
नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यह साबित कर दिया है कि वह विदेश मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सही चुनाव हैं। तभी तो वह यूरोपीय संघ से होने जा रही महाडील के लिए सबसे अहम किरदार हैं। जयशंकर ने गुरुवार को ही यूरोपीय संघ के राजदूतों से मुलाकात की और 27 जनवरी को होने वाले भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन से पहले ‘विश्व अर्थव्यवस्था को जोखिममुक्त करने’ के लिए सहयोग की अपील की। इस अवसर पर भारत और यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत के नतीजों का ऐलान करेंगे। स्टोरी में यह समझते हैं कि जयशंकर पीएम मोदी के आंख और कान क्यों बने हुए हैं। कारोबार से लेकर किसी भी तरह की डील हो, उसमें विदेश मंत्री जयशंकर की भूमिका बेहद अहम रहती है।
जयशंकर ने यूरोपीय यूनियन के राजदूतों से की बात
जयशंकर ने X पर पोस्ट किया-आज यूरोपीय संघ के देशों के राजदूतों से बातचीत करके खुशी हुई। मैंने उनसे दुनिया की वर्तमान स्थिति के बारे में बात की, जहां अस्थिरता और अनिश्चितता अब सामान्य बात हो गई है। उन्होंने कहा कि मजबूत भारत-यूरोपीय संघ संबंध लचीली सप्लाई-चेन पर सहयोग करके विश्व अर्थव्यवस्था को जोखिममुक्त करेंगे। एचएडीआर, समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और विकास परियोजनाओं जैसी सार्वजनिक वस्तुओं को प्रदान करके अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आश्वस्त करेंगे और मजबूत व्यापार, गतिशीलता और सुरक्षा साझेदारी के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करेंगे। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह में हिस्सा लेंगे, जिसके बाद शिखर सम्मेलन होगा। यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कल्लास ने यूरोप के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य के लिए भारत को ‘अपरिहार्य’ बताया है।
जयशंकर को विदेश मंत्री बनाकर मोदी ने चौंकाया था
मई, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व अनुभवी राजनयिक सुब्रह्मण्यम जयशंकर को विदेश मंत्री नियुक्त करके सबको चौंका दिया था। इससे पहले कभी किसी पूर्व अनुभवी राजनयिक को भारत का विदेश मंत्री नियुक्त नहीं किया गया था। यह पद आमतौर पर सत्ताधारी दल के सबसे वरिष्ठ सदस्यों के लिए रिजर्व होता था।
मोदी के पहले कार्यकाल में रहे विदेश सचिव
हालांकि, जयशंकर ने मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के पांच वर्षों में से तीन वर्ष भारत के विदेश सचिव के रूप में काम किया था। मोदी ने उन्हें जनवरी 2015 में उस वक्त विदेश सचिव नियुक्त किया था, जब जयशंकर की वरिष्ठ अधिकारी सुजाता सिंह का विदेश सचिव के रूप में कार्यकाल अभी समाप्त भी नहीं हुआ था।
जयशंकर ने विदेश सचिव रहते ही जीता मोदी का भरोसा
जयशंकर को प्रधानमंत्री का विश्वास जीतने और बाहरी दुनिया से मोदी के संपर्कों में उनके खास प्रतिनिधि बनने के लिए पूरे तीन साल का समय मिला। इस दौरान वह पीएम मोदी के आंख-कान बन गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद पीएम मोदी ने उन्हें 30 मई, 2019 को अपना विदेश मंत्री बना दिया।
गुजरात के सीएम थे मोदी, तभी से जेहन में जयशंकर
ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स पर छपे एक लेख के मुताबिक, प्रधानमंत्री को जयशंकर पर पूरा भरोसा है। मोदी पहले भी जयशंकर से मिल चुके हैं, जिनमें से एक मुलाकात तब हुई थी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और जयशंकर चीन में भारत के राजदूत के पद पर कार्यरत थे। जब जयशंकर अमेरिका में भारत के राजदूत थे, तब सितंबर 2014 में अपनी बेहद सफल अमेरिकी यात्रा के दौरान उन्होंने मोदी पर गहरी छाप छोड़ी होगी।
