मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के चलते भारतीय रुपये में गिरावट जारी है. गुरुवार को एनर्जी इम्पोर्ट की बढ़ी हुई लागत के कारण रुपया अब तक के सबसे लो लेवल पर पहुंच गया. भारत की स्थिति करेंसी के मामले में जापान जैसी हो गई है. वहां भी येन डॉलर के मुकाबले 160 के लेवल पर पहुंच गया है, जो कि 2024 के बाद सबसे निचले स्तर पर है. भारत और जापान अभी लगभग सेम लाइन पर खड़े दिखाई दे रहे हैं क्योंकि दोनों देश के गवर्नर ब्याज दरें बढ़ाने में हिचकिचा रहे हैं. आइए इस खबर में यह समझते हैं कि आरबीआई के सामने रुपये को लेकर कितनी चुनौती है.

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा के रुपये के सामने कई सारी चुनौतियां आ गई हैं, जिसके पीछे की सबसे बड़ी वजह फॉरेन एक्सचेंज मार्केट का प्रेशर मानी जा रही है और ईरान में दो महीने पहले शुरू हुए युद्ध का असर भी इसमें प्रमुख रहा है. यह असर फिलिपीन पेसो और इंडोनेशियाई रुपिया पर भी पड़ा है. इन देशों के सेंट्रल बैंक भी अपनी पॉलिसी रेट्स बढ़ाने में हिचकिचा रहे हैं, लेकिन पिछले दो सालों में भारतीय मुद्रा एशिया में सबसे खराब परफॉर्म करने वाली करेंसी रही है और यह स्थिति अगर ज्यादा समय तक बनी रहती है तो वह इकोनॉमी के लिए अच्छी खबर नहीं है.
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में रुपये का कमजोर होना शायद एक प्लान्ड स्ट्रेटेजी थी, ताकि एक्सपोर्टर्स को अमेरिका के टैरिफ से बचाया जा सके. दिसंबर 2024 में गवर्नर बनने के बाद मल्होत्रा ने पॉलिसी रेट में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती की थी. साथ ही RBI ने बैंकों में करीब 20 ट्रिलियन रुपये डाले थे, जो महामारी के दौरान दी गई लिक्विडिटी से भी ज्यादा था. फिर भी ये पैसा बैंकिंग सिस्टम से बाहर निकल गया, क्योंकि ग्लोबल इन्वेस्टर्स ने लोकल एसेट्स बेचकर डॉलर में पैसा वापस ले लिया. नतीजा ये हुआ कि बैंकों के लिए फंडिंग अभी भी टाइट बनी हुई है.
कैपिटल आउटफ्लो में आ सकती है तेजी
अब जब मिडिल ईस्ट से तेल और गैस सप्लाई में दिक्कत के कारण रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के साइकोलॉजिकल लेवल की तरफ बढ़ने का खतरा है गुरुवार को रुपया 94.92 पर बंद हुआ और इंट्राडे में 95 पार किया था ऐसे में कैपिटल आउटफ्लो और तेज हो सकता है. पिछले एक साल में विदेशी निवेशकों ने इक्विटी मार्केट से 26 बिलियन डॉलर निकाले हैं, जिनमें से 20 बिलियन सिर्फ जनवरी के बाद निकले हैं. इंटरेस्ट रेट डेरिवेटिव मार्केट यह संकेत दे रहे हैं कि RBI को अपनी ग्रोथफ्रेंडली, ईजीमनी पॉलिसी को वापस लेना पड़ सकता है, ताकि एक्सचेंज रेट को संभाला जा सके और पिछले दो सालों की 12% गिरावट और न बढ़े. इससे बैंकरों के सामने नई प्रॉब्लम खड़ी हो गई है.
महंगे लोन वाले ग्राहकों पर खतरा
जब एनर्जी क्राइसिस चल रहा है, तो महंगे लोन लेने वाले ग्राहकों की संख्या में भी कमी आएगी. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से पहले, कंज्यूमर और बिजनेस लोन में 14.5% की अच्छी ग्रोथ हो रही थी. उस समय RBI लेंडिंग को और बढ़ाना चाहता था और बैंकों को ज्यादा फ्रीडम देने की सोच रहा था, ताकि सिस्टम इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स के बराबर हो सके.
भारतीय बैंकों की एसेट क्वालिटी अभी काफी मजबूत है, जो पिछले दशक में सबसे बेहतर है. लेकिन अगले साल से RBI चाहता है कि बैंक संभावित NPA के लिए पहले से प्रोविजन रखें. प्राइवेट बैंकों के लिए यह आसान होगा, लेकिन सरकारी बैंकों को जो MSME सेक्टर में ज्यादा एक्सपोज्ड हैं अपने बैलेंस शीट को क्लीन करना पड़ सकता है. पिछले साल सरकारी बैंकों के डिफॉल्ट लोन में 25% से ज्यादा हिस्सा MSME का था. इसका मतलब है कि बैंक अब इस सेक्टर में लोन देने में ज्यादा सावधानी बरतेंगे.
बैंकों के सामने चुनौती
BMI की रिपोर्ट के अनुसार, बैंक अब लोन ग्रोथ से ज्यादा एसेट क्वालिटी को बचाने पर फोकस करेंगे. अब तक सरकार ने तेल रिफाइनरियों पर दबाव डाला है कि वे महंगे कच्चे तेल का बोझ सीधे कंज्यूमर पर न डालें. लेकिन LPG की कमी पहले से ही लोगों को परेशान कर रही है. सरकार के पास इतनी फाइनेंशियल कैपेसिटी नहीं है कि वह लंबे समय तक सब्सिडी देती रहे. मार्च में इन्फ्लेशन 3.4% रहा, जो RBI के टारगेट के अंदर है. लेकिन हीटवेव और कमजोर मानसून की आशंका से फूड इन्फ्लेशन बढ़ सकता है.
ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना जरूरी?
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई को इस समय ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने से नहीं बचना चाहिए. महंगाई को काबू में करने के लिए अब ब्याज दर बढ़ाना जरूरी हो गया है और इससे बचना मुश्किल है. जैसे ही ब्याज दरें बढ़ेंगी, लोग कम खर्च करेंगे और कम लोन लेंगे, जिससे मांग घटेगी. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। अगर यह कदम समय पर नहीं उठाया गया, तो अभी जो बैंक मजबूत दिख रहे हैं उनकी बैलेंसशीट खराब हो सकती है. महंगाई बढ़ने से लोगों का भविष्य को लेकर भरोसा भी कमजोर पड़ता है, जिसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.





