उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आंधीबारिश का सिलसिला शुरू हो गया है, लेकिन मानसून के शुरुआती महीनों में 43 फीसदी बारिश कम हुई है. जिससे खरीफ की फसलों पर खतरा बढ़ गया है. बारिश की कमी के कारण बुवाई घटी और इसका असर उत्पादन पर दिख सकता है. भारतीय अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन के लिए मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक जीवन रेखा है. जब मानसून कमजोर होता है, तो उसका असर हमारे जीवन पर लंबे समय तक पड़ता है. इसका असर केवल खेतों तक नहीं रहता, बल्कि वह आपकी जेब, थाली और देश की तरक्की की रफ्तार पर भी पड़ता है. आशंका है कि इस बार मानसून कमजोर रहेगा.

आइए, समझते हैं कि खेती से लेकर महंगाई तक, मानसून के कमजोर होने से कैसे बिगड़ सकता है देश का पूरा गणित, जानें ये भारत के लिए क्यों जरूरी?

भारत की किस्मत का फैसला करता है मानसून

भारत में मानसून जून से सितंबर तक चलता है. इसी बीच देश की वार्षिक वर्षा का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा जमीन पर पहुंचता है. भारत की लगभग 50 प्रतिशत खेती आज भी पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है. यदि मानसून कमज़ोर होता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है, जिसका सीधा असर देश की जीडीपी पर पड़ता है.

बारिश नहीं तो संकट में खेती, उत्पादन पर नकारात्मक असर

कमजोर मानसून का सबसे पहला और भीषण प्रहार खेतीकिसानी पर होता है. भारत में धान, दलहन और तिलहन जैसी मुख्य फसलें मानसून के भरोसे उगाई जाती हैं. इसके देर से होने या न होने के कई मायने हैं.

  • बुवाई में देरी: बारिश कम होने से किसान फसलों की बुवाई नहीं कर पाते या इसमें देरी हो जाती है.
  • पैदावार का गिरना: पानी की कमी से खड़ी फसलें सूखने लगती हैं, जिससे उत्पादन कम हो जाता है.
  • सिंचाई का खर्च: बारिश न होने पर किसानों को डीजल पंप या ट्यूबवेल का सहारा लेना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है और फिर भी उत्पादन वह नहीं होता, जो मानसून के अच्छा रहने की वजह से होता है.

कमजोर मानसून दालों को महंगा करता है. फोटो: Pexels

महंगाई तोड़ती कमर, थाली से दूर होती दालरोटी

जब खेती कमजोर होती है, तो बाजार में अनाज की आपूर्ति घट जाती है. मांग उतनी ही रहती है, जिससे कीमतें आसमान छूने लगती हैं. मांग और आपूर्ति में अंतर की वजह से पूरा का पूरा ढांचा बिगड़ने लगता है. इसका असर कई तरीके से पड़ता है.

  • खाद्य मुद्रास्फीति: अनाज, दालों और सब्जियों की बढ़ती कीमतें फूड इन्फ्लेशन को बढ़ाती हैं.
  • दालों का संकट: भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है. मानसून बिगड़ने से तुअर और उड़द जैसी दालें महंगी हो जाती हैं.
  • पशु आहार: चारा कम होने से दूध और डेयरी उत्पादों की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं.

ग्रामीण मांग में गिरावट और व्यापार पर असर

अभी भी भारत की एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है. जब किसानों की फसल अच्छी होती है, तो उनके पास पैसा आता है, जिसे वे मोटरसाइकिल, मोबाइल, ट्रैक्टर और कपड़ों पर खर्च करते हैं. अगर मानसून खराब रहा, तो ग्रामीण इलाकों से मांग कम हो जाती है. इसका सीधा असर एफएमसीजी, ऑटोमोबाइल तथा अन्य सेक्टर्स पर पड़ता है. फसल बर्बाद होने से किसान कर्ज के जाल में फंस जाते हैं, जिससे बैंकिंग सेक्टर पर भी दबाव बढ़ता है.

बारिश कम होने पर अनाज का उत्पादन घटता है. फोटो: Pexels

जल संकट और बिजली उत्पादन भी होता है प्रभावित

मानसून केवल खेतों को पानी नहीं देता, बल्कि देश के जलाशयों और बांधों को भी भरता है. कम बारिश का मतलब है कि गर्मियों में भूजल स्तर नीचे चला जाएगा और शहरों में पानी की कमी होगी. भारत में बिजली का एक बड़ा हिस्सा जल विद्युत परियोजनाओं से आता है. जलस्तर कम होने से बिजली उत्पादन कम हो जाता है, जिससे उद्योगों और घरों में कटौतियां बढ़ जाती हैं.

कमजोर मानसून के पीछे अल नीनो का हाथ

अक्सर मानसून के कमजोर होने के पीछे अल नीनो जैसी भौगोलिक घटनाएं होती हैं. यह प्रशांत महासागर में पानी के गर्म होने की स्थिति है, जो भारत में हवाओं के रुख को मोड़ देती है और बारिश कम कर देती है. जलवायु परिवर्तन के कारण अब मानसून का पैटर्न भी अनिश्चित हो गया है.

मानसून भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता की नींव है. फोटो: PTI

आंकड़ों की जुबानी देखें कम बारिश का इम्पैक्ट

जब भी तेज या कमजोर मानसून की बात होती है तो लोगों की अलगअलग प्रतिक्रियाएं भी होती हैं. लेकिन ये हमारे जीवन और देश के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसे समझने को आंकड़ों पर दृष्टि डालनी होगी. यह भी पता चलेगा कि कमजोर मानसून हमें कहांकहां डेन्ट देता है.

  • जीडीपी योगदान: भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान लगभग 1518 प्रतिशत है, लेकिन यह देश की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी को रोजगार देता है.
  • खाद्यान्न लक्ष्य: सरकार हर साल करीब 330340 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य रखती है. मानसून की 10 प्रतिशत कमी इस लक्ष्य को 57 प्रतिशत तक गिरा सकती है.
  • महंगाई का गणित: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं का भार करीब 46 प्रतिशत है. मानसून खराब होने पर खाद्य महंगाई दर 10 प्रतिशत के पार जा सकती है.
  • सिंचाई का दायरा: भारत के कुल बोए गए क्षेत्र का केवल 52 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है, बाकी 48 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह बारिश पर निर्भर है. मतलब बारिश नहीं हुई तो यह 48 फीसदी फसलें तबाह होना तय है.

अच्छी बारिश का मतलब है सस्ता भोजन और कम महंगाई. फोटो: PTI

भारत के लिए मानसून क्यों है जरूरी?

मानसून भारत की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता की नींव है. अच्छी बारिश का मतलब है सस्ता भोजन और कम महंगाई. गांवों में खुशहाली और बढ़ती डिमांड. सरकारी खजाने पर बोझ कम होना. क्योंकि सरकार को बाहर से अनाज नहीं मंगाना पड़ता. अच्छी फसल से शेयर बाजार में मजबूती दिखती है. मतलब गाँव से लेकर शहर तक इसका असर देखा जाता है.

सरल शब्दों और संक्षेप में कहें तो मानसून का कमजोर होना केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक आर्थिक आपदा की तरह है. यह अमीर से लेकर गरीब तक, हर किसी की जेब पर किसी न किसी रूप में असर डालता है. सरकारें सिंचाई की नई तकनीकें और सूखारोधी फसलों को बढ़ावा देकर इस जोखिम को कम करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन आज भी भारत का आर्थिक गणित काफी हद तक बादलों की मेहरबानी पर ही टिका है.