसे मिलने वाली बिजली से इलेक्ट्रिक वाहनों का संचालन किया जाए, तो वह ऊर्जा उत्पादन उस ऊर्जा से लगभग 187 गुना अधिक होगा जो उसी एक हेक्टेयर जमीन पर मक्का उगाकर उसे इथेनॉल में बदलने से प्राप्त होती है। ऊर्जा दक्षता का यह अंतर इतना विशाल है कि इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। मक्का का पौधा सूर्य की रोशनी को बायोमास में बदलने में बहुत अधिक दक्ष नहीं माना जाता है, और उसमें से केवल एक छोटे अंश के रूप में ही अनाज प्राप्त होता है। इसके बाद उस अनाज को किण्वित करके डिस्टिल करने की लंबी प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा बर्बाद होती है। अंत में जब उस इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाकर किसी वाहन के इंजन में जलाया जाता है, तो कार का पारंपरिक इंजन उस ईंधन में मौजूद कुल ऊर्जा का केवल तीस प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में ला पाता है। इस प्रकार ऊर्जा की पूरी श्रृंखला में हर चरण पर भारी मात्रा में नुकसान होता चला जाता है।
इसके मुकाबले यदि आधुनिक सोलर पैनलों की कार्यप्रणाली को देखा जाए, तो वे सीधे सूर्य की रोशनी को पर्यावरण के अनुकूल बिजली में परिवर्तित करने का काम करते हैं। ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। आज की उन्नत तकनीक के दम पर सोलर पैनल लगभग बाईस प्रतिशत दक्षता के साथ बिजली का उत्पादन कर रहे हैं, जो इथेनॉल की पूरी जटिल प्रक्रिया की तुलना में कई गुना अधिक प्रभावी और स्वच्छ साबित होती है। सोलर ऊर्जा से संचालित होने वाले इलेक्ट्रिक वाहन आज के समय में ऊर्जा उपयोग के लिहाज से सबसे अधिक कुशल और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। भारत सरकार के सामने अब यह स्पष्ट नीतिगत सवाल खड़ा हो गया है कि देश को ई10 से ई20 के दायरे को और आगे बढ़ाने पर जोर देना चाहिए या फिर पूरी तरह से भविष्य की तकनीक यानी ईवी और सौर ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
भारत वर्तमान समय में दुनिया भर में सबसे कम लागत पर सौर ऊर्जा का उत्पादन करने वाले अग्रणी देशों की श्रेणी में तेजी से शुमार हो रहा है। देश में आधुनिक बैटरी के निर्माण की कीमतें लगातार घट रही हैं, जिसके कारण इलेक्ट्रिक वाहन भी आम जनता के लिए धीरेधीरे सस्ते और सुलभ होते जा रहे हैं। इसके साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्जिंग से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी हर साल तेजी से विस्तारित हो रहा है। तकनीक के लगभग हर मोर्चे पर बिजली आधारित वाहन इथेनॉल आधारित विकल्पों से कहीं आगे निकलते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके बावजूद, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ब्राजील की तर्ज पर सौ प्रतिशत शुद्ध इथेनॉल पर चलने वाले वाहनों को देश में बढ़ावा देने की वकालत कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की फ्लेक्सफ्यूल कारें पारंपरिक पेट्रोल गाड़ियों की तुलना में लगभग बीस प्रतिशत तक अधिक महंगी साबित हो सकती हैं, और इनकी कुल कीमत सीधे तौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों के बराबर पहुंच जाएगी, जबकि बैटरियों के लगातार हल्के और सस्ते होने के कारण ईवी भविष्य में और अधिक किफायती होते जा रहे हैं।
इथेनॉल के मिश्रण को और अधिक बढ़ाने का समर्थन करने वाले जानकारों का यह तर्क रहता है कि हालिया खाड़ी देशों के संघर्षों ने यह साबित कर दिया है कि भारत को आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह से समाप्त कर देना चाहिए। हालांकि यदि धरातल पर वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जाए, तो वर्तमान में ब्रेंट क्रूड की अंतरराष्ट्रीय कीमत लगभग 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रही है, जबकि मौजूदा एनडीए सरकार के सत्ता में आने के शुरुआती दौर में यह कीमत करीब 115 डॉलर प्रति बैरल तक हुआ करती थी। वर्तमान समय में भारत के सामने वैसी विकट स्थिति या 197374 जैसा कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय तेल संकट नहीं है, जिसने उस दौर में ब्राजील को मजबूर करके एक नई इथेनॉल क्रांति की राह पर चलने के लिए विवश कर दिया था।
विशेषज्ञों का यह सुझाव है कि भारत को अचानक से अपनी ई20 नीति को पूरी तरह से बंद या समाप्त नहीं कर देना चाहिए। देश में पहले से हो चुके भारीभरकम वित्तीय निवेश, किसानों के आर्थिक हितों और ऑटोमोबाइल उद्योग की वर्तमान तकनीकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस बदलाव को बहुत ही क्रमिक और संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना ही समझदारी होगी। ई20 नीति को फिलहाल एक अंतरिम और सीमित व्यवस्था के रूप में जारी रखा जा सकता है, लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि देश में अक्सर ऐसी अंतरिम नीतियां लंबे समय तक स्थायी रूप से स्थापित हो जाती हैं। यही कारण है कि भारत को इथेनॉल के इस्तेमाल को लगातार और अधिक बढ़ाने के मोह या लालच से पूरी तरह बचना चाहिए।
मौजूदा समय की राजनीतिक बहस काफी हद तक अतीत के मुद्दों और पुरानी तकनीकों के इर्दगिर्द ही घूमती नजर आ रही है। एक तरफ जहां विपक्षी नेता अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी कुछ वाहन चालकों की तात्कालिक नाराजगी और असंतोष को आधार बनाकर ई20 नीति का विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मंत्री नितिन गडकरी देश की विदेशी तेल पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से इस नीति का पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं। परंतु इस राजनीतिक द्वंद्व के बीच दोनों ही पक्ष शायद उस मूल और सबसे बड़े सवाल को नजरअंदाज कर रहे हैं जो देश के भविष्य के लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है। असली और बड़ा मुद्दा यह है कि क्या भारत को बीते दौर की पारंपरिक तकनीकों में अपना भारी निवेश जारी रखना चाहिए या फिर भविष्य की आधुनिक और टिकाऊ हरित तकनीकों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिसका सटीक जवाब देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की स्पष्ट दिशा तय करता है।



