1857 की क्रांति को कुचलने के बाद भी अंग्रेज नहीं थमे. बख़ूबी वाक़िफ़ थे कि लंबे समय तक भारत में अपनी हुकूमत कायम रखने के लिए उन्हें ढाल के तौर स्थानीय आबादी के बीच अपनी हिमायत में जुटने वालों का एक मजबूत वर्ग खड़ा करना होगा. इसके लिए उन्होंने तमाम देसी राजाओंताल्लुकदारों की जब्त रियासतेंजागीरें वापस कर दीं. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। जमींदारों को मजबूती दी. हिंदूमुस्लिमों की एक जुटता ने 1857 में उनकी चूलें हिला दी थीं. इस एकता को तोड़ना उन्हें सबसे जरूरी लगा. इसमें वक्त भी ज्यादा नहीं लगा.

उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में इसके सुर कांग्रेस गठन के साथ ही सुनाई पड़ने लगे, जब सर सैयद अहमद खान ने 28 दिसम्बर 1887 को एक जनसभा में कांग्रेस की सेंट्रल असेम्बली और प्रांतीय परिषद में प्रतिनिधित्व की मांग को मुसलमान विरोधी बताया. कहा कि इनमें केवल हिंदुओं को ही प्रतिनिधित्व मिलेगा.
यह पहला मौका था,जब “मुसलमान अलग लोग और एक अलग राष्ट्र” का खाका उनके जरिये पेश हुआ. मुसलमानों को उन्होंने सचेत किया,”कांग्रेस का समर्थन करने पर उन्हें भारी तबाही झेलनी होगी.” उधर बदरुद्दीन तैयब जी ने ए.ओ.ह्यूम को लिखा कि कांग्रेस के अधिवेशन को पांच साल के लिए निलंबित कर देना चाहिए, क्योंकि इसकी गतिविधियों ने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच अत्याधिक वैमनस्य पैदा कर दिया है और अगर पांच वर्षों बाद भी रिश्ते न सुधरें तो कांग्रेस को समाप्त कर देना चाहिए.” भारत विभाजन 1906 में वजूद में आई मुस्लिम लीग की देन माना जाता है , लेकिन उसकी जमीन की तैयारी तो उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों में ही शुरू कर दी गई थी. इतिहास के पन्नों से पढ़िए उसकी अंतर्कथा.
अहमद की नज़र में कांग्रेस राजद्रोही!
1885 में कांग्रेस का गठन हुआ. बम्बई के उसके पहले अधिवेशन में कुल 72 डेलीगेट शामिल हुए. इनमें मुसलमान दो थे. 1886 के कलकत्ता के दूसरे अधिवेशन के कुल 431 डेलीगेट्स में मुसलमानों की तादाद 33 थी. लेकिन 1890 के छठवें अधिवेशन तक हालात काफी बदल चुके थे. मुसलमान तेजी से कांग्रेस से जुड़ रहे थे. उस अधिवेशन के कुल 702 डेलीगेट्स में 156 मुस्लिम थे.
सर सैयद अहमद खान
कांग्रेस के तीसरे मद्रास अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयब जी द्वारा किए जाने से मुसलमानों का कांग्रेस के प्रति रुझान लगातार बढ़ा. लेकिन इधर कांग्रेस से मुसलमान तेजी से जुड़ रहे थे, तो दूसरी ओर उनके बीच के तमाम अंग्रेज समर्थक ऊंचे तबके के लोगों को जिनकी अगुवाई सर सैयद अहमद कर रहे थे, उन्हें इससे ऐतराज था. अहमद ने कांग्रेस को राजद्रोही करार देकर उसकी खुली आलोचना की. कांग्रेस की मजबूती का मतलब हिंदुओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने का उन्होंने मुस्लिमों को डर दिखाया.
मुस्लिम हितों के लिए अंग्रेजों का साथ जरूरी ?
अशराफ तबके के सर सैयद अहमद खान 1857 के दौर में दिल्ली, आगरा,फतेहपुर सीकरी में ईस्ट इंडिया कंपनी की मुलाजमत में रहे. बिजनौर की तैनाती में जिले और अंग्रेजों को बागियों से बचाने की कामयाबी ने उन्हें ब्रिटिश हुकूमत का और खास बना दिया. अंग्रेजों के लिए उनकी वफ़ादारी आगे भी कायम रही. अपनी किताब ” असबाबएबगावतएहिंद” में उन्होंने 1857 के विद्रोह की वजहों पर विस्तार से लिखा. उनको भरोसा था कि मुसलमानों की तरक्की आधुनिक शिक्षा के साथ ही अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग और उसके संरक्षण में ही मुमकिन है.
