दहेज में मिली, विवादों में घिरी और अब 17 तालों में कैद… सीतापुर की 100 करोड़ की ‘रानी कोठी’ का राज​

Historic Rani Kothi Story: सीतापुर की चर्चित और ऐतिहासिक धरोहर ‘रानी कोठी’ एक बार फिर सुर्खियों में है. करीब 100 करोड़ रुपए मूल्य की इस भव्य इमारत को जिला प्रशासन ने हाल ही में निजी कब्जे से मुक्त कराकर अपने नियंत्रण में ले लिया है. यह कार्रवाई उस नजूल भूमि को लेकर की गई, जिसका पट्टा करीब 100 वर्ष पहले समाप्त हो चुका था. इसके बावजूद वर्षों तक इस संपत्ति पर राजपरिवार से जुड़े लोगों का कब्जा बना रहा. अब प्रशासन इस ऐतिहासिक भवन को समाजोपयोगी कार्यों के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी में है.

दहेज में मिली, विवादों में घिरी और अब 17 तालों में कैद… सीतापुर की 100 करोड़ की ‘रानी कोठी’ का राज​

ब्रिटिश शासनकाल में मिली थी जमीन

सीतापुर शहर के बट्सगंज इलाके के तामसेनगंज क्षेत्र के पास स्थित रानी कोठी का इतिहास ब्रिटिश काल से जुड़ा हुआ है. वर्ष 1906 में ब्रिटिश सरकार ने भूखंड संख्या 1568 को नवीनगर राजपरिवार को 30 वर्षों की लीज पर दिया था. यह जमीन कुंवर निहाल सिंह को उद्यान विकसित करने के उद्देश्य से आवंटित की गई थी.

हालांकि बाद में इस भूमि पर एक आलीशान कोठी का निर्माण कराया गया, जिसे महारानी कुंवरि पृथ्वीपाल के नाम पर ‘रानी कोठी’ कहा जाने लगा. समय के साथ यह भवन क्षेत्र की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल हो गया.

नवीनगर रियासत का गौरवशाली इतिहास

लहरपुर क्षेत्र का नवीनगर गांव अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है. माना जाता है कि इस रियासत की स्थापना मुगल काल में तालुकदार नवी अहमद ने की थी. बाद में कटेसर के राजा प्रताप बहादुर सिंह ने इस क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया. राजपूताना वंश से जुड़े इस परिवार ने नवीनगर स्टेट को विशिष्ट पहचान दिलाई. महारानी कुंवरि पृथ्वीपाल के शासनकाल में मंदिरों, बावड़ियों और कई शाही निर्माण कार्यों के साथ रानी कोठी भी अस्तित्व में आई.

दहेज में मिली थी ‘रानी कोठी’

समय के साथ इस कोठी का संबंध कसमंडा रियासत से भी जुड़ गया. कसमंडा नरेश राजा दिनेश प्रताप सिंह की बहन सविता कुमारी उर्फ आभा रानी का विवाह कटेसर रियासत के राजा जंग बहादुर सिंह के परिवार में हुआ था. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। बताया जाता है कि विवाह के दौरान रानी कोठी और नवीनगर स्टेट उन्हें दहेज स्वरूप दिए गए थे. इसके बाद राजा जवाहर सिंह अपने परिवार के साथ इसी कोठी में रहने लगे और यह राजपरिवार की स्थायी आवासीय संपत्ति बन गई.

वर्षों तक चला कानूनी विवाद

रानी कोठी के स्वामित्व को लेकर लंबे समय तक परिवार के भीतर विवाद चलता रहा. आभा रानी और राजा की दूसरी पत्नी वीरप्रभा के बीच मालिकाना हक को लेकर अदालतों में कानूनी लड़ाई चली. अंततः कोठी का कब्जा वीरप्रभा पक्ष को मिला. हाल के वर्षों में इस संपत्ति पर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल विक्रम शर्मा, मधुलिका त्रिपाठी और राजेंद्र कुमारी का कब्जा बताया गया. मधुलिका त्रिपाठी को कटेसरनवीनगर स्टेट परिवार की कानूनी वारिस माना जाता है.

1936 में खत्म हो गया था पट्टा

जिस नजूल भूमि पर यह कोठी बनी थी, उसका 30 वर्षीय पट्टा वर्ष 1936 में समाप्त हो गया था. नियमों के अनुसार, पट्टा समाप्त होने के बाद यह संपत्ति स्वतः राज्य सरकार की हो गई थी. इसके बावजूद दशकों तक निजी कब्जा बना रहा. प्रशासनिक रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद यह स्पष्ट हुआ कि भूमि पर निजी स्वामित्व का कोई वैध आधार नहीं बचा है.

भारी पुलिस बल के साथ खाली कराई गई कोठी

19 मई 2026 में जिलाधिकारी न्यायालय के आदेश पर जिला प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में रानी कोठी को खाली कराया. कार्रवाई के दौरान परिसर को सरकारी नियंत्रण में लेकर सील कर दिया गया और कोठी में अलगअलग जगहों पर कुल 17 ताले लगाए. यह कार्रवाई पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी रही. स्थानीय लोगों ने इसे प्रशासन की बड़ी उपलब्धि बताया.

अब बनेगा वृद्धाश्रम!

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस ऐतिहासिक भवन में वृद्धाश्रम स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है. यदि प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है तो यह भवन असहाय और जरूरतमंद बुजुर्गों के लिए आश्रय स्थल के रूप में उपयोग किया जाएगा. इस कदम से न केवल ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण होगा, बल्कि इसे सामाजिक कल्याण के लिए भी उपयोग में लाया जा सकेगा.

इतिहास से समाजसेवा तक

एक समय राजपरिवार की शान रही रानी कोठी अब नई भूमिका निभाने जा रही है. करीब एक सदी पुराने इतिहास को समेटे यह भवन आने वाले समय में जरूरतमंद बुजुर्गों के लिए सहारा बन सकता है. प्रशासन की इस पहल को विरासत संरक्षण और जनहित के संतुलित उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है.

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