बात-बात पर बुरा मानना और गलत मतलब निकालना नॉर्मल नहीं! पैरानोइया’ के हो सकते हैं लक्षण

11वीं क्लास की होनहार छात्रा राधिका पढ़ाई में अव्वल है, लेकिन उसके मन में एक गहरा डर घर कर गया हैकोई उसे पसंद नहीं करता और सब उसके खिलाफ हैं। क्लास में होने वाली जरा सी हंसी भी उसे अपनी ओर इशारा लगती है। धीरेधीरे इस अविश्वास ने उसे अपनों से दूर कर दिया। राधिका जिस स्थिति से गुजर रही है, मनोविज्ञान में उसे ‘पैरानोइया’ कहा जाता है। आज के प्रतिस्पर्धी दौर और सोशल मीडिया के युग में, कई युवा अनजाने में इस मानसिक उलझन का शिकार हो रहे हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ एक वहम है या कोई गंभीर बीमारी? साइकोलोजी और रिसर्च से जानते हैं सारी सच्चाई।

बात-बात पर बुरा मानना और गलत मतलब निकालना नॉर्मल नहीं! पैरानोइया’ के हो सकते हैं लक्षण

पैरानोइया क्या है? युवाओं में क्यों बढ़ रहा है शक का यह मानसिक पैटर्न?

फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया पैरानोइया एक तरह की मेंटल स्टेट है, जिसमें इंसान को यह महसूस होता है कि लोग उसके खिलाफ साजिश कर रहे हैं या उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। पैरानोइया एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को बिना किसी ठोस सबूत के यह सब लगता है कि लोग उसके खिलाफ हैं। इस मानसिक स्थिति से पीड़ित इंसान को  ऐसा भी महसूस हो सकता है कि लोग लगातार उस पर नजर रख रहे हैं या उसके बारे में सोच रहे हैं। यह बेवजह का अविश्वास व्यक्ति के लिए सामाजिक रूप से सामान्य जीवन जीना और करीबी रिश्ते बनाए रखना मुश्किल बना देता है। साइकोलोजिस्ट ने बताया यह जरूरी नहीं कि यह खुद एक अलग बीमारी हो, बल्कि यह कई मानसिक बीमारियों का लक्षण भी हो सकता है।

शुरुआत में पैरानोइया के लक्षण कैसे पहचाने?

अगर बच्चा या युवा बारबार कहे कि लोग उसके खिलाफ हैं, बच्चा बिना कारण दूसरों की बुराई करे, लोगों या जगहों से बचने लगे, या टीचर्स और दोस्तों पर शक करने लगे तो पेरेंट्स को ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा आसानी से बुरा मान जाना, दूसरों पर भरोसा करने में कठिनाई होना, आलोचना सहन नहीं कर पाना, दूसरों की बातों का गलत मतलब निकालता, हमेशा defensive रहना, आक्रामक, झगड़ालू या गुस्सैल होना, समझौता करने में मुश्किल करना, माफ करके भूल जाना कठिन होना, सोचना कि लोग उसके पीछे उसकी बुराई कर रहे हैं, जरूरत से ज्यादा शक करना, किसी पर भी भरोसा नहीं कर पाना, रिश्ते निभाने में दिक्कत होना,दुनिया को खतरे से भरी जगह मानना शामिल है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। अगर प्रभावित व्यक्ति समझाने के बाद भी अपनी बात पर अड़ा रहे और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है।

पैरानोइया पर रिसर्च और वैज्ञानिक की राय

Journal of Social and Clinical Psychology के एक अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम पैरानोइया को बढ़ावा दे रहे हैं। रिसर्च बताती हैं कि जब कोई युवा शक की स्थिति में होता है और सोशल मीडिया पर उससे जुड़ी चीजें देखता है, तो एल्गोरिदम उसे वैसा ही और नकारात्मक खबरें दिखाता है। इसे ‘डिजिटल इको चैंबर’ कहते हैं, जो राधिका जैसे युवाओं के मन में इस विश्वास को और पक्का कर देता है कि पूरी दुनिया उसके खिलाफ है।

Lancet Psychiatry में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, किशोरों का मस्तिष्क सोशल इवैल्यूएशन या लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे हैं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। 15 से 25 साल की उम्र में मस्तिष्क का ‘अमिग्डाला’ हिस्सा अधिक सक्रिय होता है, जो खतरे को भांपता है। अगर इस उम्र में तनाव अधिक हो, तो यह सामान्य सतर्कता को ‘पैरानॉयड आइडिएशन’ में बदल सकता है।

किंग्स कॉलेज लंदन की एक रिसर्च के अनुसार, शहरी इलाकों में रहने वाले युवाओं में पैरानोइया के लक्षण ग्रामीण इलाकों की तुलना में दो गुना ज्यादा देखे गए हैं, जिसका कारण सामाजिक जुड़ाव की कमी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अजनबियों के बीच रहने का डर है, जो राधिका की स्थिति को और स्पष्ट करता है।

पैरानोइया से पीड़ित इंसान नॉर्मल इंसान से कैसे अलग है?

नॉर्मल इंसान को अगर आप कोई सबूत दे दें कि उसका शक गलत है, तो वह मान जाता है। लेकिन पैरानोइया में व्यक्ति का फिक्स्ड बिलीफ बन जाता है। आप कितना भी समझाएं या प्रूफ दें, वह मानता नहीं है उसकी सोच दूसरों के लिए नकारात्मक ही रहती है।

पैरानोइया किनकिन मानसिक बीमारियों में देखा जाता है?

