
ईरान जंग की वजह से तेल-गैस का संकट पूरी दुनिया में है. ऐसे में भारत के पड़ोसी देश भी चिंतित हैं और लगातार सप्लाई बढ़ाने की डिमांड कर रहे हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने बुधवार को साफ कर दिया कि भारत अपने पड़ोसी देशों से आ रहे ईंधन आपूर्ति के अनुरोधों की बारीकी से जांच कर रहा है. तेल और रिफाइंड हम तभी दे पाएंगे, जब हम अपने यहां की डिमांड पूरी कर लेंगे. जो सरप्लस बचेगा, उसे ही दूसरे देशों को दिया जाएगा.
कुछ दिनों पहले ही भारत ने संकट के समय में बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल समेत कई पड़ोसी देशों को तेल की खेप भेजी थी, लेकिन अब इन देशों से लगातार और ज्यादा तेल की मांग आ रही है, जिस पर भारत को यह फैसला सुनाना पड़ा है.
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से तेल लेकर जाने वाले जहाजों की आवाजाही पर बड़ा असर पड़ा है. इससे दुनिया भर में एनर्जी की कीमतें आसमान छू रही हैं. कच्चे तेल की कीमतों में आए इस अचानक उछाल से भारतीय अर्थव्यवस्था और तेल कंपनियों को मुश्किलें हो रही हैं.
पड़ोसी भारत पर निर्भर
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर है और अपने पड़ोसियों के लिए फर्स्ट रेस्पॉन्डर की भूमिका निभाता रहा है. बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश अपनी ईंधन जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर भारत पर निर्भर हैं. हालांकि, मौजूदा संकट को देखते हुए चीन जैसे देशों ने अपने रिफाइंड ईंधन के निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है, लेकिन भारत ने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए अभी तक निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि ‘पहले अपनी जरूरत’ की नीति लागू की है. इस मुद्दे पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, हमें अपने पड़ोसी देशों से ईंधन आपूर्ति के अनुरोध मिले हैं. हम अपनी घरेलू जरूरत और ईंधन की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए इन सभी अनुरोधों की गहन जांच कर रहे हैं.
वहीं, तेल मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने देश को आश्वस्त करते हुए कहा कि भारत के पास स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए फिलहाल पर्याप्त कच्चा तेल और रिफाइंड ईंधन का स्टॉक मौजूद है. उन्होंने स्पष्ट किया, हमारी पहली प्राथमिकता घरेलू मांग को पूरा करना है. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। अगर इसके बाद हमारे पास अतिरिक्त मात्रा बचती है, तो उपयुक्त अधिकारी ही निर्यात को लेकर अंतिम निर्णय लेंगे.





