हिंदी सिनेमा में जब भी हीरो शब्द लिया जाता है, तो सबसे पहले जिन चेहरों की याद आती है, उनमें अमिताभ बच्चन सबसे ऊपर खड़े दिखाई देते हैं। 70 के दशक में एंग्री यंग मैन बनकर उन्होंने सिस्टम से लड़ने वाले नायक की नई परिभाषा लिखी। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस अभिनेता को दर्शकों ने सबसे बड़ा हीरो बनाया, उसी को उन्होंने कई बार विलेन या फिर एंटीहीरो के रूप में भी सिर आंखों पर बैठाया।

बड़ी स्क्रीन पर अमिताभ बच्चन का जादू सिर्फ इसलिए नहीं चला, क्योंकि वह अच्छाई के प्रतीक थे, बल्कि इसलिए भी चला क्योंकि उन्होंने बुराई, गुस्से, बदले और टूटे हुए इंसान की भावनाओं को भी उतनी ही ईमानदारी से निभाया। यही वजह रही कि जबजब उन्होंने ग्रे शेड्स या खलनायक जैसे किरदार निभाए, पूरी लाइमलाइट उन्हीं के नाम रही। चलिए आज हम आपको उनके कुछ ऐसे ही किरदार के बारे में बताते हैं। साथ ही यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि विलेन के रूप में भी लोगों ने उन्हें इतना क्यों पसंद किया।
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परवाना जब अमिताभ बच्चन बने जुनूनी और खतरनाक प्रेमी
अमिताभ बच्चन के एंटीहीरो किरदारों की बात हो और ‘परवाना’ का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। 1971 में आई इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कुमार सेन नाम का किरदार निभाया था। एक ऐसा इंसान जो प्यार में इतना पागल हो जाता है कि अपराध की राह पर उतर आता है। दिलचस्प बात यह है कि यह वह दौर था जब अमिताभ बच्चन अभी सुपरस्टार नहीं बने थे।
इंडस्ट्री में उनकी पहचान बन ही रही थी। ऐसे समय में उन्होंने एक निगेटिव किरदार चुनकर बड़ा जोखिम लिया। फिल्म में कुमार सेन एक साधारण युवक है, जो आशा नाम की लड़की से बेहद प्यार करता है। लेकिन जब आशा किसी और को पसंद करने लगती है, तो कुमार का प्यार जुनून में बदल जाता है।
धीरेधीरे उसके अंदर का अंधेरा बाहर आने लगता है और वह हत्या तक कर बैठता है। उस दौर के हिसाब से यह किरदार काफी अलग और बोल्ड था। हिंदी फिल्मों में प्रेमी अक्सर त्याग करने वाला हीरो होता था, लेकिन ‘परवाना’ में अमिताभ का किरदार प्यार में हारने के बाद खतरनाक बन जाता है।
डॉन जब विलेन ही बन गया स्टाइल आइकन
अगर अमिताभ बच्चन के सबसे आइकॉनिक एंटीहीरो किरदार की बात होगी, तो ‘डॉन’ का नाम जरूर शामिल होगा। 1978 में आई इस फिल्म में उन्होंने दोहरी भूमिका निभाई थी। एक तरफ सीधासादा विजय और दूसरी तरफ निर्दयी, चालाक और खतरनाक डॉन। दिलचस्प बात यह थी कि फिल्म में डॉन पूरी तरह नकारात्मक किरदार था।
वह अपराध की दुनिया का बादशाह था, जिसे किसी की जान लेने में हिचक नहीं होती। लेकिन अमिताभ ने इस किरदार को सिर्फ खतरनाक नहीं रहने दिया, उन्होंने उसमें एक ऐसा स्वैग भर दिया कि दर्शक उसी पर फिदा हो गए। इसके अलावा ‘डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है’ जैसे डायलॉग सिर्फ डायलॉग नहीं रहे, बल्कि पॉप कल्चर का हिस्सा बन गए।
उस दौर में खलनायक से लोग नफरत करते थे, लेकिन डॉन ऐसा विलेन था जिसकी चाल, कपड़े, बोलने का अंदाज और कॉन्फिडेंस लोगों को आकर्षित कर रहा था। असल में, अमिताभ ने यहां यह साबित कर दिया था कि दर्शक सिर्फ अच्छाई नहीं, करिश्मा भी पसंद करते हैं।