1885 में जब कांग्रेस की स्थापना हुई, तो सर सैयद ने उसका खुलकर विरोध किया. उनकी दलील थी कि भारत एक राष्ट्र नहीं, बल्कि अनेक समुदायों का देश है; इसलिए प्रतिनिधि शासन में मुसलमान बहुसंख्यक हिंदुओं के अधीन हो जाएंगे.
सर सैयद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने की अपील की थी.
मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह
27 दिसंबर 1887 को लखनऊ में एक सार्वजनिक भाषण में सर सैयद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह दी. कांग्रेस की रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट की मांग को उन्होंने भारत जैसे बहुजातीय समाज के लिए अनुचित बताया और दावा किया कि इससे बहुसंख्यक हिंदुओं का प्रभुत्व स्थापित हो जाएगा. उनके लखनऊ और मेरठ के भाषण 1888 में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुए, जिसका शीर्षक था The Seditious Character of the Indian National Congress इसमें कांग्रेस को ब्रिटिश शासन के लिए खतरनाक, अनुचित और मुसलमानों के हितों के विरुद्ध बताया गया.
पुस्तिका में सर सैयद के कांग्रेसविरोधी तर्कों को प्रमुखता से शामिल किया गया. कुल मकसद यह साबित करना था कि कांग्रेस का आंदोलन ब्रिटिश सरकार के प्रति “राजद्रोही” प्रकृति का है और यह शासन व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है. मुसलमानों से खासतौर से कांग्रेस से दूर रहने की इसमें अपील की गई थी. असलियत में सर सैयद उस ब्रिटिश सोच को प्रोत्साहित कर रहे थे, जो हिंदुओंमुसलमानों की एकता के स्थान पर दोनों की पृथक पहचान और दूरी को भारत पर लंबे समय तक शासन करने के लिए जरूरी मानती थी.
बदरुद्दीन तैयब जी से क्यों हुए नाराज?
सर सैयद की अगुवाई में चल रहा कांग्रेस का विरोध कितना प्रबल था, यह कांग्रेस के 1887 के मद्रास अधिवेशन के बाद देखने में आया. इसकी अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयब जी ने की थी. उन्हें इसके चलते सर अहमद खान और उनके समर्थकों की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा. तैयबजी ने उन्हें लिख कर सफाई दी कि अपने अध्यक्षीय भाषण में मैंने भारत को एक राष्ट्र के रुप में स्वीकार नही किया. यह भी भरोसा दिया कि कांग्रेस ऐसे किसी मुद्दे पर विचारविमर्श नही करेगी जिसका मुसलमान विरोध करते हों. तैयबजी फिर भी अपने मजहब के नाराज तबके को संतुष्ट नही कर सके.
इसके बाद तैयबजी ने कांग्रेस के सचिव ए. ओ.ह्यूम को एक पत्र लिखा जिसमें कांग्रेस के अधिवेशनों के कारण हिंदू मुसलमानों के बीच बढ़ती दूरियों और इनसे बचने के लिए प्रतिवर्ष के स्थान पर पांच साल में कांग्रेस अधिवेशन करने और फिर भी हालत न सुधरे तो कांग्रेस को भंग करने तक की सलाह दी गई थी.
बदरुद्दीन तैयबजी.
निराश बदरुद्दीन का ह्यूम को पत्र
कांग्रेस का चौथा अधिवेशन दिसंबर 1888 को इलाहाबाद में आयोजित था. उसके कुछ दिन पहले 27अक्टूबर 1888 को बदरुद्दीन तैयबजी ने ए. ओ. ह्यूम को पत्र लिखा, जिसमें अधिकांश मुसलमानों को कांग्रेस के ख़िलाफ़ बताया गया था. उन्होंने लिखा, “निःसंदेह आप मुसलमानों की गतिविधियां देखते आ रहे हैं, लेकिन फिर भी उनकी भावनाओं से उतने बेहतर तरीके से अवगत नही होंगे, जितना कि मैं. साथ ही इस मुद्दे पर विभिन्न समुदाय के उन विद्वान सदस्यों से जो कांग्रेस के पक्ष में हैं, विचारविमर्श करता रहा हूं. इसलिये जो मैं लिख रहा हूं, उसे केवल मेरा या बम्बई के अन्य मुसलमानों का ही नही बल्कि मेहता और तैलंग जैसे लोगों का भी विचार समझा जाये.
