बॉलीवुड में जब भी ट्रैजिक प्रेम कहानियों की बात होती है, तो सबसे पहला नाम ‘देवदास’ का आता है। संजय लीला भंसाली की 2002 में आई फिल्म हो या शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का मूल उपन्यास, दोनों में एक ऐसा प्रेमी दिखाई देता है जो अपने प्यार को पाने के बजाय धीरेधीरे खुद को बर्बाद कर देता है। वर्षों से दर्शकों के बीच यह बहस चलती रही है कि आखिर देवदास की जिंदगी का असली विलेन कौन था?

क्या वह समाज था जिसने जाति और प्रतिष्ठा की दीवारें खड़ी कर दीं? क्या हालात इतने प्रतिकूल थे कि प्रेम का अंत तय था? या फिर सबसे बड़ा दोष खुद देवदास का था? अगर इस कहानी को सतह से थोड़ा नीचे जाकर देखा जाए, तो जवाब उतना आसान नहीं है जितना पहली नजर में लगता है। लेकिन एकएक परत खोलने पर कहानी का असली खलनायक सामने आने लगता है।
यह भी पढ़ें:
क्या समाज था देवदास का सबसे बड़ा दुश्मन?
पहली नजर में देखने पर ऐसा लगता है कि समाज ही इस कहानी का सबसे बड़ा विलेन है। देवदास और पारो बचपन से एकदूसरे को चाहते थे। दोनों एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताने का सपना देखते हैं। लेकिन जब शादी की बात आती है, तो परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा उनके रास्ते में खड़ी हो जाती है।
देवदास का परिवार खुद को पारो के परिवार से ऊंचा समझता है। उनके लिए प्यार से ज्यादा अहमियत खानदान, हैसियत और सामाजिक प्रतिष्ठा की है। पारो की मां जब रिश्ते की बात लेकर जाती हैं, तो उनका अपमान किया जाता है। यही वह पल है जहां दो प्रेमियों के बीच समाज पहली बड़ी दीवार खड़ी करता है।
यहां समाज सिर्फ कुछ लोगों का समूह नहीं है, बल्कि वह मानसिकता है जो इंसानों को बराबरी से देखने के बजाय उनकी हैसियत के तराजू में तौलती है। अगर यह सामाजिक दबाव न होता, तो शायद कहानी की दिशा ही कुछ और होती। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ समाज की वजह से देवदास बर्बाद हुआ? अगर ऐसा होता, तो क्या हर प्रेम कहानी का अंत देवदास जैसा होता? शायद नहीं।
हालात ने भी निभाई अहम भूमिका?
कई लोग मानते हैं कि देवदास परिस्थितियों का शिकार था। वह एक ऐसे दौर में जी रहा था जहां परिवार की इच्छा के खिलाफ जाना आसान नहीं था। उस समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता आज जैसी नहीं थी। मातापिता के फैसले को चुनौती देना लगभग विद्रोह माना जाता था। जब पारो उससे उम्मीद करती है कि वह उसके लिए खड़ा होगा, तब देवदास खुद असमंजस में फंसा रहता है।
वह परिवार और प्रेम के बीच फैसला नहीं कर पाता। उसकी यह कमजोरी परिस्थितियों से भी पैदा होती है। बचपन से उसे ऐसा माहौल मिला जहां अपने फैसले खुद लेना उसने सीखा ही नहीं। फिर जब पारो की शादी कहीं और हो जाती है, तो हालात और भी जटिल हो जाते हैं। दोनों चाहकर भी एक नहीं हो सकते। समय उनके खिलाफ खड़ा हो जाता है। जितनी देर देवदास निर्णय लेने में लगाता है, उतनी ही तेजी से परिस्थितियां उसके हाथ से निकलती जाती हैं।
लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण बात है। हालात कठिन जरूर थे, असंभव नहीं। कहानी में कई मौके ऐसे आते हैं जब देवदास अपने जीवन को नई दिशा दे सकता था। वह पारो के लिए लड़ सकता था, अपने परिवार का विरोध कर सकता था या फिर अपनी जिंदगी को संभाल सकता था। मगर वह ऐसा नहीं करता। यहीं से कहानी का फोकस समाज और हालात से हटकर खुद देवदास पर आने लगता है।
असली समस्या थी देवदास की कमजोरी?