अमेरिका से न्यूक्लियर डील हो या चीन से बात, सब जगह फिट
लेख में कहा गया है कि जयशंकर एक कुशल रणनीतिक विचारक हैं और उनकी वार्ता-प्रबंधन क्षमता बेजोड़ है। अपने चार दशक लंबे राजनयिक करियर के दौरान, वे भारत के पक्ष में महत्वपूर्ण नीतिगत परिणामों वाली प्रमुख वार्ताओं में सक्रिय रूप से शामिल रहे। वे 2000 के दशक के मध्य में अमेरिका के साथ भारत के परमाणु समझौते के प्रमुख सूत्रधारों में से एक थे। उन्होंने भारत और चीन के बीच अत्यंत संवेदनशील राजनयिक मुद्दों और सैन्य गतिरोधों को भी संभाला है, जैसे कि वास्तविक नियंत्रण रेखा से संबंधित मुद्दे और हाल ही में भारत, भूटान और चीन के त्रिकोणीय सीमा क्षेत्र में डोकलाम गतिरोध से संबंधित मुद्दे।
अमेरिका-चीन सबको साधने का जिम्मा जयशंकर को
भारत के नए विदेश मंत्री के रूप में जयशंकर को द्विपक्षीय व्यापार और वाणिज्य से संबंधित मुद्दों, विशेष रूप से अमेरिका के साथ और चीन और ईरान से जुड़े वैश्विक मुद्दों पर अमेरिकी दृष्टिकोण से संबंधित प्रमुख चुनौतियों के मामले में जयशंकर को ही जिम्मा दिया गया। उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि हाल ही में चीन के साथ भारत के संबंध सुधरे हैं, फिर भी सीमा विवाद अभी भी अनसुलझे हैं। भारत चीन की बेल्ट एंड रोड पहल में भाग लेने से इनकार करता है और नई दिल्ली के पड़ोस में बीजिंग की रणनीतिक योजनाओं को लेकर अत्यधिक संशय में है। अब वह यूरोप से फ्री ट्रेड डील को कामयाब बनाने में लगे हैं।
जयशंकर रह चुके हैं अमेरिका-चीन में राजदूत
1977 में भारतीय विदेश सेवा में शामिल जयशंकर 30 मई, 2019 से भारत के विदेश मंत्री हैं। वे गुजरात से भारत की संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) के सदस्य हैं। जयशंकर 2015-18 तक विदेश सचिव, अमेरिका में राजदूत (2013-15), चीन में राजदूत (2009-2013) और चेक गणराज्य में राजदूत (2000-2004) रहे। वे सिंगापुर में उच्चायुक्त (2007-2009) भी रहे।
जयशंकर यूरोप के कई देशों में भी रहे
जयशंकर ने मॉस्को, कोलंबो, बुडापेस्ट और टोक्यो स्थित दूतावासों में और साथ ही विदेश मंत्रालय और राष्ट्रपति सचिवालय में भी अन्य राजनयिक पदों पर कार्य किया है। वे टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड में वैश्विक कॉर्पोरेट मामलों के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
दिल्ली यूनिवर्सिटी और जेएनयू से की है पढ़ाई
दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से ग्रेजुएट जयशंकर ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की उपाधि ले चुके हैं। कूटनीति, लोक सेवा और विद्वता के क्षेत्र में उनके योगदान को मान्यता देते हुए, उन्हें भारतीय प्रबंधन संस्थान, कलकत्ता द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया है।
जयशंकर लिख चुके हैं बेस्ट सेलर बुक्स
जयशंकर को 2019 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया और उन्होंने दो बेस्टसेलर पुस्तकें लिखी हैं-‘द इंडिया वे: स्ट्रैटेजीज फॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड’, जो 2020 में प्रकाशित हुई और ‘व्हाई भारत मैटर्स’2024 में प्रकाशित हुई। दोनों पुस्तकों का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन हो चुका है।


