कौन है मोहम्मद अली जाफरी, जिनकी मोजेक डिफेंस थ्योरी के चलते ईरान को मात नहीं दे पा रहे इजरायल-US?!


ईरान समेत मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष के बीच एक नाम लगातार चर्चा में है और वो नाम मोहम्मद अली जाफरी का है. मोहम्मद अली जाफरी ईरान की सैन्य रणनीति का वो वास्तुकार माना जाता है जिसने ऐसी रक्षा नीति तैयार की है जिसने देश को बड़े पैमाने पर हमलों के बावजूद लड़ाई जारी रखने में सक्षम बनाया है. विशेषज्ञों के अनुसार जाफरी द्वारा विकसित ‘मोजेक रक्षा सिद्धांत’ ने ईरान की सैन्य संरचना को इस तरह बदल दिया कि शीर्ष नेतृत्व के नष्ट होने की स्थिति में भी सेना बिखरे नहीं बल्कि लड़ाई जारी रख सके.

ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ और ईरान पर बड़ा हमला
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसे ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ नाम दिया गया. इस अभियान का उद्देश्य ईरान के शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को निशाना बनाना था. हमलों में फाइटर विमान, ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया. इन हमलों में ईरान के कई वरिष्ठ नेता मारे गए जिनमें देश के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के कमांडर मेजर जनरल मोहम्मद पाकपुर और कई अन्य शीर्ष अधिकारी शामिल बताए गए.

अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि इतने बड़े हमले के बाद ईरान की कमान प्रणाली टूट जाएगी और देश की सैन्य क्षमता तेजी से कमजोर पड़ जाएगी. लेकिन इजरायल और अमेरिका की मंशा पर पानी फिर गया. हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर ईरान ने बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए.

ईरान क्यों नहीं टूटा?
विशेषज्ञों के मुताबिक इसका कारण था ‘मोजेक रक्षा सिद्धांत’ एक विकेंद्रीकृत सैन्य रणनीति जिसे वर्षों पहले मोहम्मद अली जाफरी ने तैयार किया था. इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अगर देश का केंद्रीय नेतृत्व या मुख्य सैन्य कमान नष्ट भी हो जाए तब भी सेना स्वतंत्र रूप से लड़ाई जारी रख सके. मोजेक सिद्धांत के तहत ईरान की सैन्य इकाइयों को अर्ध-स्वायत्त कमानों में विभाजित किया गया है जिन्हें स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की क्षमता दी गई है.

ईरान ने किया अमेरिकी ठिकानों पर हमला
संयुक्त हमलों के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने व्यापक जवाबी कार्रवाई शुरू की. बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों के जरिए कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. इन हमलों का प्रभाव कई खाड़ी देशों तक पहुंचा जिनमें संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन जैसे देश शामिल थे. इन हमलों ने यह संकेत दिया कि शीर्ष नेतृत्व के नुकसान के बावजूद ईरान की सैन्य मशीनरी सक्रिय है और समन्वित कार्रवाई कर सकती है.

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में इस रणनीति के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने लिखा कि ईरान ने पिछले दो दशकों में अमेरिका के युद्धों का अध्ययन किया है और उसी के आधार पर अपनी रक्षा रणनीति तैयार की है. उनका कहना था कि राजधानी तेहरान पर बमबारी से भी देश की युद्ध संचालन क्षमता प्रभावित नहीं होती क्योंकि सैन्य इकाइयां पहले से तय निर्देशों के आधार पर स्वतंत्र रूप से काम कर सकती हैं.

जानिए कौन है मोहम्मद अली जाफरी?
मोहम्मद अली जाफरी ईरान के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी हैं जिन्होंने इस्लामिक क्रांति के बाद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) में अपना करियर शुरू किया. 1979 की क्रांति के बाद उन्होंने कुर्दिस्तान क्षेत्र में तैनात एक खुफिया इकाई में काम किया. धीरे-धीरे उन्होंने सैन्य नेतृत्व में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया. जाफरी ने 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाई. यह युद्ध आधुनिक मध्य पूर्व के सबसे लंबे और विनाशकारी युद्धों में से एक था. इस युद्ध ने ईरान को यह सिखाया कि सीमित संसाधनों के बावजूद लंबे समय तक लड़ाई जारी रखकर मजबूत दुश्मन को भी रोका जा सकता है. युद्ध के बाद जाफरी का प्रभाव बढ़ता गया और उन्हें 1992 में IRGC की जमीनी सेना का कमांडर नियुक्त किया गया.

