IRGC Navy Commander Alireza Tangsiri भी मारे गये, Iran का गुस्सा आसमान पर, Middle East में आग भड़की

पश्चिम एशिया की जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और हालात हर गुजरते घंटे के साथ और ज्यादा विस्फोटक बनते जा रहे हैं। हम आपको बता दें कि बंदर अब्बास में इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर नौसेना के कमांडर अलीरेजा तंगसीरी की लक्षित हमले में मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। यह वही शख्स था जिसने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की रणनीति तैयार की थी, जो दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की धुरी माना जाता है।
तंगसीरी की मौत सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं है, यह सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज पर वार है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र पर नियंत्रण की लड़ाई अब खुलकर सामने आ चुकी है। हम आपको बता दें कि पिछले कुछ दिनों में तंगसीरी लगातार अमेरिका के ठिकानों को निशाना बनाने की धमकी दे रहा था, जिससे साफ था कि ईरान टकराव को चरम पर ले जाने की तैयारी में था।
इसी बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने सौ मिसाइलें दागीं, जिन्हें पूरी तरह हवा में ही मार गिराया गया। यह बयान जहां अमेरिकी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन है, वहीं यह संकेत भी देता है कि युद्ध अब तकनीकी श्रेष्ठता की दौड़ बन चुका है। ट्रंप का यह भी कहना है कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन डर के कारण खुलकर सामने नहीं आ पा रहा।
दूसरी ओर, खारग द्वीप पर ईरान की सैन्य गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। यह द्वीप ईरान के लगभग नब्बे प्रतिशत तेल निर्यात का केंद्र है। यहां अतिरिक्त वायु रक्षा प्रणाली और सैनिक तैनाती इस बात का संकेत है कि ईरान संभावित अमेरिकी हमले के लिए खुद को किले में बदल रहा है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस क्षेत्र पर हमला किसी भी पक्ष के लिए भारी नुकसान का सौदा साबित हो सकता है।
इस बीच, खाड़ी सहयोग परिषद ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान ने सारी लाल रेखाएं पार कर दी हैं। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। परिषद ने कहा है कि सऊदी अरब और कुवैत की रिफाइनरियों पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला है। परिषद का कहना है कि यह सिर्फ क्षेत्रीय तनाव नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुका है। परिषद ने चेतावनी दी है कि यह संकट अब अंतरराष्ट्रीय बन गया है।
दिलचस्प बात यह है कि खाड़ी देश सीधे युद्ध में उतरने से बच रहे हैं और कूटनीतिक समाधान की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। पाकिस्तान ने तो यहां तक दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच पंद्रह सूत्रीय प्रस्ताव पर बातचीत चल रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गोलाबारी के बीच कूटनीति अक्सर दम तोड़ देती है।
इस संघर्ष का एक बेहद खतरनाक पहलू यह भी है कि ईरान ने युद्ध में भाग लेने की न्यूनतम उम्र घटाकर बारह वर्ष कर दी है। बच्चों को गश्त और रसद जैसे कामों में लगाया जा रहा है। यह कदम न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह दर्शाता है कि ईरान अब हर संभव संसाधन झोंकने को तैयार है।
वहीं लेबनान में हिजबुल्ला ने भी खुलकर मोर्चा संभाल लिया है। संगठन ने साफ कहा है कि उसने आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि टकराव का रास्ता चुना है। इससे यह संघर्ष अब बहुस्तरीय हो चुका है, जिसमें कई मोर्चों पर एक साथ आग भड़क रही है।
रणनीतिक रूप से देखें तो यह जंग सिर्फ ईरान और इजराइल या अमेरिका तक सीमित नहीं है। यह ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और भू राजनीतिक संतुलन की लड़ाई है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का मतलब है दुनिया की अर्थव्यवस्था की सांस पर पकड़। यही कारण है कि हर बड़ी शक्ति इस संघर्ष में सीधे या परोक्ष रूप से शामिल होती जा रही है।
इस बीच, रूस ने ड्रोन आपूर्ति की खबरों को झूठ बताया है, लेकिन यह साफ है कि सूचना युद्ध भी उतना ही तीखा हो चुका है जितना जमीनी संघर्ष। साथ ही इंटरनेट बंदी के कारण ईरान के भीतर की स्थिति पर पर्दा पड़ा हुआ है, जो इस संकट को और रहस्यमय बनाता है। बहरहाल, आने वाले दिन निर्णायक होंगे। अगर कूटनीति विफल होती है, तो यह टकराव एक बड़े वैश्विक युद्ध का रूप ले सकता है। फिलहाल जो दिख रहा है, वह सिर्फ शुरुआत है। असली विस्फोट अभी बाकी है।

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