
नागफनी को संस्कृत में वज्रकंटका कहा जाता है। इसके कांटे बहुत मजबूत होते हैं, इसलिए इसे यह नाम दिया गया है। पुराने समय में इसके कांटे से कर्णछेदन भी किया जाता था। पारंपरिक मान्यता है कि इसमें एंटीसेप्टिक गुण पाए जाते हैं, जिससे कान में संक्रमण कम होता था।
नागफनी के फल में फ्लेवोनॉयड्स, टैनिन और पेक्टिन पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें जस्ता, तांबा, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, मोलिब्डेनम और कोबाल्ट जैसे खनिज तत्व भी होते हैं। स्वाद में यह कड़वी और प्रकृति में उष्ण मानी जाती है। आयुर्वेद में इसे पाचक, मूत्रल और विरेचक गुणों वाला बताया गया है। औषधीय प्रयोग के लिए इसके पूरे पौधे का उपयोग किया जाता है।
कान के दर्द में इसके रस की 1–2 बूंद डालने से पारंपरिक रूप से लाभ बताया गया है। कुक्कुर खांसी में इसके फल को भूनकर खाने की सलाह दी जाती है। इसके फल से बना शरबत पित्त विकार में उपयोगी माना जाता है। नागफनी का पौधा जहां खेतों की रक्षा करता है, वहीं पारंपरिक चिकित्सा में इसे कई रोगों में उपयोगी बताया गया है।
नागफनी के औषधीय गुणों के बारे में परंपरागत उपयोग इस प्रकार बताए जाते हैं। यदि कब्ज की समस्या हो तो इसके ताजे दूध की एक–दो बूंद बताशे में डालकर लेने की सलाह दी जाती है, हालांकि इसका दूध आंख में नहीं गिरना चाहिए क्योंकि यह नुकसान पहुंचा सकता है। आंखों की लाली में इसके कांटे हटाकर पत्ते के गूदे को कपड़े पर रखकर आंख पर बांधने की पारंपरिक विधि बताई जाती है।
सूजन, जोड़ों के दर्द या चोट में इसके पत्ते के गूदे पर हल्दी और सरसों का तेल लगाकर हल्का गर्म करके बांधने से राहत मिलने की बात कही जाती है। हाइड्रोसील में इसे लंगोटी में बांधने का भी लोकप्रचलित उपाय बताया जाता है। कान की परेशानी में पत्ता गर्म कर उसका रस डालने की सलाह दी जाती है।
इसके लाल या पीले फूलों के नीचे लगने वाले फल को उबालकर खाया जाता है, जिसे पित्त और ज्वर में उपयोगी माना गया है। दमा और सामान्य खांसी में इसके सूखे फल का काढ़ा पारंपरिक रूप से दिया जाता रहा है। कुछ मान्यताओं में पत्तों के रस के नियमित सेवन को गंभीर रोगों से बचाव में सहायक बताया गया है, लेकिन ऐसे दावों के लिए वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।
लीवर और प्लीहा बढ़ने, भूख कम लगने या जलोदर जैसी स्थितियों में इसके रस को अन्य पदार्थों के साथ मिलाकर लेने की लोक चिकित्सा में चर्चा मिलती है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। कफ और श्वास संबंधी समस्याओं में इसका रस अदरक के रस के साथ लेने की सलाह दी जाती है।
नागफनी के पंचांग को जलाकर तैयार क्षार को शहद या गर्म पानी के साथ लेने का उल्लेख हृदय और श्वास संबंधी तकलीफों में मिलता है। पारंपरिक चिकित्सा में इसे सूजन, कब्ज, निमोनिया, गठिया और मूत्र रोगों में भी उपयोगी बताया गया है। इसका प्रयोग आंतरिक और बाह्य दोनों रूपों में किया जाता है, लेकिन उपयोग से पहले कांटे पूरी तरह हटाना आवश्यक है।
निमोनिया में इसके छोटे टुकड़े उबालकर प्राप्त अर्क की सीमित मात्रा देने की लोक विधि बताई जाती है। गठिया और सूजन में तने को बीच से फाड़कर हल्दी और सरसों के तेल के साथ गर्म कर प्रभावित स्थान पर बांधने की सलाह दी जाती है। आंतों की समस्या, कोलाइटिस और प्रोस्टेट सूजन में इसके फूलों के उपयोग का उल्लेख मिलता है।
सामान्य सूजन, यूरिक एसिड बढ़ने या आर्थराइटिस में इसकी जड़ को मेथी, अजवायन और सौंठ के साथ काढ़े के रूप में लेने की पारंपरिक सलाह दी जाती है। इसके मोटे पत्तों के कांटे हटाकर उबालकर उसमें जैतून तेल, कच्ची हल्दी और लहसुन मिलाकर बनाया गया लेप गठिया और सूजन में बाहरी उपयोग के लिए बताया जाता है।
महत्वपूर्ण सावधानी यह है कि नागफनी का प्रयोग सोच-समझकर और सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। गर्भवती महिलाएं, गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्ति या जो लोग नियमित दवाएं लेते हैं, वे उपयोग से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।




