
अगर देश के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के नाम से फर्जी वेबसाइट बनाकर साइबर ठगी की जा सकती है, तो आम नागरिक कितने बड़े खतरे में हैं… इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं. साइबर अपराध अब सिर्फ व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि देश की संस्थागत विश्वसनीयता और न्याय व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है.
जयपुर में शुक्रवार को साइबर सुरक्षा पर आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने खुद के अनुभव साझा किए. उन्होंने बताया कि लगभग हर दूसरे दिन उनके नाम से नई फर्जी वेबसाइट या डिजिटल प्रोफाइल सामने आती है, जिनका इस्तेमाल लोगों को ठगी के संदेश भेजने में किया जाता है.
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘एक दिन मेरी बहन और मेरी बेटी को मेरे नाम से बने एक फर्जी साइट से मैसेज आया. बाद में जांच में पता चला कि ऐसे सभी प्लेटफॉर्म नाइजीरिया से ऑपरेट किए जा रहे हैं. यही साइबर अपराध की जटिलता है यह सीमाओं को नहीं मानता.’
जस्टिस सूर्यकांत ने बताया कि उन्होंने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों में स्वयं संज्ञान लिया, जिसमें एक बुजुर्ग दंपती की जीवनभर की कमाई साइबर ठगों ने उड़ा दी थी. उन्होंने कहा, ‘जब कोई आम नागरिक अपनी पूरी जमा पूंजी गंवाता है, तो नुकसान सिर्फ आर्थिक नहीं होता. वह भावनात्मक, सामाजिक और संस्थागत विश्वास को भी तोड़ देता है. डीपफेक वीडियो किसी की इज्जत और आजीविका तक छीन सकते हैं.’
किसी लिंक पर क्लिक करने से पहले 100 बार सोचें
यही वजह है कि हम सभी को झटपट लोन के मैसेज, ट्रैफिक चालान के लिंक, केवाईसी अपडेट के नाम पर आए किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए. मोबाइल पर आने वाले अनजान लिंक साइबर फ्रॉड का सबसे आम तरीका बन चुके हैं. चालान, केवाईसी अपडेट, पार्सल डिलीवरी या झटपट लोन जैसे मैसेज भेजकर लोगों को लिंक पर क्लिक करने के लिए उकसाया जाता है. एक बार लिंक खुलते ही फोन या बैंक खाते की जानकारी ठगों तक पहुंच जाती है. बैंक या सरकारी विभाग कभी भी लिंक भेजकर निजी जानकारी नहीं मांगते, इसलिए ऐसे किसी भी संदेश से सतर्क रहने की सलाह दी जाती है.
ओटीपी पर बरते खास सावधानी
साइबर अपराध में ओटीपी सबसे बड़ा हथियार बन गया है. ठग खुद को बैंक अधिकारी या तकनीकी कर्मचारी बताकर ओटीपी, एटीएम पिन या यूपीआई पिन पूछते हैं. विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि बैंक या कोई भी संस्था कभी फोन पर ओटीपी नहीं मांगती. ओटीपी साझा करना सीधे खाते से पैसे उड़ने का खतरा पैदा करता है.
डिजिटल अरेस्ट बना बड़ी समस्या
हाल के दिनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर लोगों को डराने के मामले भी तेजी से बढ़े हैं. कॉल करने वाले खुद को पुलिस, सीबीआई या ईडी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी का डर दिखाते हैं और वीडियो कॉल के जरिए पैसे ट्रांसफर करवाते हैं. कानून विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी जैसी कोई प्रक्रिया नहीं होती. डराकर पैसे मांगना साफ तौर पर साइबर ठगी है.
सोच-समझकर करें ऐप डाउनलोड
डिजिटल भुगतान बढ़ने के साथ यूपीआई और बैंक अलर्ट को चालू रखना भी जरूरी माना जा रहा है. हर लेनदेन का तुरंत मैसेज या नोटिफिकेशन आने से संदिग्ध गतिविधि का पता जल्दी चल जाता है और समय रहते कार्रवाई की जा सकती है. इसी तरह, मोबाइल में ऐप डाउनलोड करते समय भी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है. केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही ऐप इंस्टॉल करने और किसी के कहने पर स्क्रीन शेयर या रिमोट एक्सेस ऐप डाउनलोड न करने की चेतावनी दी जाती है.
सोशल मीडिया पर कम जानकारी दें
सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा निजी जानकारी साझा करना भी साइबर ठगों को मौका देता है. मोबाइल नंबर, जन्मतिथि, पता या परिवार से जुड़ी जानकारी अक्सर फर्जी प्रोफाइल और ठगी में इस्तेमाल की जाती है. मजबूत और अलग-अलग पासवर्ड रखने से भी खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.
साइबर ठगी का हो गए शिकार तो क्या करें?
अगर किसी के साथ साइबर ठगी हो जाती है तो देर किए बिना कार्रवाई करना बेहद जरूरी है. विशेषज्ञों का कहना है कि तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करने या साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने से पैसा वापस मिलने की संभावना बढ़ जाती है. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। देरी होने पर नुकसान की भरपाई मुश्किल हो जाती है. साइबर फ्रॉड का सबसे बड़ा शिकार बुज़ुर्ग और नए डिजिटल यूज़र बन रहे हैं. इसलिए परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे घर के बुज़ुर्गों और बच्चों को लगातार जागरूक करें. साफ संदेश यही है कि लालच, डर और जल्दबाज़ी से दूर रहकर ही साइबर ठगी से बचा जा सकता है.