आंखें जब अमिताभ ने अंधे लोगों को बनाया अपराधी
2002 में आई ‘आंखें’ अमिताभ बच्चन के करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट थी। उम्र बढ़ने के बाद ज्यादातर अभिनेता सुरक्षित भूमिकाएं चुनते हैं, लेकिन अमिताभ ने यहां एक ऐसे बैंक मैनेजर का रोल निभाया जो बदला लेने के लिए तीन अंधे लोगों से बैंक लूट करवाता है। यह किरदार पूरी तरह नकारात्मक था। वह चालाक था, निर्दयी था और लोगों को मोहरे की तरह इस्तेमाल करता था। लेकिन फिर भी दर्शक उससे नजरें नहीं हटा पाए। इसकी वजह थी अमिताभ की स्क्रीन प्रेजेंस। उन्होंने उस किरदार में ऐसा ठंडा गुस्सा और कंट्रोल दिखाया कि हर सीन में वही सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ते थे।
सरकार जब अपराध में दिखी सत्ता की ताकत
2005 में आई ‘सरकार’ में अमिताभ बच्चन ने सुभाष नागरे का किरदार निभाया। यह रोल सीधे तौर पर अपराधी का नहीं था, लेकिन वह कानून से ऊपर काम करता था। लोग उससे डरते भी थे और न्याय की उम्मीद भी रखते थे। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। सुभाष नागरे ऐसा व्यक्ति था जो अपने तरीके से इंसाफ करता था। वह हत्या भी करवाता है, दुश्मनों को खत्म भी करता है, लेकिन दर्शक फिर भी उसके साथ खड़े दिखाई देते हैं।
यहीं अमिताभ बच्चन की सबसे बड़ी ताकत नजर आती है वह नैतिक रूप से गलत किरदार को भी भावनात्मक रूप से सही बना देते हैं। उनकी शांत आवाज, धीमा संवाद और आंखों से अभिनय करने की कला ने ‘सरकार’ को सिर्फ गैंगस्टर फिल्म नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सत्ता और भय की कहानी बना दिया।
अक्स अमिताभ का सबसे अनोखा डार्क किरदार
2001 में आई ‘अक्स’ शायद अपने समय से बहुत आगे की फिल्म थी। इसमें अमिताभ बच्चन एक ऐसे इंसान के रूप में दिखाई दिए, जिसके अंदर एक खतरनाक अपराधी की आत्मा प्रवेश कर जाती है। यह किरदार मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद जटिल था। कई जगहों पर अमिताभ का व्यवहार डरावना, हिंसक और अस्थिर नजर आता है।
उस दौर में हिंदी सिनेमा में इस तरह के डार्क और साइकोलॉजिकल किरदार कम देखने को मिलते थे। फिल्म भले बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता न रही हो, लेकिन अमिताभ के अभिनय को खूब सराहा गया।
अमिताभ विलेन के किरदार में भी क्यों हुए इतने लोकप्रिय?
सबसे पहली बात तो ये है कि अमिताभ बच्चन की सबसे बड़ी ताकत उनका ऑरा रहा है। जब वह स्क्रीन पर आते हैं, तो दर्शक खुदबखुद उनकी तरफ खिंच जाते हैं। इसलिए चाहे किरदार गलत हो, दर्शक उसे देखना बंद नहीं कर पाते। इसके अलावा बिग बी ने यह साबित किया कि इंसान पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं होता।
उनके किरदारों में भावनाएं, कमजोरी और दर्द होता था। यही उन्हें वास्तविक बनाता था। फिर जहां कई सुपरस्टार अपनी हीरो इमेज बचाने में लगे रहते थे, अमिताभ बच्चन ने लगातार नए प्रयोग किए। उन्होंने उम्र, इमेज और दर्शकों की उम्मीदों से ऊपर जाकर किरदार चुने।
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