जटिल से जटिल कूटनीतिक उलझनों को सधे हुए अंदाज में सुलझाने के लिए पहचाने जाने वाले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर भारत की सक्रिय कूटनीति का दमदार परिचय दिया है। ईरान के विदेश मंत्री से दूरभाष पर बातचीत करने के ठीक अगले ही दिन उन्होंने नई दिल्ली में ईरान के उप विदेश मंत्री से आमने सामने मुलाकात कर यह स्पष्ट कर दिया कि संकट चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, भारत संवाद के हर द्वार खुले रखता है। यही सक्रियता और संतुलन आज भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों में खड़ा करता है जो पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के तनावपूर्ण माहौल के बीच भी ईरान, खाड़ी देशों, इजराइल और अमेरिका सभी से निरंतर संपर्क बनाये हुए है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित उस दूरदर्शी नीति का परिणाम है जिसने भारत को वैश्विक मंच पर भरोसेमंद और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है।
देखा जाये तो पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के बीच भारत की विदेश नीति एक बार फिर मजबूती के साथ सामने आई है। जिस समय पूरा क्षेत्र टकराव और अनिश्चितता की आग में घिरा हुआ है, उस समय भारत संयम और विवेक के साथ अपनी भूमिका निभा रहा है। भारत की कोशिश स्पष्ट है कि तनाव बढ़ाने की बजाय संवाद और समाधान का रास्ता मजबूत किया जाये, साथ ही राष्ट्रीय हितों और अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये। इस पूरे प्रयास में विदेश मंत्री एस जयशंकर की सक्रिय पहल और लगातार संपर्क साधने की नीति निर्णायक भूमिका निभा रही है।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पश्चिम एशिया में बेहद संवेदनशील हुए हालात जैसे नाजुक समय में भारत ने जल्दबाजी या पक्षपात से दूर रहते हुए संतुलित कदम उठाए हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से दूरभाष पर बात कर हालात पर विस्तार से चर्चा की और संवाद बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह संपर्क इस बात का संकेत था कि भारत संकट की स्थिति में भी बातचीत की प्रक्रिया को जीवित रखना चाहता है।
भारत ने इस घटना के बाद अपनी संवेदनशीलता भी स्पष्ट रूप से दिखाई। भारत सरकार की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए और ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहाली से मुलाकात की। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। यह कदम बताता है कि भारत की कूटनीति केवल रणनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं है बल्कि उसमें मानवीय संवेदनशीलता और सम्मान भी शामिल है।
भारत की यही संतुलित और परिपक्व नीति उसे वैश्विक राजनीति में अलग पहचान दिलाती है। एक तरफ भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत साझेदारी बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ ईरान जैसे देशों के साथ संवाद और सहयोग की धारा भी बनाए रखता है। इस संतुलन ने भारत को भरोसेमंद और स्वतंत्र कूटनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
देखा जाये तो पश्चिम एशिया भारत के लिए केवल एक दूरस्थ भूभाग नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस इलाके में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं और भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा भी यहीं से पूरा होता है। ऐसे में वहां पैदा होने वाला हर संकट भारत की अर्थव्यवस्था और नागरिकों पर असर डाल सकता है। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए भारत लगातार तनाव कम करने और बातचीत को बढ़ावा देने की अपील करता रहा है।
इसी दौरान, नई दिल्ली में आयोजित रायसीना संवाद ने भी भारत की बढ़ती कूटनीतिक शक्ति को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित कर दिया है। इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में दुनिया के कई देशों के मंत्री, नीति निर्माता और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल हुए हैं। सम्मेलन के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अनेक देशों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर वैश्विक चुनौतियों पर विचार विमर्श किया। इसी क्रम में ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खातिबजादेह से उनकी मुलाकात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यह उस समय हुई जब पश्चिम एशिया में तनाव अपने चरम पर है।
इसके अलावा जयशंकर ने फ्रांस के प्रतिनिधि बेंजामिन हदाद, जर्मनी के नील्स आनन और तंजानिया के उप विदेश मंत्री नगवारु जुमाने मघेम्बे सहित कई देशों के नेताओं से चर्चा की। इन बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब वैश्विक संवाद का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति का आधार है आत्मविश्वास, संतुलन और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना। एस जयशंकर उसी नीति को सटीक और प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। उनकी कूटनीतिक शैली स्पष्ट, व्यावहारिक और निर्णायक है, जिसके कारण भारत हर परिस्थिति में अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने में सफल रहा है।
बहरहाल, पश्चिम एशिया के इस उथल पुथल भरे दौर में भारत की भूमिका आत्मविश्वास और संतुलित कूटनीति का मजबूत उदाहरण बनकर उभरी है। भारत ने बिना किसी दबाव के संवाद का मार्ग चुना और हर पक्ष से संपर्क बनाए रखा। परिणाम यह है कि आज वैश्विक मंच पर भारत की बात गंभीरता से सुनी जाती है और उसकी पहल को महत्व दिया जाता है। यह स्थिति अचानक नहीं बनी बल्कि वर्षों की स्पष्ट नीति, मजबूत नेतृत्व और निरंतर कूटनीतिक प्रयासों का परिणाम है। पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट फिर यह संकेत दे रहा है कि भारत अब वैश्विक परिदृश्य में निर्णायक भूमिका निभाने वाली शक्ति बन चुका है। जब दुनिया का एक हिस्सा संघर्ष में उलझा है तब भारत की धरती पर विभिन्न देशों के नेता एकत्र होकर विचार मंथन कर रहे हैं और शांति का मार्ग तलाश रहे हैं। यह दृश्य केवल एक सम्मेलन का नहीं बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता और कूटनीतिक प्रभाव का प्रमाण है।
-नीरज कुमार दुबे