पैरानोइया कई साइकेट्रिक कंडीशन्स में पाया जाता है, जैसे स्किज़ोफ्रेनिया, साइकोसिस या साइकोटिक डिसऑर्डर, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर और गंभीर डिप्रेशन या एंग्जायटी जिसमें साइकोटिक लक्षण जुड़ जाते हैं।

इस मानसिक रोग से पीड़ित लोगों के सोचने का पैटर्न कैसा होता है?

ऐसे व्यक्ति हर चीज को अपने खिलाफ जोड़कर देखते हैं। उन्हें लगता है लोग उनके खिलाफ हैं, सामान्य घटनाओं को भी गलत तरीके से समझते हैं, ट्रस्ट इश्यू बहुत ज्यादा होते हैं और नेगेटिव थॉट्स हावी रहते हैं।

पैरानोइया की परेशानी किस उम्र में ज्यादा शुरू होती है?

यह समस्या आमतौर पर किशोरावस्था से लेकर मिडिल एज तक देखी जाती है। अगर कम उम्र में शुरू हो, तो यह पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का हिस्सा हो सकता है, जबकि 2025 साल की उम्र में स्किज़ोफ्रेनिया के मामलों में भी यह दिख सकता है।

क्या पैरानोइया सिर्फ इनसिक्योरिटी है?

पैरानोइया की समस्या पूरी तरह कारण पर निर्भर करती है। कभी यह पर्सनैलिटी का हिस्सा होती है तो कभी साइकोटिक डिसऑर्डर का, और कभी गंभीर डिप्रेशन या एंग्जाइटी के बाद विकसित होती है। लगातार डिप्रेशन में इंसान सोचने लगता है कि लोग उसे पसंद नहीं करते और यही सोच आगे बढ़कर पैरानोइया बन सकती है।

आजकल युवाओं में यह समस्या ज्यादा क्यों दिख रही है?

पैरानोइया के युवाओं में पनपने के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे बढ़ती इनसिक्योरिटी और ट्रस्ट इश्यू, आज का असुरक्षित माहौल, और बच्चों को बहुत कम उम्र में अलर्ट करना, जैसे बच्चे को बैड टच या स्ट्रेंजर डेंजर के बारे में जल्दी जानकारी देना जरूरी है, लेकिन इससे कुछ बच्चों में हर चीज को खतरे की नजर से देखने की आदत बन सकती है।

यह स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है?

अगर यह किसी मानसिक बीमारी का हिस्सा है, तो यह गंभीर हो सकती है। शुरुआत में शक बाहरी लोगों पर होता है, लेकिन धीरेधीरे परिवार और डॉक्टर भी शक के घेरे में आ सकते हैं। कुछ लोग काल्पनिक कहानियां बना लेते हैं कि लोग उन्हें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। ऐसे में इलाज मुश्किल हो जाता है, इसलिए जल्दी इलाज जरूरी है।

पैरानोइया और सोशल एंग्जायटी में क्या फर्क है?

सोशल एंग्जायटी में व्यक्ति को कहीं न कहीं पता होता है कि उसका डर शायद गलत है, लेकिन पैरानोइया में उसे पूरा यकीन होता है कि सामने वाला उसे नुकसान पहुंचाएगा।

पैरानोइया को पागलपन कहा जा सकता है?

आज के समय में “पागलपन” शब्द इस्तेमाल नहीं किया जाता। मेडिकल भाषा में इसे साइकोसिस कहा जाता है, जहां व्यक्ति का रियलिटी से कनेक्शन कमजोर हो जाता है।

पैरानोइया का इलाज कैसे होता है?

इसके इलाज में कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी मदद करती है, जिससे सोचने का तरीका बदला जाता है। कई मामलों में दवाइयां भी दी जाती हैं। ज्यादातर मामलों में दोनों का कॉम्बिनेशन बेहतर रहता है।

मेडिटेशन और डिजिटल डिटॉक्स कर सकता है मदद

मेडिटेशन और डिजिटल डिटॉक्स से कुछ हद तक मदद मिल सकती है। खासकर अगर डिजिटल कंटेंट डर या शक बढ़ा रहा हो। आजकल एल्गोरिदम आपको वही चीजें ज्यादा दिखाता है जो आप देखते हैं, जिससे शक और मजबूत हो सकता है। इसलिए डिजिटल डिटॉक्स और सही कंटेंट चुनना जरूरी है।

पैरानोइया से पीड़ित इंसान को कब डॉक्टर के पास जाना जरूरी है?

जब व्यक्ति अपनी सोच बदलने को तैयार न हो, शक बढ़ता जाए, रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे या वह लोगों से कटने लगे, तब तुरंत साइकेट्रिस्ट से संपर्क करना चाहिए। आसान शब्दों में समझें तो पैरानोइया सिर्फ साधारण शक नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर मानसिक स्थिति बन सकती है। समय पर पहचान और इलाज से व्यक्ति सामान्य और बेहतर जीवन जी सकता है।

डिस्क्लेमर : यह लेख केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। लेख में दी गई जानकारी, राधिका की कहानी और विशेषज्ञों के सुझावों को किसी भी तरह का चिकित्सीय परामर्श , निदान या पेशेवर इलाज का विकल्प न माना जाए। मानसिक स्वास्थ्य एक अत्यंत संवेदनशील विषय है और पैरानोइया जैसी स्थितियां व्यक्ति दर व्यक्ति भिन्न हो सकती हैं। यदि आप या आपके आसपास कोई भी व्यक्ति ऐसे लक्षणों का अनुभव कर रहा है, तो बिना देरी किए किसी योग्य मनोचिकित्सक या क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट से परामर्श लें।

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