अगर पूरी कहानी को ध्यान से देखा जाए, तो देवदास की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि उसे प्यार नहीं मिला। उसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह कभी अपने जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में नहीं ले पाया। पारो उससे कहीं ज्यादा मजबूत किरदार है। जब उसे एहसास होता है कि देवदास निर्णय नहीं ले पा रहा, तो वह अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने का फैसला करती है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। यह फैसला उसके लिए आसान नहीं होता, लेकिन वह वास्तविकता को स्वीकार कर लेती है।
दूसरी तरफ देवदास वास्तविकता से भागता है। वह कोई निर्णय नहीं लेता। वह परिस्थितियों को बदलने की कोशिश नहीं करता। वह सिर्फ दुख में डूबता जाता है। यही वजह है कि कहानी में पारो पीड़ित होने के बावजूद मजबूत दिखाई देती है, जबकि देवदास नायक होते हुए भी कमजोर नजर आता है।
शराब नहीं, आत्मदया थी उसकी सबसे बड़ी लत
अक्सर लोग कहते हैं कि शराब ने देवदास को बर्बाद कर दिया। लेकिन गहराई से देखें तो शराब सिर्फ एक परिणाम थी, कारण नहीं। असल समस्या उसकी आत्मदया थी। वह लगातार खुद को एक दुखी प्रेमी के रूप में देखने लगता है। उसे अपने दर्द से एक अजीब लगाव हो जाता है। वह उस दर्द से बाहर निकलना ही नहीं चाहता।
चंद्रमुखी उसके जीवन में एक नई शुरुआत का अवसर लेकर आती है। वह उसे बिना किसी शर्त के प्रेम करती है। उसके टूटे हुए मन को संभालने की कोशिश करती है। लेकिन देवदास यहां भी अपने दुख को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। एक तरह से वह अपने दर्द को अपनी पहचान बना लेता है। और जब इंसान अपनी पीड़ा को ही अपनी पहचान बना ले, तब उसके लिए आगे बढ़ना लगभग असंभव हो जाता है।
पारो और चंद्रमुखी: कहानी के दो आईने
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म में पारो और चंद्रमुखी दोनों देवदास के लिए आईने का काम करती हैं। पारो उसे दिखाती है कि प्रेम के लिए साहस चाहिए। चंद्रमुखी उसे दिखाती है कि टूटने के बाद भी जीवन में उम्मीद बची रहती है।
लेकिन देवदास दोनों से कुछ नहीं सीखता। वह न पारो जैसा साहसी बन पाता है और न चंद्रमुखी जैसा धैर्यवान। यही वजह है कि कहानी के अंत तक दोनों महिलाएं भावनात्मक रूप से उससे ज्यादा परिपक्व दिखाई देती हैं। एक समाज की बंदिशों में रहकर भी जीवन जीना सीख लेती है, दूसरी तिरस्कार झेलकर भी प्रेम करना नहीं छोड़ती। जबकि देवदास लगातार अपने ही बनाए अंधेरे में डूबता जाता है।
क्या देवदास एक ट्रैजिक हीरो नहीं, बल्कि अपनी बर्बादी का निर्माता था?
सिनेमा और साहित्य में देवदास को अक्सर एक दुखद प्रेमी के रूप में पेश किया गया है। लेकिन आधुनिक नजरिए से देखें तो वह सिर्फ एक पीड़ित नहीं है। वह कई बार ऐसे फैसले लेता है जो उसकी बर्बादी को और तेज कर देते हैं। वह संवाद करने से बचता है। जिम्मेदारी लेने से बचता है। संघर्ष करने से बचता है। और अंत में जीवन जीने से भी बचता है। उसकी त्रासदी यह नहीं कि दुनिया उसके खिलाफ थी। उसकी त्रासदी यह है कि जब उसे अपने लिए खड़ा होना चाहिए था, तब वह खुद अपने खिलाफ खड़ा हो गया।
यह भी पढ़ें:





