देश में चीनी के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं. देश के अलगअलग हिस्सों में बीते एक महीने में चीनी की कीमतों में 2024 रुपये प्रति किलो ग्राम तक इजाफा हुआ है. सरकार ने इस संकट से बचने के लिए ब्राजील से चीनी आयात करने का फैसला किया है. उम्मीद की जा रही है कि अक्तूबर के मध्य तक ब्राजील की चीनी भारतीय बंदरगाह तक पहुंच कर बाजारों में पहुंचेगी. तब कीमतों में गिरावट हो सकती है. चीनी के बढ़ते दाम के बीच समझना जरूरी है कि क्या दुनिया में पहली बार चीनी भारत में बनी थी और यहीं से निकलकर फारस होते हुए अरब देशों तक पहुंची? क्या यही सच्चाई? आइए जानते हैं.

चीनी के इतिहास में भारत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. गन्ने से ठोस और दानेदार चीनी बनाने की उन्नत तकनीक भारत में विकसित हुई. भारत में गन्ने की खेती का इतिहास दो से तीन हजार साल पुराना बताया जाता है. गन्ने की शुरुआती प्रजातियां दक्षिणपूर्व एशिया और प्रशांत क्षेत्र में पाई जाती थीं. वहां लोग गन्ने को चबाकर उसका रस लेते थे. धीरेधीरे गन्ने की खेती भारत तक पहुंची. भारत में गन्ने से रस निकालने, उसे उबालने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक विकसित हुई. यहीं से चीनी के इतिहास में बड़ा बदलाव आया.

भारत में चीनी बनाने की शुरुआत

प्राचीन भारत में गन्ने को अलगअलग नामों से जाना जाता था. संस्कृत में गन्ने के लिए इक्षु शब्द मिलता है. चीनी के लिए शर्करा शब्द इस्तेमाल होता था. शर्करा का मूल अर्थ छोटे कण या कंकड़ जैसा भी माना जाता है. बाद में इसी शब्द से कई भाषाओं में चीनी से जुड़े शब्द बने. अंग्रेजी का शुगर भी पुराने भारतीय शब्दों से जुड़ी भाषाई यात्रा का हिस्सा माना जाता है.

गन्ना. फोटो: PTI

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में गन्ने और उसके रस का उल्लेख मिलता है. आयुर्वेद में गन्ने के रस, गुड़ और उससे बने पदार्थों का वर्णन है. इससे पता चलता है कि भारत में गन्ने का उपयोग केवल मिठास के लिए नहीं, बल्कि औषधीय और खाद्य दोनों रूपों में होता था. भारत के किसानों और कारीगरों ने गन्ने की अलगअलग किस्में विकसित कीं. उन्होंने रस को गाढ़ा करने और सुरक्षित रखने के तरीके भी खोजे. इसी प्रक्रिया से गुड़ और खांड जैसे पदार्थ बने.

क्या क्रिस्टल चीनी भारत में बनी?

भारत में गन्ने के रस से क्रिस्टल या दानेदार चीनी बनाने की तकनीक काफी पुरानी है. इसका विकास संभवतः कई शताब्दियों में हुआ. यह किसी एक व्यक्ति या एक दिन का आविष्कार नहीं था. चीनी बनाने की इस प्रक्रिया में रस को उबालना, साफ करना और ठंडा करना शामिल था. इससे चीनी के दाने बनने लगते थे. उस समय की चीनी आज की तरह पूरी तरह सफेद और परिष्कृत नहीं होती थी. फिर भी वह गुड़ से अलग थी. भारत में बनी खांड और शर्करा व्यापार के जरिए दूसरे देशों तक पहुंचने लगी. इस तकनीक ने मिठास को अधिक समय तक सुरक्षित रखना संभव बनाया. यही कारण था कि चीनी एक मूल्यवान व्यापारिक वस्तु बन गई.

गन्ने के रस से क्रिस्टल या दानेदार चीनी बनाने की तकनीक काफी पुरानी है. फोटो: Getty Images

फारस तक कैसे पहुंची चीनी?

भारत और फारस के बीच व्यापारिक संबंध बहुत पुराने थे. दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापारी, यात्री और विद्वान आतेजाते थे. मसाले, कपड़े, औषधियां और कीमती वस्तुओं के साथ गन्ने और चीनी से जुड़ा ज्ञान भी यात्रा करता रहा. छठी और सातवीं शताब्दी के आसपास गन्ने की खेती और चीनी बनाने की तकनीक फारस में पहुंची. कई ऐतिहासिक विवरणों में बताया जाता है कि फारस के शासकों और किसानों ने भारत से गन्ने की किस्में मंगाईं. फारस में इस तकनीक को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया गया. वहां गन्ने की खेती का विस्तार हुआ. चीनी बनाने के लिए नए केंद्र बने. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। भारतीय ज्ञान को फारसी कारीगरों ने आगे विकसित किया. यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तकनीक का स्थानांतरण एक ही घटना से नहीं हुआ. व्यापार, युद्ध, यात्राओं और सांस्कृतिक संपर्कों ने मिलकर इसमें भूमिका निभाई.

