
Kalawa Benefits: हिंदू धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य, पूजा-अनुष्ठान या संकल्प के समय कलाई पर कलावा बांधने की परंपरा सदियों पुरानी है. इसे मौली या रक्षा सूत्र भी कहा जाता है. मान्यता है कि कलावा बांधने से त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और तीनों देवियों (लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती) की कृपा प्राप्त होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे बांधने और उतारने के कुछ कड़े नियम हैं, जिनका पालन न करने पर इसके शुभ प्रभाव में कमी आ सकती है? दरअसल, शास्त्रों के मुताबिक, कलावा पहनने और उतारने के लिए विशेष नियमों का पालन करना जरूरी है. अगर, कलावा पहनने और उतारने के लिए विशेष नियम का पालन नहीं किया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि कलावा उतारते वक्त कौन-कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए और इससे जुड़े खास नियम कौन-कौन से हैं.
कलावा बांधने का सही तरीका
शास्त्रों के अनुसार, कलावा बांधते समय व्यक्ति की स्थिति और लिंग का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. ऐसे में पुरुष और अविवाहित कन्याओं हमेशा पने दाहिने हाथ की कलाई पर रक्षा सूत्र बंधवाना चाहिए. जबकि, विवाहित महिलाओं को बाएं हाथ की कलाई पर कलावा बांधना शुभ माना गया है. वहीं, कलावा बंधवाते समय आपकी मुट्ठी बंद होनी चाहिए और उसमें कुछ दक्षिणा या अक्षत होने चाहिए. साथ ही, कलावा बंधवाते वक्त अपना दूसरा हाथ सिर पर रखना चाहिए.
कलावा में कितने फेरे हैं जरूरी?
कलावा को कलाई पर लपेटते समय इसकी संख्या का विशेष ध्यान रखा जाता है. आमतौर पर इसे 3, 5 या 7 बार लपेटना शुभ माना गया है. तीन बार लपेटना त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है, जो जातक की रक्षा करते हैं.
कलावा उतारने के नियम और सही समय
अक्सर लोग कलावा काफी समय तक पहने रहते हैं, लेकिन जब इसका रंग फीका पड़ जाए या यह गंदा हो जाए, तो इसे बदल लेना चाहिए. कलावा उतारने या बदलने के लिए मंगलवार या शनिवार का दिन सबसे उत्तम माना गया है. परिवार में किसी के जन्म (सूतक) या मृत्यु (पातक) के समय कलावा उतार देना चाहिए, क्योंकि धार्मिक दृष्टि से उस समय शरीर की अवस्था अशुद्ध मानी जाती है. ग्रहण या अमावस्या के समय भी इसे उतारना वर्जित है.
उतारने के बाद क्या करें?
रक्षा सूत्र को उतारने के बाद उसे कभी भी कचरे में या अपवित्र स्थान पर नहीं फेंकना चाहिए. ऐसा करना सुरक्षा कवच का अपमान माना जाता है. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। पुराने कलावे को किसी पवित्र नदी या बहते जल में प्रवाहित कर देना चाहिए. अगर जल उपलब्ध न हो, तो इसे किसी पीपल या बरगद के पेड़ की जड़ के पास रख दें या मिट्टी में दबा देना चाहिए.