2005 में जाफरी को IRGC के ‘सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज’ का निदेशक बनाया गया. इसी दौरान उन्होंने ईरान की नई सैन्य रणनीति पर काम करना शुरू किया. जाफरी ने ईरान-इराक युद्ध और 2003 में अमेरिका द्वारा इराक पर हमले के आधार पर ये रणनीति तैयार की. इन दोनों घटनाओं ने उन्हें यह समझने में मदद की कि केंद्रीकृत सैन्य कमान कितनी कमजोर हो सकती है.

2003 के इराक युद्ध से मिला बड़ा सबक
2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया तो सद्दाम हुसैन की सेना कुछ ही हफ्तों में टूट गई. इसका मुख्य कारण यह था कि इराक की सैन्य संरचना पूरी तरह से केंद्रीकृत थी और सभी फैसले सद्दाम हुसैन के नियंत्रण में थे. जैसे ही केंद्रीय नेतृत्व कमजोर पड़ा सेना की विभिन्न इकाइयां एक-दूसरे से समन्वय नहीं कर पाईं और पूरा ढांचा ढह गया. जाफरी ने इस घटना का गहराई से अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि यदि ईरान को ऐसे ही हमले का सामना करना पड़े तो उसे एक अलग रणनीति अपनानी होगी.

मोजेक रक्षा सिद्धांत क्या है?
मोजेक रक्षा सिद्धांत मूल रूप से एक विकेंद्रीकृत सैन्य संरचना है. इस सिद्धांत के तहत देश की सैन्य शक्ति को कई स्वतंत्र इकाइयों में विभाजित किया जाता है जो केंद्रीय कमान से अलग होकर भी काम कर सकती हैं. इस रणनीति के मुख्य तत्व हैं:

– स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र सैन्य कमान
– पूर्व निर्धारित युद्ध योजनाएं
– स्थानीय संसाधनों का उपयोग
– तेज जवाबी हमला

31 प्रांतीय सैन्य कमान
मोजेक सिद्धांत के तहत ईरान ने IRGC को 31 प्रांतीय कमानों में पुनर्गठित किया. प्रत्येक कमान के पास होता है:

– अपना मुख्यालय
– मिसाइल और ड्रोन भंडार
– खुफिया नेटवर्क
– बासिज मिलिशिया इकाइयां
– गोला-बारूद का भंडार

इसका मतलब है कि यदि राष्ट्रीय कमान प्रणाली नष्ट हो जाए तब भी ये इकाइयां स्वतंत्र रूप से लड़ाई जारी रख सकती हैं.

बासिज मिलिशिया की भूमिका
इस रणनीति में बासिज नामक स्वयंसेवी मिलिशिया बल की बड़ी भूमिका है. ये बल स्थानीय स्तर पर संगठित होते हैं और आवश्यकता पड़ने पर नियमित सेना और IRGC के साथ मिलकर लड़ाई करते हैं. मोजेक सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा असममित युद्ध है. इसका अर्थ है कि ईरान सीधे बड़े युद्ध में नहीं उलझता बल्कि मिसाइल, ड्रोन, नौसैनिक हमलों और गुरिल्ला रणनीति का उपयोग करता है.

2026 के संघर्ष में इस सिद्धांत का प्रभाव साफ दिखाई दिया. हमले के शुरुआती चरण में ही ईरान के कई शीर्ष नेता मारे गए या घायल हो गए. इसके बावजूद सैन्य कार्रवाई रुकने के बजाय तेज हो गई. देश की विभिन्न प्रांतीय कमानों ने स्वतंत्र रूप से मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यही रणनीति ईरान को तुरंत हार से बचाती है. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि मोजेक सिद्धांत ईरान को युद्ध जीतने की गारंटी नहीं देता लेकिन यह उसकी हार को बेहद कठिन बना देता है.

इस रणनीति का परिणाम यह होता है कि दुश्मन के लिए तेज जीत हासिल करना लगभग असंभव हो जाता है. इसके बजाय युद्ध लंबा और महंगा बन जाता है जिससे हमलावर देशों की राजनीतिक और आर्थिक लागत बढ़ जाती है. मोहम्मद अली जाफरी द्वारा तैयार किया गया मोजेक रक्षा सिद्धांत आज ईरान की सैन्य रणनीति की रीढ़ बन चुका है.

यह सिद्धांत ईरान को पारंपरिक युद्ध में जीत दिलाने के लिए नहीं बल्कि उसे लंबे समय तक टिके रहने के लिए बनाया गया है. 2026 के संघर्ष ने दिखाया है कि यह रणनीति अभी भी प्रभावी है और यही कारण है कि भारी हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

 

Leave a Reply