हम सभी लोगों का यह विचार है कि मुसलमानों की विशेष रुप से विरोधी प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए जो दिनप्रतिदिन ज्यादा मुखर और स्पष्ट होती जा रही है,कांग्रेस के मित्रों, प्रोत्साहकों और समर्थकों के लिए जरूरी है कि वे इस समय अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करें. साथ ही यह भी देखें कि कि वर्तमान परिस्थितियों में हर साल कांग्रेस की बैठकें आयोजित करना बुद्धिमानी होगी कि नही? मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि हर साल इस आंदोलन के कारण जो मतभेद और कटुताये पैदा होती हैं, वे इसके लाभों पर भारी पड़ जाती हैं. कांग्रेस का लक्ष्य सबको साथ लेकर चलने का है, लेकिन आज मुसलमान हिंदुओं से इतना दूर हो गए हैं, जितना कभी नही थे.
हिंदूमुस्लिम रिश्ते न सुधरें तो कांग्रेस को कर दें खत्म, तैयबजी की सलाह
तैयब जी ने आगे लिखा, “मैं यह मान भी लेता हूं कि ये सभी लोग गलत हैं और हम सही हैं लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि मुसलमानों का एक बड़ा बहुमत इस आंदोलन के खिलाफ है. इस सामूहिकता के विरुद्ध यह कहना निरर्थक होगा कि बौद्धिक और शिक्षित मुसलमान कांग्रेस के साथ है. अब अगर मुसलमान समुदाय पूरी तरह से कांग्रेस के खिलाफ है, तो इससे फर्क नही पड़ता कि वे सही हैं या गलत, लेकिन इससे स्वतः ही यह आंदोलन एक आम और राष्ट्रीय कांग्रेस होने का अपना अधिकार खो देता है. मैं देख रहा हूं कि हिंदुओं और मुसलमानों में कडुवाहट बढ़ रही है, जिसके अत्यन्त भयंकर परिणाम हो सकते हैं.
अपने सामर्थ्य के हिसाब से सावधानी से विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि कांग्रेस के हर साल होने वाले अधिवेशनों को रोक देने का समय आ गया है. मैं चाहूंगा कि कांग्रेस का इलाहाबाद अधिवेशन अधिक से अधिक सफल हो. मुस्लिमों का भी इसमें अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व हो. इसके बाद पांच सालों के लिए कांग्रेस को स्थगित कर दिया जाए. इससे पूरी स्थिति पर विचार करने का मौका मिल जाएगा. साथ ही अपने कार्यक्रम के क्रियान्वयन का भी, जो कि काफी विस्तृत हो चुका है. यदि पांच साल के बाद सम्भावनाओं में सुधार हुआ तो हम अपनी कांग्रेस का नवीनीकरण कर सकते हैं. यदि नही तो यह ध्यान में रखते हुए कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए और विभिन्न जातियों को एकात्म करने लिए हमने भरपूर प्रयास किये, हम इसे गरिमा के साथ खत्म कर देंगे.”
कांग्रेस सभी भारतीयों की, ह्यूम ने कहा न हों निराश
5 नवम्बर 1888 को ए. ओ. ह्यूम ने बदरुद्दीन तैयबजी को लिखे जवाब में उनकी आशंकाओं को खारिज किया , “आप मुसलमानों के कांग्रेसविरोध को जितना व्यापक मान रहे हैं, वास्तविक स्थिति वैसी नहीं है. अवध और उत्तरपश्चिमी प्रांतों में हमारे साथ रहने वाले मुसलमान, विरोधियों की अपेक्षा कहीं अधिक हैं. पंजाब में कांग्रेस का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है और सर सैयद अहमद का प्रभाव घट रहा है. मुझे विश्वास है कि अगले दोतीन वर्षों में अधिकांश मौलवी भी हमारे साथ होंगे. इसलिए वर्तमान विरोध से निराश होने का कोई कारण नहीं है. कांग्रेस का कार्य रुकना नहीं चाहिए. समय के साथ सत्य और न्याय की भावना लोगों को उसकी ओर आकर्षित करेगी.”
ह्यूम ने तैयब जी को निराश न होने की सलाह देते हुए लिखा कि यदि कुछ प्रभावशाली मुस्लिम नेता कांग्रेस के विरोधी हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा मुस्लिम समाज कांग्रेस के विरुद्ध है. जोर दिया कि कांग्रेस किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि सभी भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था है. यदि किसी एक वर्ग के लोग कांग्रेस से दूर रहते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस को अपना कार्य बंद कर देना चाहिए. जो लोग साथ आना चाहें, उनके साथ आगे बढ़ना चाहिए. भरोसा जताया कि समय के साथ मुसलमानों का भी बड़ा भाग कांग्रेस से जरूर जुड़ेगा.



