नोएडा में प्रॉपर्टी का गजब खेल! फ्लैट का दाम 1 करोड़…देने पड़ रहे 2.25 करोड़; समझ‍िए खेला!


Realestate News: जरा सोच‍िए…आप नौकरी के कारण द‍िल्‍ली-एनसीआर में रहते हैं. आप यहां पर एक सुंदर सा आश‍ियाना बनाने का सपना देख रहे हैं या अपना अपना घर ले ल‍िया है. यह आर्ट‍िकल ऐसे दोनों लोगों के लि‍ए है. बात नोएडा के प्रॉपर्टी मार्केट की करें तो आपको एक करोड़ रुपये में एक बेस‍िक घर म‍िल जाएगा. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। काफी तलाश करने के बाद आपने अपनी के ह‍िसाब से फ्लैट बुक करा द‍िया…यही आपको लगता है, आख‍िरकार घर म‍िल गया. सीए न‍ित‍िन कौश‍िक ने अपने एक्‍स (X) अकाउंट पर ल‍िखा क‍ि असली खेल आपके डॉक्‍यूमेंट साइन करने के बाद शुरू हो जाता है.

बैंक और बिल्डर के फंदे में फंस रहे हैं आप…
वह ल‍िखते हैं, यह कोई घर नहीं…बल्कि एक वित्तीय जाल है, जो खरीदार की मजबूरी को चुपके से निचोड़ता जा रहा है. रियल एस्टेट सेक्टर में यही खेल चल रहा है. बाहर से आपको कीमत भले ही आकर्षक लगे लेक‍िन अंदर से बैंक और बिल्डर का डबल फंदा. अगर आप भी घर खरीदने का प्‍लान कर रहे हैं तो केवल एक करोड़ रुपये का ल‍िस्‍ट प्राइस सुनकर खुश मत होइए. इसके बाद भी आपको कई तरह के भुगतान करने होते हैं. और ये सब छोटी रकम नहीं होती…इनका ह‍िसाब में लाखों में बैठता है.

एक करोड़ के बाद देना होता है यह चार्ज
एक करोड़ रुपये के ऊपर आपको 7% स्‍टैंप ड्यूटी, 1% ब्रोकरेज और 20 लाख रुपये का बेसिक इंटीरियर भी करना होता है. पार्किंग और क्लब चार्ज जोड़ते ही आपकी लागत 1.3 करोड़ रुपये या इससे भी ऊपर हो जाती है. यानी घर में कदम रखने से पहले ही आपकी जेब के 30 लाख रुपये हल्‍के हो गए. लेकिन आप पर असली चोट पड़ती है लोन की. मान लीजिए आपने 80 लाख रुपये का होम लोन 9% ब्याज पर 20 साल के लिए ल‍िया.

ब्याज में ही चला जाएगा 92 लाख रुपये
इसकी ईएमआई (EMI) चुकाते-चुकाते आप बैंक को केवल ब्याज के रूप में ही 92 लाख रुपये एक्‍स्‍ट्रा भुगतान कर देंगे. कुल मिलाकर आपके ऊपर 2.2 करोड़ रुपये का बोझ. यह एक फ्लैट, जिसकी असली कीमत आपकी जिंदगीभर की कमाई से ज्यादा हो जाती है. फ्लैट बायर की मजबूरी यहीं से शुरू होती है. दिल्ली-एनसीआर में अच्छी स्कूलिंग, मेट्रो कनेक्टिविटी और जॉब सिक्योरिटी के चक्‍कर में लोग मजबूरन प्रॉपर्टी खरीदते हैं.

असली कैलकुलेशन कुछ और ही…
अध‍िकतर पर‍िवारों का यही कहना होता है ‘घर तो चाहिए ना?’ सोसाइटी में स्टेटस का दबाव, रेंट पर पैसे बर्बाद करने का डर-सब कुछ बिल्डर के फेवर में काम करता है. लेकिन इसकी असली कैलकुलेशन कुछ और ही कहती है. न‍ित‍िन कौश‍िक ल‍िखते हैं…आपके डाउन पेमेंट पर 12% की सालाना ऑपर्चुनिटी कॉस्ट (इंडेक्स फंड में र‍िटर्न) और हर साल बढ़ते मेंटेनेंस चार्ज को जोड़े तो प्रॉपर्टी को ब्रेक-ईवन करने के लिए हर साल कम से कम 15-20 फीसदी का अप्रिशिएशन चाहिए, जो क‍ि मुश्किल ही होता है.

जीत केवल बैंक और बिल्डर की हो रही
रियल एस्टेट के खेल में यही चालाकी होती है. बिल्डर कम दाम का लालच देकर प्रॉपर्टी सेल करता है, बैंक लंबे टेन्‍योर वाले लोन पर जमकर ब्‍याज वसूलते हैं और खरीदार की तरफ से सालों तक इसका रीपेमेंट क‍िया जाता है. वह ‘घर’ का सपना देखकर फंस जाता है. दिल्ली-एनसीआर में यह लाइफस्टाइल च्‍वाइस इन्वेस्टमेंट का रूप धारण कर लेती है. लेकिन इसमें जीत केवल बैंक और बिल्डर की होती है और खरीदार मजबूर है क्योंकि उसके पास ऑप्‍शन कम हैं. रेंट बढ़ रहा है, परिवार बढ़ रहा है और ‘अपना घर’ आपको इमोशनल रूप से जोड़े रखता है.

अंत में सच्चाई यही है क‍ि आज का एक करोड़ रुपये का फ्लैट कल 2.2 करोड़ रुपये का हो जाता है. खरीदार की मजबूरी के आगे ये सेक्‍टर फल-फूल रहा है. इसलिए आप अगली बार जब भी प्रॉपर्टी खरीदे तो केवल लिस्ट प्राइस नहीं बल्‍क‍ि पूरी कैलकुलशन को देख‍िए.

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