क्यों आज की फिल्मों से गायब हो गए हैं वो यादगार डायलॉग, जो कभी जुबां पर चढ़ जाते थे?​

‘कितने आदमी थे’, ‘मोगैम्बो खुश हुआ’, ‘मेरे पास मां है’, इस तरह के सदाबहार डायलॉग सिर्फ उस दौर में बनी फिल्मों में ही हो सकते है। क्योंकि अब तो बॉलीवुड में फिल्में सिनेमाघरों में आकर कब चली जाती है पता ही नहीं चलता तो उनके डायलॉग तो क्या ही याद रहेंगे।

क्यों आज की फिल्मों से गायब हो गए हैं वो यादगार डायलॉग, जो कभी जुबां पर चढ़ जाते थे?​

वैसे अब के समय की भी कुछ फिल्में है जिनके डायलॉग याद रखे गए लेकिन बस मीम्स और सोशल मीडिया तक। बॉलीवुड में पुराने समय की कुछ फिल्में ऐसी है जो आपने भले ही देखी ना हो, उनका नाम ना पता हो लेकिन फिर भी आपको किसी ना किसी डायलॉग से वह याद रहती है।

70, 80 और 90 के दशक की ऐसी कई फिल्में है जिनकी पहचान उनके डायलॉग से की जाती है। शोले, दीवार, दामिनी, कई ऐसी फिल्में इस गिनती में आती है जो हिट होने के साथसाथ, अपने डायलॉगबाजी से भी लोगों पर छाप छोड़ने में कामयाब रहीं है। आज इसी पर बात करेंगे…

पुराने जमाने का ड्रामा‑अंदाज़ डायलॉग

पहले की फिल्म में कैरेक्टर्स को एक खास डायलॉग के साथ पेश किया जाता था। उसमें ड्रामा एड किया जाता था। नैतिकता और इंसानियत को जोड़ा जाता था। लोगों के इमोशन उन कैरेक्टर्स से जुड़ने में आसान होते थे। सरल भाषा का इस्तेमाल होता था। सबसे जरूरी था उन डायलॉग्स को पर्दे पर कैसे उतारा गया है।

फिल्म में भी डायलॉग्स ऐसे बोले जाते थे जैसे किसी नाटक में डिलीवर किए जा रहे है। अब ऐसा नहीं होता है, अब रोजमर्रा की बातचीत वाली भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। छोटे, तेज और कट थ्रू डायलॉग्स लिखे जाते है लेकिन ऐसा नही कि अब के एक्टर्स इन्हें अच्छे से नही उतारते। लेकिन अब कहानी की डिमांड ही वही होती है।

क्या बदल गया फिल्म का लक्ष्य

पहले फिल्मों में एक मैसेज होता था इसलिए उसमें ऐसे डायलॉग्स को रखा जाता था जो याद रह जाए। अपनी बात को याद रखवाने के लिए कहानी को बोल बोलकर सुनाना जरूरी था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब की फिल्मों में डायलॉग्स कैरेक्टर बिल्ड करने के लिए, सोशल मीडिया पर शेयर होने के लिए और फिल्म के कोई एक या दो मोमेंट्स को वायरल बनाने के लिए लिखे जाते है।

ऐसा होता भी है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। लेकिन पुरानी फिल्मों के डायलॉग्स बिना सोशल मीडिया के जमाने के भी लोगों की जुबान पर चढ़ें है।

समाज, मीडिया और परिवार का असर

पुरानी फिल्मों को पहले परिवार के साथ सिनेमाघरों में देखने जाते थे। डायलॉग्स काफी परिवार पसंद हुआ करते थे। जिन्हे परिवार के साथ बैठकर देखा जाता था। परिवार फ्रेंडली और गंभीर डायलॉग्स होने की वजह से भी उन्हें याद रखा जाता था।
आजकल की फिल्में ओटीटी, यूट्यूब, रील्स, मीम, इन सभी पर चलती है। डायलॉग्स ऐसे बनते है कि बस स्क्रीनशॉट या मीम तक ही सिमट कर रह जाते है। तुरंत वायरल होने के लिए उन्हें छोटा और इमेजफ्रेंडली रखा जाता है।

ज्यादा सच्चा कहानी पर आधारित फिल्में

पहले की फिल्मों को काफी फिल्मी तरीके से बनाया जाता था। लेकिन अब कहानियां भी बदल गई है। अब रियल स्टोरीज पर फिल्में ज्यादा बनाई जाती है और इसी वजह से उनमें डायलॉगबाजी को कम रखा जाता है। इंपेक्टफुल कहानी दिखाने के लिए ऐसे डायलॉग नहीं जोड़े जाते।

सदाबहार डायलॉग्स

शोले

सदाबहार डायलॉग्स की बात हो और शोले का नाम ना आए ऐसा नहीं हो सकता। गब्बर का अपने अंदाज में पूछना कि ‘कितने आदमी थे’, तो वहीं वीरू का यादगार डायलॉग ‘बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना’। आज भी लोगों को अच्छे से याद है।

दीवार

‘मेरे पास पैसा है, बंगला है, गाड़ी है, नौकर है, बैंक बैलेंस है, और तुम्हारे पास क्या है?’ इसके जवाब में बस अमिताभ बच्चन के अंदाज में उनका ये कहना कि ‘उनके पास मां है’। इस फिल्म को आज भी यादगार बनाता है।

दामिनी

कोर्टरूम ड्रामा यह फिल्म अपने ‘तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख’ वाले डायलॉग के लिए जानी जाती है। सनी देओल का यह डायलॉग आज भी आइकॉनिक है। सोशल मीडिया पर कई मीम्स में यह डायलॉग इस्तेमाल किया जाता है।

मिस्टर इंडिया

भले ही इस फिल्म के मुख्य किरदार में एक्टर अनिल कपूर नजर आए थे लेकिन इस फिल्म में विलेन अमरीश पुरी का बोला हुआ डायलॉग ‘कितने आदमी थे’ लोगों को काफी पसंद है। यह लाइन आज भी लोगों के जश्न, फनी मैसेज और रील्स में बहुत वायरल रहती है, जब कोई चीज़ अच्छी तरह हो जाती है तो लोग इसे बोल देते हैं।

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