
किडनी हमारे शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जिसका मुख्य काम खून को साफ करना और शरीर से गंदे पदार्थों को पेशाब के जरिए बाहर निकालना होता है। किडनी एक जटिल फिल्टर की तरह काम करती है, जिसमें लाखों सूक्ष्म नलिकाएं होती हैं जिन्हें नेफ्रॉन कहा जाता है।
ये नलिकाएं लगातार खून को फिल्टर करती रहती हैं और शरीर के लिए जरूरी तत्वों को वापस खून में पहुंचा देती हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति की किडनी दिनभर में लगभग 1500 लीटर खून को फिल्टर करने का काम करती है।
इसके अलावा किडनी शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने, सोडियम, पोटेशियम और कैल्शियम जैसे तत्वों को नियंत्रित करने तथा हार्मोन के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
किडनी का काम केवल खून को साफ करना ही नहीं है, बल्कि यह शरीर में खून बनाने की प्रक्रिया में भी मदद करती है। किडनी में बनने वाला एक हार्मोन इरिथ्रोपोइटिन बोन मैरो को खून बनाने के लिए प्रेरित करता है। अगर किडनी ठीक तरह से काम नहीं करती तो शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया की समस्या भी हो सकती है। इसलिए किडनी का स्वस्थ रहना शरीर के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।
जब किसी बीमारी के कारण किडनी अपना सामान्य काम ठीक तरह से नहीं कर पाती तो इस स्थिति को किडनी फेल्योर कहा जाता है। किडनी की कार्यक्षमता कम होने का पता आमतौर पर खून की जांच से लगाया जाता है। खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा बढ़ने से यह संकेत मिलता है कि किडनी सही तरीके से काम नहीं कर रही है। हालांकि किडनी में काफी अतिरिक्त क्षमता होती है, इसलिए शुरुआती नुकसान के समय खून की जांच में ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता। लेकिन जब किडनी 50 प्रतिशत से अधिक खराब हो जाती है तब जांच में इसकी स्पष्ट जानकारी मिलने लगती है।
किडनी फेल्योर मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है, जिनमें एक्यूट किडनी फेल्योर और क्रोनिक किडनी फेल्योर शामिल हैं। एक्यूट किडनी फेल्योर अचानक होने वाली समस्या है जिसमें कुछ समय के लिए किडनी का काम प्रभावित हो जाता है। अगर समय पर सही इलाज मिल जाए तो किडनी फिर से सामान्य रूप से काम करने लगती है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। दूसरी ओर क्रोनिक किडनी फेल्योर एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, जिसमें महीनों या वर्षों के दौरान किडनी की कार्यक्षमता कम होती जाती है। गंभीर स्थिति में मरीज को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत भी पड़ सकती है।
किडनी से जुड़ी एक और बीमारी नेफ्रोटिक सिंड्रोम है, जो खासतौर पर बच्चों में ज्यादा देखी जाती है। इस बीमारी में पेशाब के जरिए शरीर से ज्यादा मात्रा में प्रोटीन निकलने लगता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की कमी हो जाती है। इसके कारण चेहरे, आंखों के नीचे और शरीर के अन्य हिस्सों में सूजन आने लगती है। कई बार सुबह उठते समय आंखों के आसपास सूजन ज्यादा दिखाई देती है, जो दिन बढ़ने के साथ कम हो जाती है। कुछ मामलों में पेशाब में झाग आने या शरीर का वजन अचानक बढ़ने जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
नेफ्रोटिक सिंड्रोम के कारणों के बारे में पूरी तरह स्पष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन माना जाता है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी होने के कारण यह समस्या हो सकती है। कई बार संक्रमण, कुछ दवाइयों के दुष्प्रभाव, मधुमेह या अन्य बीमारियों के कारण भी यह समस्या विकसित हो सकती है। इस बीमारी की पुष्टि के लिए डॉक्टर पेशाब की जांच, खून की जांच, अल्ट्रासाउंड और जरूरत पड़ने पर किडनी बायोप्सी जैसी जांच कराने की सलाह देते हैं।
किडनी की बीमारी से बचने के लिए जीवनशैली और खानपान पर विशेष ध्यान देना बहुत जरूरी होता है। ज्यादा नमक का सेवन कम करना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रित रखना तथा डॉक्टर की सलाह के बिना दवाइयों का सेवन न करना बेहद जरूरी है। अगर शरीर में सूजन, पेशाब में बदलाव, अत्यधिक थकान या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए। समय पर जांच और सही उपचार से किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है।





