श्रद्धा कपूर की आगामी फिल्म ‘ईथा’ का टीज़र इन दिनों इंटरनेट पर जबरदस्त तरीके से छाया हुआ है। इस प्रोमोशनल क्लिप को सिनेमाघरों में फिल्म ‘कॉकटेल 2’ के साथ अटैच किया गया था, जहाँ से लीक होकर यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। टीज़र में श्रद्धा कपूर का पारंपरिक मराठी ट्रांसफॉर्मेशन और दमदार अंदाज़ प्रशंसकों को बेहद पसंद आ रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि परदे पर दिखने वाली इस कहानी के पीछे की असली प्रेरणा कौन है?
यह फिल्म महाराष्ट्र की लोक संस्कृति का चेहरा बदलने वाली और ‘तमाशा सम्राज्ञी’ के नाम से मशहूर कलाकार विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर के असाधारण और संघर्षपूर्ण जीवन सफर को बड़े परदे पर जीवंत करने जा रही है। आइए जानते हैं इस महान कलाकार की अनकही दास्तान।

शुरुआती जीवन: विरासत में मिली कला और ‘तमाशा सम्राज्ञी’ का सफर
विठाबाई का जन्म साल 1935 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में लोक कला से जुड़े एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता और परिवार के अन्य सदस्य ‘भाऊबापू मांग नारायणगांवकर तमाशा मंडली’ का संचालन करते थे, जिसने उस दौर में महाराष्ट्र की पारंपरिक कलाओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
बचपन से ही कलाकारों के बीच पलीबढ़ीं विठाबाई ने बेहद कम उम्र में ही लावणी, गवलन, भेदिक और तमाशा जैसी पारंपरिक लोक शैलियों में महारत हासिल कर ली। धीरेधीरे उनकी ख्याति पूरे राज्य में फैल गई और उनके बेमिसाल हुनर को देखते हुए उन्हें “तमाशा सम्राज्ञी” के खिताब से नवाजा गया।
हालांकि, उनका यह सफर कांटों भरा था। पिता के निधन और पारिवारिक मंडली को भारी वित्तीय नुकसान होने के बाद, परिवार की इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की पूरी जिम्मेदारी विठाबाई के कंधों पर आ गई। तंगहाली के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और लोक थिएटर को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया।
वह ऐतिहासिक घटना जिसने विठाबाई को ‘लेजेंड’ बना दिया
वैसे तो विठाबाई का पूरा जीवन ही प्रेरणा की एक मिसाल है, लेकिन उनके जीवन की एक ऐसी अविश्वसनीय घटना है जिसने उन्हें हमेशाकहावत के लिए अमर कर दिया।
 

यह घटना तब की है जब विठाबाई नौ महीने की गर्भवती थीं और हमेशा की तरह मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रही थीं। लाइव शो के दौरान ही उन्हें अचानक तीव्र प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। कोई भी आम इंसान ऐसी स्थिति में तुरंत अस्पताल भागता, लेकिन विठाबाई का समर्पण अलग स्तर पर था। वे दर्शकों को छोड़कर जाने के बजाय कुछ समय के लिए बैकस्टेज गईं, जहाँ उन्होंने खुद ही अपने बच्चे की डिलीवरी संभाली, गर्भनाल को बांधा व काटा और बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद दोबारा स्टेज पर परफॉर्म करने लौट आईं। कला और मंच के प्रति उनके इस अभूतपूर्व और अदम्य साहस को देखकर दर्शक हक्केबक्के रह गए थे।
राष्ट्रपति से दो बार सम्मान और सर्वोच्च उपलब्धियां
1950 से लेकर 1990 के दशक तक विठाबाई तमाशा और लावणी की दुनिया का सबसे बड़ा स्तंभ बनी रहीं। कला के क्षेत्र में उनके इस ऐतिहासिक और अतुलनीय योगदान को देखते हुए देश के राष्ट्रपतियों द्वारा उन्हें दो बार सम्मानित किया गया—पहली बार साल 1957 में और दूसरी बार 1990 में।
साल 2006 में, कला जगत में उनके नाम को अमर रखने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने ‘विठाबाई नारायणगांवकर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ की शुरुआत की, जो हर साल तमाशा और पारंपरिक कला परंपरा में उत्कृष्ट योगदान देने वाले कलाकारों को दिया जाता है।

 
नों का संघर्ष:
जितनी शानदार विठाबाई की कला थी, उनके जीवन का अंत उतना ही दुखद रहा। जीवन के आखिरी सालों में वे गंभीर आर्थिक तंगी, स्वास्थ्य समस्याओं और निजी जीवन की बड़ी चुनौतियों से घिर गईं। साल 2002 में जब उनका निधन हुआ, तब हालात इतने खराब थे कि उनके परिवार के पास इलाज का खर्च उठाने तक के पैसे नहीं थे और अंततः समाज सेवकों व दानदाताओं की मदद से उनका इलाज कराया जा सका।
फिल्म ‘ईथा’ के बारे में
लक्ष्मण उतेकर के कुशल निर्देशन में बन रही फिल्म ‘ईथा’ विठाबाई नारायणगांवकर के 1940 से लेकर 1990 के दशक तक के इसी उतारचढ़ाव भरे और प्रेरणादायक सफर को दर्शकों के सामने पेश करेगी। फिल्म में श्रद्धा कपूर मुख्य भूमिका में नजर आएंगी। श्रद्धा के अलावा इस फिल्म में रणदीप हुड्डा, नाना पाटेकर, मोहम्मद जीशान अय्यूब और सिद्धार्थ जाधव जैसे बेहतरीन कलाकार मुख्य भूमिकाओं में दिखाई देंगे।
मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बन रही यह बायोपिक 28 अगस्त 2026 को रक्षाबंधन के अवसर पर सिनेमाघरों में रिलीज होगी। यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि श्रद्धा कपूर इस महान लोक कलाकार के दर्द, संघर्ष और उनकी कलात्मक ऊंचाई को परदे पर किस तरह उतारती हैं।
 
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