फास्टिंग शुगर 126 पार, फिर भी डॉक्टर नहीं मानते डायबिटीज? जानिए शुगर लेवल्स का वो ‘कन्फ्यूजन’ जो जानना आपके लिए है जरूरी​

मेडिकल साइंस के अनुसार अगर किसी डायबिटीज मरीज की फास्टिंग ब्लड शुगर यानी खाली पेट की जांच 126 mg/dL या उससे अधिक आती है, तो इसे आमतौर पर डायबिटीज का संकेत माना जाता है। लेकिन आप जानते हैं कि अगर किसी नॉन डायबिटिक व्यक्ति की फास्टिंग ब्लड शुगर 126 mg/dL से ऊपर आ जाए तो  इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि उसे डायबिटीज है। Wockhardt Hospitals में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट और डायबिटोलॉजिस्ट Dr Pranav Ghody बताते हैं कि कई बार डॉक्टर इस आंकड़े के बाद भी आपको सीधे डायबिटिक घोषित नहीं करते,  इसके पीछे एक गहरा मेडिकल तर्क है।

फास्टिंग शुगर 126 पार, फिर भी डॉक्टर नहीं मानते डायबिटीज? जानिए शुगर लेवल्स का वो ‘कन्फ्यूजन’ जो जानना आपके लिए है जरूरी​

एक्सपर्ट के मुताबिक फास्टिंग ब्लड शुगर कई अस्थायी कारणों से भी बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि खराब नींद, तनाव, हाल की बीमारी, कुछ दवाइयां जैसे स्टेरॉयड या फिर रात के खाने का असर भी फास्टिंग शुगर को सामान्य से ज्यादा बढ़ा सकता है। ऐसे मामलों में यह रीडिंग शरीर की वास्तविक मेटाबॉलिक स्थिति को नहीं दर्शाती। दरअसल, स्ट्रेस, अधूरी नींद, या पिछले दिन की डाइट फास्टिंग शुगर को अस्थायी रूप से बढ़ा सकती है। यही कारण है कि एक्सपर्ट केवल एक रिपोर्ट के बजाय ‘HbA1c’ यानी 3 महीने का औसत और ‘Glucose Tolerance Test’ पर भरोसा करते हैं।

एक्सपर्ट के मुताबिक, डायबिटीज का डायग्नोज केवल एक रिपोर्ट के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि समय के साथ ब्लड शुगर के पैटर्न और दूसरी जांचों को देखकर फैसला लिया जाता है। आइए समझते हैं कि शुगर लेवल के इस गणित में डॉक्टर कब और क्यों सावधानी बरतते हैं।

जांच के तरीके भी रिपोर्ट पर करते हैं असर

डॉ. घोडी के अनुसार, लैब टेस्ट में मामूली अंतर भी रिपोर्ट को प्रभावित कर सकते हैं। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। जांच के तरीके, सैंपल को संभालने की प्रक्रिया या शरीर में पानी की कमी जैसी चीजें भी ब्लड शुगर रीडिंग को बदल सकती हैं। यही वजह है कि ज्यादातर मेडिकल गाइडलाइंस डायबिटीज की पुष्टि से पहले किसी दूसरे दिन दोबारा फास्टिंग ग्लूकोज टेस्ट कराने की सलाह देते हैं।

डायबिटीज के लिए डॉक्टर कराते हैं ये 3 जांच

डायबिटिक घोषित करने के लिए डॉक्टर केवल फास्टिंग शुगर की एक संख्या पर भरोसा नहीं करते, बल्कि दूसरी जांच से भी तुलना करते हैं। इनमें HbA1c टेस्ट शामिल है, जो पिछले 2 से 3 महीनों की औसत ब्लड शुगर दिखाता है। इसके अलावा ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट भी किया जा सकता है। अगर ये रिपोर्ट सामान्य या बॉर्डरलाइन आती हैं, तो संभव है कि बढ़ी हुई फास्टिंग शुगर केवल एक अस्थायी स्थिति रही हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ लोगों में “इम्पेयर्ड फास्टिंग ग्लूकोज” यानी प्रीडायबिटीज की स्थिति भी हो सकती है। इसमें फास्टिंग शुगर कभीकभी तय सीमा से ऊपर चली जाती है, लेकिन लगातार इतनी ज्यादा नहीं रहती कि उसे डायबिटीज माना जाए। ऐसे लोगों को तुरंत दवा देने के बजाय लाइफस्टाइल सुधारने की सलाह दी जाती है और उनकी नियमित निगरानी की जाती है।

मरीज के इन लक्षणों से डॉक्टर डायबिटीज की करते हैं पहचान

डॉक्टर मरीज के लक्षणों को भी ध्यान में रखते हुए डायबिटीज की पहचान करते हैं। ज्यादा प्यास लगना, बारबार पेशाब आना, बिना वजह वजन कम होना, फैमिली हिस्ट्री और वजन का कम होने जैसी चीजें जांच का हिस्सा होती हैं। अगर व्यक्ति में ऐसे लक्षण नहीं हैं और बाकी रिपोर्ट भी नॉर्मल हैं, तो डॉक्टर तुरंत डायबिटीज घोषित नहीं करते। एक्सपर्ट मानते हैं कि डायबिटीज का पता लगाने के लिए केवल एक बार की रिपोर्ट नहीं, बल्कि समय के साथ शरीर के ब्लड शुगर पैटर्न को समझना ज्यादा जरूरी है। अगर किसी रिपोर्ट को लेकर संदेह हो, तो डॉक्टर आमतौर पर दोबारा जांच और फॉलोअप की सलाह देते हैं, न कि तुरंत बीमारी घोषित करते हैं।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी विशेषज्ञों की राय और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। किसी भी तरह की स्वास्थ्य समस्या या जांच रिपोर्ट को लेकर हमेशा अपने डॉक्टर या हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लें।

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