21 देशों में महंगाई से मचा हड़कंप, ईरान-अमेरिका युद्ध ने कैसे बिगाड़े हालात‌?

मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान का युद्ध फिर शुरू हो सकता है। क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से तनाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिका परमाणु समझौते के बिना युद्ध खत्म करने और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए राजी नहीं है। ईरान भी परमाणु कार्यक्रम बंद करने को तैयार नहीं है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। लेकिन दोनों देशों के अड़ियल रवैये का खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। क्योंकि कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं, जिस वजह से यूरोप के 21 देशों में महंगाई बढ़ने से हड़कंप मच गया है।

21 देशों में महंगाई से मचा हड़कंप, ईरान-अमेरिका युद्ध ने कैसे बिगाड़े हालात‌?

बता दें कि होर्मुज स्ट्रेट ब्लॉक होने से तेलगैस की सप्लाई बाधित हो गई है। इसलिए यूरोप के 21 देशों में महंगाई का बम फूटा है। यूरोजन की ग्रोथ रेट बेहद स्लो हो गई है। इसका कारण कच्चे तेल और ऊर्जा संसाधनों का महंगा होना है। अमेरिका और ईरान युद्ध को ग्लोबल इकोनॉमी के लिए झटका माना जा रहा था, जिसके सबूत भी अब सामने आने लगे हैं। भारतपाकिस्तान समेत कई देशों में जहां तेलगैस का संकट गहराया। वहीं यूरोपीय देशों में रोजमर्रा की चीजें महंगी होने से संकट बढ़ा है।

होर्मुज ने बिगड़ा यूरोप का खेल
USIran War के चलते दुनिया को तेल और गैस की सप्लाई के लिए महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के चलते फ्यूल सप्लाई पर गहरा असर हुआ। पाकिस्तान, ब्रिटेन से लेकर श्रीलंका, भारत और साउथ कोरिया तक में इसका असर देखने को मिला। इन देशों में पेट्रोलडीजल से लेकर एलपीजी तक की कीमतों में तगड़ा इजाफा देखने को मिला।

वहीं अप्रैल में यूरोप में महंगाई दर भी तेजी से बढ़ा है, क्योंकि ग्रोथ रेट लगातार कमजोर हो रहा है। इस तरह से Inflation Rate Rise न सिर्फ कंज्यूमर्स और यूरोपियन सेंट्रल बैंक के पॉलिसीमेकर्स दोनों के लिए चिंता की बात है।

महंगाई से सहमे 21 देश
21 देश, जो शेयर्ड यूरो करेंसी का इस्तेमाल करते हैं, वो महंगाई बढ़ने से सहमे हुए हैं। इनमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, फिनलैंड, फ्रांस , जर्मनी , इटली , नीदरलैंड्स , स्पेन जैसे नाम शामिल हैं। एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोजोन में सालाना महंगाई दर मार्च में 2।6% से बढ़कर अप्रैल में 3% हो गई। इसकी बड़ी वजह एनर्जी की कीमतों में 10।9% की तगड़ी बढ़ोतरी रही।

यूरोपियन यूनियन की स्टैटिस्टिकल एजेंसी यूरोस्टैट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर ट्रेड करने से ये खराब हालात बने, जो कि 28 फरवरी को अमेरिकाइजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से पहले करीब 73 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रही था।

ग्रोथ रेट ने किया निराश
न सिर्फ महंगाई, बल्कि यूरोजन की ग्रोथ रेट ने भी निराश किया है। साल के पहले तीन महीनों में यूरोज़ोन की ग्रोथ पिछली तिमाही की तुलना में इकोनॉमिक आउटपुट में 0।1% की मामूली बढ़त में रही। इन आंकड़ों को देखकर साफ कहा जा सकता है कि वेस्ट एशिया का युद्ध ग्लोबल इकॉनमी के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ है।

सबसे खराब हालात ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को ब्लॉक करने से बने हैं, जो कि वह समुद्री रास्ता है जिससे पहले दुनिया का लगभग 20% तेल फारस की खाड़ी के जरिए प्रोड्यूसर्स से कस्टमर्स तक जाता था। तेल की कीमतों में उछाल का असर गैस स्टेशनों और जेट फ्यूल की कीमतों पर तुरंत दिखा है।

बढ़ती महंगाई ने चिंता जताई है कि यह धीमी या न के बराबर ग्रोथ के साथ इकॉनमी में शामिल हो सकती है, जो कि पॉलिसीमेकर्स के लिए एक बड़ी उलझन है और इसे स्टैगफ्लेशन कहा जाता है। इससे ECB जैसे सेंट्रल बैंकों के पास कुछ ही अच्छे ऑप्शन बचते हैं। महंगाई को कंट्रोल करने का सबसे आम तरीका यह है कि सेंट्रल बैंक अपनी बेंचमार्क इंटरेस्ट रेट बढ़ा दे, लेकिन इससे चीजें खरीदने के लिए क्रेडिट कॉस्ट बढ़कर ग्रोथ धीमी हो सकती है।

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