Ram Mandir Donation Scam: राम मंदिर में चढ़ावे की रकम में चोरी का मामला लगातार नए खुलासे कर रहा है। अब सामने आई जानकारी के अनुसार, पुलिस को इस मामले की भनक शुरुआत से ही थी। आरोप है कि ट्रस्ट पदाधिकारियों के साथ मिलकर पुलिस चोरी की रकम बरामद कराने में जुटी थी, लेकिन मामला दर्ज कराने में देरी की गई।

अयोध्या में चल रही एसआईटी जांच की अवधि बढ़ा दी गई है। अब विशेष जांच दल को अपनी जांच पूरी करने के लिए 15 जुलाई तक का समय दिया गया है। इसके साथ ही जांच का दायरा भी बढ़ाया जाएगा, ताकि मामले से जुड़े सभी पहलुओं की गहराई से पड़ताल की जा सके।
राम मंदिर चढ़ावे मामले में वाराणसी से जुड़ा कनेक्शन
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गबन मामले की जांच में अब वाराणसी कनेक्शन भी सामने आया है। जांच के दौरान सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज के छह कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है। ये सभी कर्मचारी राम मंदिर में चढ़ावे की राशि गिनने के काम में लगे हुए थे। जांच में सामने आया है कि हाउसकीपिंग और अन्य कार्यों के लिए एजेंसी ने 22 कर्मचारियों को अयोध्या भेजा था। आरोप है कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति बिना पुलिस सत्यापन के की गई थी। सूत्रों के अनुसार, इन 22 कर्मचारियों के नाम अयोध्या स्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के तत्कालीन मुख्य प्रबंधक की सिफारिश पर एजेंसी को भेजे गए थे।
मामले की जांच कर रही एसआईटी एजेंसी के सुपरवाइजर से भी पूछताछ कर चुकी है। वहीं एजेंसी के मालिक से जब इस मामले में सवाल पूछे गए तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि कर्मचारियों की नियुक्ति प्रक्रिया में कहीं कोई अनियमितता या मिलीभगत तो नहीं हुई। गौरतलब है कि 26 साल पुरानी सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज अब इस हाईप्रोफाइल मामले की जांच के दायरे में है और एसआईटी पूरे घटनाक्रम की गहराई से पड़ताल कर रही है।
CCTV फुटेज से उठे नए सवाल
हाल ही में सामने आए एक CCTV फुटेज में पुलिसकर्मी एक आरोपी अविनाश शुक्ला को कार में बैठाते दिखाई दे रहे हैं। फुटेज में एक काला बैग भी नजर आ रहा है, जिसमें कथित तौर पर बरामद की गई नकदी होने की बात कही जा रही है। यह फुटेज 5 जून का बताया जा रहा है। इससे सवाल उठ रहे हैं कि जब पुलिस को पहले से घटना की जानकारी थी, तो तत्काल एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई?
मीडिया में खबर आने के बाद दर्ज हुई एफआईआर
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला 6 जून को मीडिया में सामने आया था। मामला सुर्खियों में आने और ट्रस्ट पर सवाल उठने के बाद एसआईटी जांच की मांग हुई। शुरुआती जांच के बाद 23 जून को एफआईआर दर्ज की गई। इससे पहले तक पुलिस अधिकारियों का कहना था कि उन्हें कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी, इसलिए पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी।
ट्रस्ट पर मामला दबाने की कोशिश के आरोप
सूत्रों के मुताबिक, ट्रस्ट से जुड़े कुछ पदाधिकारी पहले चोरी की रकम बरामद कर मामला शांत करना चाहते थे। इसी वजह से शुरुआत में पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई गई। आरोप है कि ट्रस्ट के पदाधिकारी खुद जांच में सक्रिय रहे और पुलिस भी उनके साथ समन्वय बनाकर काम करती रही।
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पूछताछ को लेकर भी उठे सवाल
सूत्रों का दावा है कि ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों की पहुंच ऊंचे स्तर तक होने के कारण पुलिस पूछताछ के दौरान भी पूरी सख्ती नहीं दिखा सकी। बताया जा रहा है कि औपचारिक पूछताछ की बजाय केवल बयान दर्ज किए गए। अब इस मामले में यह देखना अहम होगा कि जांच एजेंसियां बड़े जिम्मेदार लोगों तक पहुंच पाती हैं या नहीं।
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