ईयू चीफ की ट्रंप को चेतावनी तो कनाडा पीएम ने खोली अमेरिका की पोल!


नई दिल्ली : ग्रीनलैंड को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप की रुचि और बयानों ने अमेरिका और यूरोप के बीच एक साफ दरार खड़ी कर दी है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पश्चिमी नेताओं के भाषणों ने भी इस दीवार को गहरा कर दिया है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने बिना नाम लिए ट्रंप को बुली करार दिया तो, कनाडा के पीएम मार्क कार्नी के अपने भाषण में बिखरते वर्ल्ड ऑर्डर की कलई खोल दी है। उन्होंने अमेरिकी हिपोक्रेसी को भी सामने रखा है। साफ है अब पश्चिम की रणनीतिक एकता में सेंध लग चुकी है ईयू प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन पहले ही चेतावनी दी चुकी हैं कि कि ट्रंप का एक्शन खतरनाक रास्ते की ओर ले जाएगा।

भारत में EU समिट से पहले ईयू प्रमुख के बयान के मायने?
राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों का ही प्रभाव है कि कनाडा ने चीन का रूख किया है, तो ईयू भारत की ओर देख रहा है। ईयू प्रमुख उर्सुला वॉन डेयर लेन भारत-ईयू समिट को बहुत उम्मीदों से देख रही हैं। उन्होंने भारत और यूरोप के बीच होने वाली डील को ‘मदर ऑफ ऑल डील’ कहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि उर्सुला वक्त की नजाकत के तहत ऐसा कर रही हैं। हालांकि ये व्यापारिक साझेदारों की विविधत की ओर बढ़ना उनकी मजबूरी है ।

‘मिडिल पावर्स’ को क्या है कार्नी का संकेत
कनाडा के पीएम ने नियम आधारित वर्ल्ड ऑर्डर के अलावा ‘मिडिल पावर्स’ से मिलकर काम करने को कहा है। माना जा रहा है कि उनका संकेत भारत जैसे देशों को लेकर भी है, जो एक वक्त में गुटनिरपेक्ष देशों की अगुवाई कर चुका है। उनके इस बयान ने नई बहस छेड़ दी है, कि क्या अब ग्लोबल साउथ को पहल करनी है।

कहां बढ़ रहा है यूरोप ?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड को लेकर इरादे साफ कर चुके हैं। इसके लिए वो रूस और चीन के कथित डर को सबसे बड़ी वजह की तरह पेश कर रहे हैं । ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। हालांकि रूस और चीन ने कह दिया है कि उन्हें ग्रीनलैंड में रूचि नहीं है। हालांकि फ्रांस और यूरोपीय यूनियन से विरोध के बावजूद ट्रंप, टस से मस नहीं दिख रहे। यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला देर लेयेन कह रही हैं कि यूरोप एक स्थाई बदलाव की ओर बढ़ रहा है और अब वक्त है कि एक स्वतंत्र यूरोप को कायम करने की कोशिश करनी चाहिए।

क्या यूरोप डिफेंस इनिशिएटिव बनेगा?
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार राजीव डोगरा कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक समझदारी और दोस्ती को खतरा सामने है। अगर इस दरार ने खाई की शक्ल ली तो इसका पहला खामियाजा नाटो को लगेगा। यूएस भले ही नाटो के बाहर जाए या नहीं लेकिन ऐसी स्थिति में यूरोप डिफेंस इनीशिएटिव को लेकर कोशिशें तेज़ हो सकती हैं और अगर ऐसा हुआ तो नाटो के अस्तित्व पर सवाल भी खड़े होंगे।

हालांकि ट्रंप के तेवर ग्रीनलैंड को लेकर भले ही कितने कड़े क्यों ना हों, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि ग्रीनलैंड पर EU और यूएस में युद्ध शुरु हो जाएगा। बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जाएंगी।

यूरोप- US के बीच का टकराव पुरानी बीमारी
जानकार कहते हैं कि ग्रीनलैंड पर दो फाड़ पश्चिमी एकता महज एक दिन में सामने नहीं आई। अविश्वास और असंतोष के बीज रूस और यूक्रेन के युद्ध से शुरू होगए थे। उस समय अमेरिका ने इन देशों में सस्ती रूसी एनर्जी बंद करवाई, जिससे कि यूरोप में इंडस्ट्री सेक्टर पर बुरा असर पड़ा। महंगाई और बेरोज़गारी बढते चले गए। इसके बाद यूरोप के जनमानस में अमेरिका को लेकर अपने यूरोपीय नेताओं को उनके देश में निशाने पर लिया गया।

टैरिफ को लेकर जिस तरह एकजुटता से ट्रंप का विरोध नहीं किया गया, उससे साफ था, हालात इस ओर ही जाएंगे ही। चीन, टर्की और ब्राजील ने यूएस का विरोध तो किया लेकिन सबने अपने अपने लिए कहा। कहीं एकजुटता नहीं दिखी। आर्कटिक क्षेत्र अब ग्लोबल युद्ध का नया मैदान है।

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