अमेरिका और ईरान के बीच अस्थाई समझौते की खबरों का भारतीय बाजारों पर भी दिखने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद भारतीय सरकारी बॉन्ड में खरीदारी बढ़ी और 10 साल की बॉन्ड यील्ड 12 हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंच गई. इससे अर्थव्यवस्था को राहत मिलने की उम्मीद है. बाजार में 6.94% 2036 सरकारी बॉन्ड की यील्ड 3.2 बेसिस पॉइंट घटकर 6.8637% पर आ गई. यह 25 मार्च के बाद का सबसे निचला इंट्राडे स्तर है. हालांकि यह अभी भी संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर से करीब 20 बेसिस पॉइंट ऊपर बनी हुई है.

कच्चे तेल में गिरावट से बढ़ी राहत

अमेरिका और ईरान के अधिकारियों ने मध्यपूर्व में तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की दिशा में शुरुआती समझौते की जानकारी दी. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई. ब्रेंट क्रूड का भाव 4.5% गिरकर 83.40 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जो 10 मार्च के बाद का सबसे निचला स्तर है. इससे पहले संघर्ष बढ़ने के दौरान तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं.

भारत के लिए क्यों अहम है तेल की कीमतों में गिरावट?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है. ऐसे में तेल की कीमतों में कमी से देश के आयात बिल पर दबाव घट सकता है. इसके अलावा महंगाई नियंत्रित रखने, रुपये को मजबूती देने और चालू खाते के घाटे को कम करने में भी मदद मिल सकती है. इस सकारात्मक माहौल का असर मुद्रा बाजार में भी देखने को मिला. भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 94.5750 के स्तर पर पहुंच गया, जो करीब पांच सप्ताह का उच्चतम स्तर माना जा रहा है.

विदेशी निवेशकों की बढ़ी दिलचस्पी

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर वैश्विक संकेत और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारतीय बॉन्ड बाजार के लिए अनुकूल साबित हो सकती है. एडेलवाइस म्यूचुअल फंड के प्रेसिडेंट एवं CIO धवल दलाल के अनुसार, सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश बढ़ने से 10 साल की यील्ड निकट भविष्य में 6.75% से 6.80% के दायरे तक आ सकती है.

वहीं निवेशकों की नजर ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में भारत को संभावित रूप से शामिल किए जाने पर भी बनी हुई है. पिछले छह कारोबारी सत्रों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बॉन्ड में 1.6 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है, जिससे बाजार का भरोसा मजबूत हुआ है.