हाईकोर्ट में महिला की अजीबो-गरीब डिमांड; पति के स्पर्म से बच्चा तो चाहिए लेकिन…!


मुंबई की एक 46 वर्षीय महिला का बेहद संवेदनशील और अनोखा कानूनी मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंच गया है. महिला अपने अलग रह रहे पति के साथ पहले बनवाए गए 16 फ्रीज्ड भ्रूण (एम्ब्रियो) का इस्तेमाल करके मां बनना चाहती है, लेकिन पति ने इसके लिए अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया है। इसी वजह से महिला ने अब अदालत का रुख किया है. इस अजीबो-गरीब मामले में हाईकोर्ट के जज साहब भी हैरत में पड़ गए हैं. महिला का कहना है कि ये भ्रूण उस समय बनाए गए थे जब वह अपने पति के साथ रहती थी और उसके साथ मिलकर फैमिली प्लानिंग की थी.

पति और पत्नी ने मिलकर मेडिकल प्रक्रिया के तहत इन भ्रूणों को सुरक्षित रूप से फ्रीज कर दिया गया था ताकि भविष्य में उनका इस्तेमाल कर गर्भधारण किया जा सके लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में दरार आ गई और वे अलग रहने लगे. अब 46 वर्ष की उम्र में महिला का कहना है कि मां बनने का उसका सपना अधूरा रह सकता है. उसने अदालत में दलील दी है कि उम्र के इस पड़ाव पर उसके पास मातृत्व हासिल करने के लिए यही एकमात्र रास्ता बचा है. महिला ने इसे अपनी ‘मातृत्व की आखिरी उम्मीद’ बताया है और कहा है कि कानूनी पाबंदियों और पति की असहमति के कारण उसका सपना टूटने के कगार पर है.

पत्नी की बातों से पति नहीं है सहमत
दूसरी ओर, पति इस बात पर सहमत नहीं है कि इन फ्रीज्ड भ्रूणों का इस्तेमाल किया जाए. इसी असहमति के कारण मामला अदालत तक पहुंच गया है. अब दिल्ली हाईकोर्ट को यह तय करना होगा कि ऐसे हालात में महिला को इन भ्रूणों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं. यह मामला न सिर्फ एक परिवार के निजी विवाद से जुड़ा है, बल्कि इससे प्रजनन अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मेडिकल तकनीक से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी अहम सवाल खड़े हो रहे हैं. अदालत का फैसला आने वाले समय में ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बन सकता है.

2021 में हुई थी महिला की शादी
दक्षिण मुंबई के एक दंपती से जुड़ा यह मामला अब कानूनी विवाद का रूप ले चुका है. दोनों ने साल 2021 में शादी की थी और परिवार बढ़ाने की योजना के तहत 2022 में आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया का सहारा लिया. इस प्रक्रिया में पति के स्पर्म और पत्नी के अंडाणु की मदद से कुल 16 भ्रूण तैयार किए गए, जिन्हें बाद में एक फर्टिलिटी क्लिनिक में सुरक्षित रूप से फ्रीज करवा दिया गया था. हालांकि, समय के साथ दोनों के रिश्तों में खटास आ गई और 2023 में वे अलग-अलग रहने लगे. इसके बाद फ्रीज किए गए भ्रूणों के इस्तेमाल को लेकर दोनों के बीच विवाद खड़ा हो गया. महिला चाहती थी कि इन भ्रूणों का उपयोग आगे किया जाए, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन पाई.

फरवरी में बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज किया था केस
इस मुद्दे को लेकर महिला ने सबसे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हालांकि बाद में उसने अपनी याचिका वापस ले ली और मामला राष्ट्रीय असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) और सरोगेसी बोर्ड के सामने ले गई. लेकिन फरवरी 2026 में बोर्ड ने उसकी मांग को खारिज कर दिया. बोर्ड से राहत न मिलने के बाद अब महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट में नई याचिका दायर की है. फिलहाल अदालत से इस मामले में सुनवाई और फैसले का इंतजार किया जा रहा है. हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए अपनी पीड़ा साझा की है. उसका कहना है कि वह अपने फ्रीज किए गए भ्रूण (फ्रोजन एम्ब्रियो) को एक क्लिनिक से दूसरे क्लिनिक में ट्रांसफर कराकर गर्भधारण करना चाहती है.

महिला के लिए आखिरी उम्मीद लेकिन कानून बना बाधक
फिलहाल इस महिला की राह में मौजूदा कानून बाधा बन गया है. दरअसल, असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत किसी भी भ्रूण के इस्तेमाल या ट्रांसफर के लिए पति और पत्नी दोनों की सहमति जरूरी होती है. महिला का आरोप है कि उसका पति जानबूझकर इस प्रक्रिया के लिए अपनी सहमति नहीं दे रहा है. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। उसकी दलील है कि पति के इस रवैये की वजह से वह मां बनने के अपने अधिकार से वंचित हो रही है. महिला ने अदालत में कहा कि समय तेजी से निकलता जा रहा है और उसके पास मातृत्व हासिल करने का यह शायद आखिरी मौका है. अगर भ्रूण का ट्रांसफर नहीं हुआ तो वह मां बनने की उम्मीद हमेशा के लिए खो सकती है. इसलिए उसने न्यायालय से हस्तक्षेप करने और उसे अपने फ्रीज्ड एम्ब्रियो के इस्तेमाल की अनुमति देने की गुहार लगाई है.

अदालत से क्या मांग की?
दिल्ली हाईकोर्ट में एक महिला ने महत्वपूर्ण याचिका दायर करते हुए अदालत से खास अनुमति देने की मांग की है. महिला का कहना है कि उसे अपने पति की सहमति के बिना ही अपने एम्ब्रियो को एक क्लिनिक से दूसरे क्लिनिक में ट्रांसफर करने और उन्हें अपने गर्भ में प्रत्यारोपित कराने की इजाजत दी जाए.

याचिका में महिला ने यह भी अनुरोध किया है कि सहायक प्रजनन तकनीक (ART) कानून की कुछ धाराओं की ऐसी व्याख्या की जाए जिससे इस तरह की परिस्थितियों में महिलाओं को राहत मिल सके. साथ ही उसने अदालत से यह भी कहा है कि अगर जरूरत हो तो राष्ट्रीय एआरटी बोर्ड को निर्देश दिया जाए कि वह ऐसे मामलों को ध्यान में रखते हुए कानून में संशोधन की सिफारिश करे. महिला ने अपनी याचिका में इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग भी की है. उसका कहना है कि उसकी उम्र बढ़ने और प्रजनन क्षमता के लगातार घटने के कारण समय उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

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