पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार अपने पहले बजट की तैयारियों में जुटी है। लेकिन चुनावी वादों को अमलीजामा पहनाने की राह में सरकार के सामने एक बड़ी वित्तीय चुनौती खड़ी हो गई है। यदि भाजपा अपने चुनावी घोषणापत्र के वादों को पूरा करती है तो राज्य में सामाजिक कल्याण योजनाओं और भत्तों पर होने वाला खर्च लगभग दोगुना हो जाएगा। इन वादों में लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली मासिक सहायता में वृद्धि, बेरोजगारी भत्ते का विस्तार और सरकारी कर्मचारियों का बकाया महंगाई भत्ता शामिल है।

वर्तमान में राज्य सरकार इन कल्याणकारी योजनाओं पर लगभग 54,000 करोड़ खर्च कर रही है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। इसमें डीए का बकाया शामिल नहीं है। यदि सभी तीन प्रमुख वादे लागू किए जाते हैं, तो यह वार्षिक खर्च बढ़कर 1.29 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा। पश्चिम बंगाल की वर्तमान वित्तीय स्थिति पर गौर करें तो अनुमानित राजस्व घाटा 21,759 करोड़ है। वहीं, कुल कर्ज का बोझ 8.15 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों के लिए कर्ज का सुरक्षित स्तर 20% से 25% माना जाता है, जबकि पश्चिम बंगाल का कर्ज इसके जीएसडीपी का लगभग 38% है। वित्त विभाग के अधिकारियों के अनुसार, योजनाओं के विस्तार और डीए भुगतान के कारण राजस्व घाटा 21,759 करोड़ से बढ़कर 31,000 करोड़ तक जा सकता है।
लक्ष्मी भंडार बना अन्नपूर्णा भंडार
ममता बनर्जी सरकार द्वारा 2021 में शुरू की गई ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना का नाम बदलकर भाजपा सरकार ने ‘अन्नपूर्णा भंडार’ करने का पहला कदम उठा लिया है। वर्तमान में इसके तहत लगभग 2.20 करोड़ महिलाएं लाभार्थी हैं। सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1,500 और एससी/एसटी वर्ग की महिलाओं को 1,700 प्रति माह मिलते हैं। इस पर सालाना 39,000 करोड़ का खर्च आता है। भाजपा का वादा है कि सभी महिलाओं के लिए इस राशि को बढ़ाकर 3,000 प्रति माह किया जाए। इससे वार्षिक खर्च बढ़कर 79,000 करोड़ हो जाएगा।
बेरोजगारी भत्ता
तृणमूल कांग्रेस सरकार ने चुनाव से ठीक पहले ‘युवा साथी’ योजना शुरू की थी, जिसमें 1,500 प्रति माह का प्रावधान था और कुछ ही दिनों में 84 लाख युवाओं ने इसके लिए पंजीकरण कराया था। इस पर सालाना 15,000 करोड़ खर्च हो रहे हैं। भाजपा ने भत्ते की राशि को दोगुना करके 3,000 प्रति माह करने का वादा राज्य की जनता से किया है। इसके साथ ही अगले 5 वर्षों में 1 करोड़ नए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करने की बात कही गई है। इस भत्ते को लागू करने पर सालाना खर्च 30,000 करोड़ हो जाएगा।
सातवां वेतन आयोग और डीए बकाया
भाजपा ने सरकार बनने के 45 दिनों के भीतर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और डीए के बकाए का भुगतान करने का वादा किया था। इसका लाभ 3.25 लाख राज्य कर्मचारियों और 3.5 लाख पेंशनभोगियों को मिलेगा। वर्तमान में केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 60% डीए मिलता है, जबकि बंगाल के कर्मचारियों को केवल 18% मिल रहा है। इस अंतर को पाटने के लिए राज्य को सालाना 20,000 करोड़ अतिरिक्त खर्च करने होंगे। 5 फरवरी के एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को पांचवें वेतन आयोग के अनुसार डीए बकाया चुकाने का निर्देश दिया है, जो एकमुश्त मुआवजे के रूप में लगभग 42,000 करोड़ बनता है। इस साल केवल डीए और बकाए के भुगतान पर ही 62,000 करोड़ का अतिरिक्त भार आ सकता है।
इसके अलावा, टीएमसी शासनकाल की कन्याश्री, रूपश्री, कृषक बंधु और मछुआरों के लिए चल रही योजनाओं पर करीब 4,000 करोड़ का खर्च आता है। भाजपा सरकार इनमें से कुछ योजनाओं जैसे कि किसान और मछुआरा योजनाएं को केंद्रीय योजनाओं में समाहित करने जा रही है, जिससे राज्य के खजाने को थोड़ी राहत मिलेगी।
वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, “मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साफ किया है कि सभी डीबीटी योजनाएं जारी रहेंगी। इससे खजाने पर बोझ तो बढ़ेगा, लेकिन डबल इंजन सरकार होने के नाते अब जो केंद्रीय योजनाएं पहले रुकी हुई थीं वे दोबारा शुरू होंगी और उनका पैसा केंद्र से आएगा। उदाहरण के लिए आयुष्मान भारत योजना स्वास्थ्य साथी की जगह लेगी, जिससे राज्य का खर्च कम होगा।”
राजस्व बढ़ाने और फालतू खर्च रोकने पर जोर
इस भारी वित्तीय भार से निपटने की रणनीति पर बात करते हुए राज्य के मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल ने कहा, “हम राज्य का राजस्व बढ़ाएंगे और अनावश्यक खर्चों में कटौती करेंगे। हम वित्त अधिकारियों के साथ बैठकर इसका रास्ता निकालेंगे। आजादी के बाद इस राज्य में भाजपा को पहली बार इतना बड़ा जनादेश मिला है। इसलिए सरकार को कर्ज के भारी बोझ के नीचे दबे बिना, लोगों की आकांक्षाओं और उम्मीदों को पूरा करना होगा।”





