बेंगलुरु की एक अदालत ने अभिनेता और राजनीतिक रूप से सक्रिय सार्वजनिक हस्ती प्रकाश राज के खिलाफ एक बार फिर गैरजमानती वारंट जारी किया है। यह कार्रवाई उस मामले में हुई है, जिसमें उन पर अलगअलग राज्यों की मतदाता सूचियों में एक साथ नाम दर्ज होने और चुनावी नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं। यह मामला लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया में है और अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है।

मामले के अनुसार, आरोप है कि प्रकाश राज का नाम चार अलगअलग मतदाता सूचियों में दर्ज है, जो तीन राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना से संबंधित बताए जाते हैं। कुछ प्रारंभिक दस्तावेजों और दावों में आंध्र प्रदेश का भी उल्लेख सामने आया था। शिकायत में कहा गया है कि यह स्थिति चुनावी नियमों के विपरीत है, क्योंकि भारतीय कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति का नाम केवल एक ही निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए।

यह पूरा मामला वर्ष 2019 में बेंगलुरु में दाखिल एक निजी शिकायत से शुरू हुआ था, जिसे अधिवक्ता के. दिलीप कुमार ने दायर किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मतदाता पहचान पत्रों के कथित दोहराव के साथसाथ चुनावी दस्तावेजों में कई पंजीकरणों की जानकारी छिपाई गई। यह भी कहा गया कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान नामांकन प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों में यह जानकारी सामने आई थी।

मामले की सुनवाई बेंगलुरु की 48वीं एसीजेएम/एसीएमएम अदालत में चल रही है। अदालत की ओर से कई बार समन जारी किए गए, लेकिन आरोप है कि अभिनेता लगातार पेश नहीं हुए। इसी अनुपस्थिति को देखते हुए अदालत ने पहले भी गैरजमानती वारंट जारी किया था और वर्ष 2026 में एक बार फिर ऐसी कार्रवाई की गई। कुछ रिपोर्टों के अनुसार यह तीसरा मौका है जब उनके खिलाफ NBW जारी किया गया है।

अदालत ने यह वारंट इस आधार पर जारी किया कि समन और पहले जारी आदेशों के बावजूद आरोपी की ओर से अदालत में उपस्थित होने में असफलता रही, जिसे न्यायिक प्रक्रिया में असहयोग के रूप में देखा गया। हालांकि यह स्पष्ट किया गया है कि गैरजमानती वारंट का अर्थ दोषसिद्धि नहीं होता, बल्कि यह केवल आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित कराने की एक कानूनी प्रक्रिया है।

वर्तमान स्थिति में यह मामला अभी भी विचाराधीन है और किसी प्रकार का अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा नहीं सुनाया गया है। अगली सुनवाई 25 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है। आरोपों की वैधानिकता और सत्यता पर अंतिम निर्णय अदालत के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट होगा। इस मामले में कानूनी आधार के रूप में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत मतदाता सूची में गलत पंजीकरण या गलत घोषणाओं से जुड़े मामलों को गंभीर माना जाता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो इनमें जुर्माना और एक वर्ष तक की सजा का प्रावधान भी हो सकता है।

प्रकाश राज की ओर से पहले भी इन आरोपों को खारिज किया गया था और इसे राजनीति से प्रेरित बताते हुए आरोप लगाया गया था कि उन्हें उनके राजनीतिक रुख के कारण निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि इस नवीनतम वारंट पर उनकी ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया अब तक सामने नहीं आई है। यह पूरा मामला अब एक लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद का रूप ले चुका है, जो न केवल चुनावी पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थिति और जवाबदेही के महत्व को भी सामने लाता है।