अरब दुनिया तक चीनी कैसे पहुंची?

सातवीं शताब्दी में अरबों का फारस से संपर्क बढ़ा. इसके बाद चीनी बनाने की तकनीक अरब क्षेत्रों तक पहुंची. अरब किसानों और कारीगरों ने गन्ने की खेती को इराक, सीरिया, मिस्र और उत्तरी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में फैलाया. अरब विद्वानों ने कृषि और सिंचाई पर भी काम किया. उन्होंने गन्ने के लिए उपयुक्त क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था की. कई जगहों पर नहरें बनाई गईं. इससे गन्ने की खेती का विस्तार हुआ.

चीनी बनाने के कारखाने या छोटे उत्पादन केंद्र भी विकसित हुए. गन्ने से रस निकालना, उसे उबालना और क्रिस्टल बनाना अधिक व्यवस्थित हुआ. अरब व्यापारियों के कारण चीनी भूमध्यसागर के कई हिस्सों तक पहुंची. बाद में यह यूरोप के कुछ क्षेत्रों में भी पहुंची. हालांकि, लंबे समय तक चीनी आम लोगों की वस्तु नहीं थी. यह महंगी और दुर्लभ चीज मानी जाती थी.

फिर यूरोप में हुआ चीनी का प्रवेश

अरब दुनिया के जरिए चीनी यूरोप तक पहुंची. भूमध्यसागरीय व्यापार में इसका महत्व बढ़ा. कुछ यूरोपीय क्षेत्रों में गन्ने की खेती शुरू की गई. बाद में औपनिवेशिक दौर में चीनी का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा. यूरोप में चीनी पहले राजघरानों और अमीर लोगों तक सीमित थी. इसका उपयोग मिठाइयों, औषधियों और भोज में किया जाता था. समय के साथ व्यापार बढ़ा. उत्पादन बढ़ा. फिर चीनी धीरेधीरे आम लोगों के भोजन का हिस्सा बन गई. यहां से चीनी का इतिहास केवल तकनीक का इतिहास नहीं रहा. यह व्यापार, उपनिवेशवाद, श्रम और वैश्विक अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गया.

चीनी नाम का क्या अर्थ है?

भारत में चीनी के लिए शर्करा और शक्कर जैसे शब्द प्रचलित थे. फारसी और अरबी में इसके रूप बदले. यूरोपीय भाषाओं में भी इन शब्दों का प्रभाव दिखाई देता है. हिंदी में चीनी शब्द को लेकर एक आम भ्रम है. कुछ लोग मानते हैं कि इसका अर्थ है कि चीनी का आविष्कार चीन में हुआ था. ऐसा निष्कर्ष सही नहीं है. चीनी शब्द का संबंध चीन से जुड़ी व्यापारिक पहचान से हो सकता है. भारत में दानेदार चीनी का उत्पादन पुराना था. चीन में भी गन्ने और मिठास से जुड़ी परंपराएं थीं. लेकिन केवल नाम के आधार पर आविष्कार का स्थान तय नहीं किया जा सकता.

दावे में कितनी सच्चाई है?

क्या भारत में पहली बार चीनी बनी और फिर फारस होते हुए अरब पहुंची? इस कथन में एक बड़ा सच छिपा है. भारत ने गन्ने से दानेदार चीनी बनाने की तकनीक विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह ज्ञान व्यापार और सांस्कृतिक संपर्कों के माध्यम से फारस पहुंचा. वहां से अरब दुनिया में गया. अरबों ने इसे बड़े क्षेत्र में फैलाया और उत्पादन को अधिक व्यवस्थित किया.

गन्ने की शुरुआती उत्पत्ति भारत से बाहर के क्षेत्रों से जुड़ी मानी जाती है. अलगअलग सभ्यताओं में गन्ने के रस और गुड़ जैसे पदार्थों का इस्तेमाल भी होता था. इसलिए सही बात यह होगी कि भारत ने गन्ने की खेती और चीनी बनाने की तकनीक के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई. भारत से यह तकनीक फारस और फिर अरब क्षेत्रों तक पहुंची. अरब दुनिया ने इसे आगे बढ़ाया और भूमध्यसागर के रास्ते यूरोप तक पहुंचाने में मदद की.

चीनी गन्ने से तैयार होती है और उत्तर प्रदेश इसके प्रोडक्शन में आगे है.

चीनी का इतिहास किसी एक देश की बंद कहानी नहीं है. इसमें कई क्षेत्रों का योगदान रहा है. गन्ने की शुरुआती यात्रा दक्षिणपूर्व एशिया से जुड़ी थी. भारत ने गन्ने के रस को गुड़, खांड और दानेदार चीनी में बदलने की तकनीक को विकसित किया. फारस ने इस ज्ञान को अपनाया. अरब दुनिया ने इसे फैलाया और उत्पादन को व्यवस्थित किया. बाद में यह यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुंची. इसलिए सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि भारत चीनी बनाने की उन्नत तकनीक का एक प्रमुख जन्मस्थल है.