भारत के सबसे चर्चित आर्थिक अपराध मामलों में से एक से जुड़े भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को ब्रिटेन में बड़ा कानूनी झटका लगा है। लंदन सर्किट कमर्शियल कोर्ट ने बैंक ऑफ इंडिया के पक्ष में फैसला सुनाते हुए नीरव मोदी को 10.7 मिलियन डॉलर यानी 100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि चुकाने का आदेश दिया है। यह राशि उस व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ी है, जिस पर नीरव मोदी ने अपनी कंपनी के लिए लिए गए ऋण के बदले हस्ताक्षर किए थे।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब नीरव मोदी पहले से ही भारत के बहुचर्चित पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के मुख्य आरोपियों में शामिल हैं और कई वर्षों से ब्रिटेन में भारत प्रत्यर्पण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अदालत का यह आदेश भारतीय बैंकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कानूनी सफलता माना जा रहा है।

मामले की जड़ें वर्ष 2012 तक जाती हैं। जुलाई 2012 में बैंक ऑफ इंडिया ने नीरव मोदी के नियंत्रण वाली फायरस्टार ग्रुप की दुबई स्थित कंपनी फायरस्टार डायमंड FZE को ऋण सुविधा प्रदान की थी। इस ऋण व्यवस्था के तहत अगस्त 2013 में नीरव मोदी ने व्यक्तिगत गारंटी पर हस्ताक्षर किए थे। इस गारंटी के अनुसार यदि कंपनी अपने ऋण दायित्वों को पूरा करने में विफल रहती है तो ऋण चुकाने की जिम्मेदारी व्यक्तिगत रूप से नीरव मोदी की होगी।

साल 2018 में पंजाब नेशनल बैंक घोटाले का खुलासा होने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई। बैंक ऑफ इंडिया ने ऋण को तत्काल वापस मांगते हुए फायरस्टार डायमंड FZE और नीरव मोदी दोनों को भुगतान नोटिस जारी किए। बैंक का तर्क था कि PNB घोटाले के सामने आने के बाद कंपनी की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित हुई और ऋण सुरक्षा का मूल्य भी कम हो गया, जिससे ऋण की तत्काल वसूली आवश्यक हो गई।

मंगलवार को सुनाए गए फैसले में न्यायाधीश साइमन टिंकलर ने स्पष्ट किया कि नीरव मोदी द्वारा दी गई व्यक्तिगत गारंटी पूरी तरह वैध और कानूनी रूप से लागू करने योग्य है। अदालत ने माना कि बैंक ऑफ इंडिया द्वारा भेजे गए भुगतान नोटिस उचित तरीके से दिए गए थे और PNB घोटाले के खुलासे का फायरस्टार ग्रुप के कारोबार पर महत्वपूर्ण प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। इसी आधार पर बैंक को ऋण की तत्काल वसूली का अधिकार प्राप्त था। अदालत ने नीरव मोदी को लगभग 4.1 मिलियन डॉलर की मूल बकाया राशि तथा 6.6 मिलियन डॉलर से अधिक के ब्याज और अन्य शुल्कों के भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराया। इस प्रकार कुल देनदारी 10.7 मिलियन डॉलर से अधिक हो गई, जो भारतीय मुद्रा में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा बैठती है।

सुनवाई के दौरान नीरव मोदी ने कई आधारों पर बैंक के दावे को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि व्यक्तिगत गारंटी लागू नहीं की जा सकती, उन्हें वैध भुगतान नोटिस प्राप्त नहीं हुए और ऋण समझौते को समाप्त करने के लिए कोई ऐसा प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा था जो बैंक की कार्रवाई को उचित ठहराता हो। हालांकि अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि नीरव मोदी स्वयं एक भुगतान नोटिस अपने वकीलों को उपलब्ध करा चुके थे, जिससे उनका यह दावा कमजोर पड़ गया कि उन्हें नोटिस प्राप्त ही नहीं हुआ था।

यह फैसला मार्च 2024 में आए उस पूर्व निर्णय के बाद आया है, जिसमें अदालत ने नीरव मोदी की मूल देनदारी को पहले ही स्वीकार कर लिया था। नवीनतम आदेश में ब्याज और अन्य वित्तीय शुल्कों को जोड़कर अंतिम भुगतान राशि निर्धारित की गई है। नीरव मोदी कभी भारत के सबसे प्रसिद्ध लग्जरी ज्वेलरी कारोबारियों में गिने जाते थे। उन्होंने नीरव मोदी ब्रांड और फायरस्टार ग्रुप की स्थापना की थी तथा मुंबई, न्यूयॉर्क, लंदन, हांगकांग और सिंगापुर जैसे प्रमुख शहरों में उनके स्टोर संचालित होते थे। लेकिन वर्ष 2018 में उनका नाम उस समय अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया जब उन पर भारत के सबसे बड़े बैंकिंग घोटालों में से एक, पंजाब नेशनल बैंक घोटाले, का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगा।

जांच एजेंसियों के अनुसार नीरव मोदी, उनके सहयोगियों और कुछ बैंक अधिकारियों ने कथित तौर पर फर्जी लेटर्स ऑफ अंडरटेकिंग के माध्यम से विदेशी बैंकों से भारी वित्तीय सहायता प्राप्त की थी। इस कथित घोटाले का आकार लगभग 13,000 करोड़ रुपये बताया गया, जबकि कुछ जांच रिपोर्टों में इससे भी अधिक वित्तीय जोखिम का उल्लेख किया गया है।

भारत की केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय ने नीरव मोदी के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश, मनी लॉन्ड्रिंग, धोखा देने और आपराधिक विश्वासघात सहित कई गंभीर आरोप लगाए हैं। वर्ष 2019 से वह लंदन की जेल में बंद हैं और भारत प्रत्यर्पण का विरोध कर रहे हैं। ब्रिटेन की अदालतें उनकी कई जमानत याचिकाएं और अपीलें पहले ही खारिज कर चुकी हैं।

लंदन कोर्ट का यह ताजा फैसला केवल एक ऋण वसूली मामला नहीं है, बल्कि भारतीय बैंकों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक अपराधों से जुड़े धन की रिकवरी के प्रयासों को मजबूती देने वाला महत्वपूर्ण निर्णय भी माना जा रहा है। इससे बैंक ऑफ इंडिया को नीरव मोदी से जुड़े संभावित परिसंपत्तियों के खिलाफ ब्रिटिश कानून के तहत आगे की वसूली कार्रवाई करने का रास्ता भी खुल गया है। ऐसे में यह फैसला भारत के सबसे बड़े बैंकिंग घोटालों में से एक से जुड़े आर्थिक नुकसान की भरपाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।